मंचीय और गैर मंचीय कवियों के बीच जो खाई बनी है, उसे पाटने की कोशिश होनी चाहिए ताकि दोनों धाराएं निर्बाध एक दूसरे की सीमा में प्रवेश कर सके
साहित्यिक खेमेबाजी के रूप में मंचीय-गैर मंचीय कवियों के बीच एक अघोषित लकीर हमेशा से रही है जो कई मौकों पर विवाद का कारण भी बनती रही है। कई बार विवाद इतना गहरा हो जाता है कि आम-खास पाठकों को भी दोनों के बीच की खाई साफ नजर आती है। मंचीय-गैरमंचीय कविता के बीच होने वाले इस भेद भाव की कीमत ही आज अनेक प्रतिभाशाली कवि चुका रहे हैं अन्यथा इनकी कविताओं पर भी अकादमिक र्चचा हो सकती है। इस भेदभाव का शिकार प्रमोद तिवारी और विनय विश्वास जैसे तमाम कवियों की पीड़ा है कि साहित्य के क्षेत्र में मंचीय-गैर मंचीय या साहित्यिक-गैर साहित्यिक जैसी लकीर का कोई अर्थ नहीं है। मंच की कविता भी साहित्यिक पत्रिकाओं में सराही जा सकती है। साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने वाले कवियों की कविताएं मंच की वाहवाही लूट सकती हैं। विश्वास ने अपने स्तर पर एक प्रयास भी किया है। वे मंच से राजेश जोशी, हेमंत कुकरेती, बद्रीनारायण की पंक्तियों को समय-समय पर अपनी प्रस्तुति में जोड़ते हैं। खास बात यह कि साहित्यिक कवि माने जाने वाले राजेश जोशी, बद्रीनारायण की कविताओं को मंच पर उद्धृत करने पर श्रोताओं की तरफ से कई-कई बार 'एक बार फिर' (वंस मोर) का आग्रह आया है। यदि साहित्यिक पत्रिकाओं के पास अरुण कमल, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, केदारनाथ सिंह, इब्बार रब्बी जैसे कवि हैं तो कविता के दूसरे पलड़े अर्थात मंच पर भी नीरज, सोम ठाकुर, बाल कवि बैरागी, उदय प्रताप सिंह, सुरेंद्र शर्मा जैसे जाने-माने हस्ताक्षर मौजूद हैं। अब मंच और साहित्यिक कविता के दो पलड़ों में कौन सा भारी है, यह कहना मुश्किल होगा। वरिष्ठ हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा इस पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि मेरी राय में मंच का कवि होना, पत्रिकाओं में कविता लिखने से अधिक चुनौतीपूर्ण है। चूंकि साहित्य की कविता का पाठक एक खास तरह का वर्ग होता है लेकिन मंच की कविता सुनने वालों में कुली से लेकर कलेक्टर तक हर स्तर के रसिक मौजूद होते हैं। सुरेंद्र शर्मा गम्भीर साहित्यिक कविताओं पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं 'उस कविता का भी क्या अर्थ माना जाए जो जिस शोषित समाज के लिए लिखी जा रही है, उस समाज की ही समझ में न आए।' अपनी बात को वह एक कविता के रूप में समझाते हुए व्यंग्य करते हैं- 'एक कवि ने पसीना बहाने वालों पर कविता लिखी/पसीना बहाने वालों को समझ में नहीं आई/मुझे समझने में पसीने आ गए।'
मंच पर कवि अपनी रचना के साथ श्रोताओं के सामने होता है। इस तरह श्रोता कवि के सामने अपनी नाराजगी या खुशी प्रकट कर देता है। तालियों की गड़गड़ाहट होती है या फिर कवि हूट होते हैं। यानी कविता का महत्व या परिणाम हाथ के हाथ सरेआम मिल जाता है। यह मंचीय कविता का ही जादू है, कि श्रोता अपने प्रिय कवि को सुनने के लिए पूरी-पूरी रात कवि सम्मेलनों में बैठे रह जाते हैं। नीरज के बारे में मशहूर है कि उनकी महफिल में जो बैठ गया, कार्यक्रम खत्म होने तक उठकर नहीं जा पाया। दूसरी तरफ साहित्यिक कविता के पाठकों के पास त्वरित प्रतिक्रिया का कोई विकल्प नहीं होता। बात मंच के जादू की करें तो गणतंत्र दिवस के मौके पर हर साल लाल किले में आयोजित होने वाले कवि सम्मेलन में जनवरी के महीने में रात के दस बजे से सुबह तीन चार बजे तक ठिठुरती ठंड में भी कविता सुनने के लिए हजारों की संख्या श्रोता में बैठे होते हैं। क्या शालीनता के साथ चलने वाला ऐसा कोई दूसरा आयोजन है, जो इतनी बड़ी संख्या में लोगों को अपने साथ कड़ाके की ठंड में पूरी रात बांध कर रखे। कहने का अभिप्राय सिर्फ इतना ही है कि मंचीय और गैर मंचीय कवियों के बीच जो खाई बनी है, उसे पाटने की कोशिश होनी चाहिए ताकि दोनों धाराएं निर्बाध एक दूसरे की सीमा में प्रवेश कर सकें।
No comments:
Post a Comment