इस समाज का चरित्र कुछ अजीब ही होता जा रहा है। धार्मिक देवपूजा ही नहीं बढ़ती जा रही है, सांस्कृतिक व्यक्तित्वों के प्रति हमारा पूजाभाव भी बढ़ता जा रहा है और इस पूजाभाव के चलते हमने प्रसिद्ध हुए लोगों को आब्जेक्टिव होकर देखना छोड़ दिया है। साहित्य में यह परिदृश्य चकित करने वाला है। कुछ साहित्यकार पिछले बरस ही सौ वर्ष पूरे कर चुके थे लेकिन पिछले साल यह याद नहीं आया था। इस साल याद आया तो बहुत शिद्दत के साथ। मैं नहीं जानता विदेशों में शती का क्या रिवाज है पर भारत में उत्सवधर्मिता का अध्ययन होना चाहिए। जन्मशती का अवसर किसी लेखक के संदर्भ में क्या सिर्फ इसलिए होना चाहिए कि वह पूजनीय हो चुका है और नई पीढ़ी को उसके चरण चिह्नों पर चलते रहना चाहिए यानी जो कुछ उसने सोचा वही सोचते रहना चाहिए और जो कुछ उसने लिखा उसे अपने लेखन की सीमा मान लेना चाहिए? यह मान कर चलना चाहिए कि जो सौ साल पहले एक लेखक जो कुछ लिख दिया था वही लेखन की अंतिम सीमा है? हिंदी में कुछ अरसा पहले प्रेमचंद को लेकर यही स्थिति पैदा हो गई थी। कुछ लेखकों ने तो इस मुद्दे को आजीवन शत्रुता का अभियान ही बना लिया था। प्रेमचंद उर्दू कहानी लेखकों के लिए बड़े सम्मानित आदि पुरुष हैं लेकिन उर्दू ने उन्हें लेखन की अंतिम सीमा नहीं माना था और तभी उर्दू में अली अब्बास हुसैनी और हयातुल्ला अंसारी से लेकर मंटो, बेदी, किशन चंदर, इस्मत चुगताई और उनके बाद के दर्जनों कद्दावर कथाकार पैदा हुए। यहां जिनकी जन्मशती इसी बरस याद की जा रही है उन फैज अहमद फैज की याद दिलाना चाहूंगा। वह उर्दू के सबसे बड़े शायरों में से एक हैं, जिन्हें भारत में भी चाहने वाले करोड़ों हैं जबकि भारत के ही हिंदी कवि शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल या अज्ञेय को जानने वाले लाखों भी मुश्किल से ही मिलेंगे। खैर फैज, प्रेमचंद का नाम बहुत इज्जत से लेते थे लेकिन हिंदी की तरह उन्हें देवता की तरह पूजते नहीं थे। फैज ने उनकी कई बातों के लिए कड़ी आलोचना भी की थी। ठीक यही देवपूजा हिंदी में शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल और अज्ञेय को लेकर देखने में आ रही है। शमशेर और केदार पर जो उत्सव हो रहे हैं, उनमें देवाराधन की प्रवृत्ति के बावजूद शालीनता और गंभीरता है लेकिन अज्ञेय को लेकर हिंदी में जो कुछ हो रहा है, वह कुछ हद तक बजरंग दल के अभियानों की याद दिलाता है। यह देखकर दुख होता है कि अज्ञेय में लगभग रामजन्मभूमि देखी जा रही है। अज्ञेय जितने के हकदार हैं उससे ज्यादा ही उन्हें मिला है और पश्चिम के वामपंथ विरोधी संगठन कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम में शरीक हो जाने के बाद के सुखों का तो जिक्र ही क्या। एक बार खुद डा. लोहिया ने मेरे अज्ञेय विरोध पर सवाल किया था- 'क्या तुम अज्ञेय को विदेशी यानी अमेरिकी एजेंट मानते हो?'मैंने कहा-'अज्ञेय जब कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के लिए काम करते हैं तो और क्या हो सकते हैं?'
डाक्टर लोहिया के घर पर साप्ताहिक जन गोष्ठी में अज्ञेय कभी नहीं बुलाए गए थे। लेकिन अज्ञेय की देवपूजा करने वाला हिंदी समाज रामजन्मभूमि आंदोलन शुरू होने के साथ ही जानकी यात्रा करता है, इसको सामने क्यों नहीं रखा जाना चाहिए? उनकी कविताओं और उपन्यासों के साथ इस बात की र्चचा भी क्यों नहीं होनी चाहिए कि जानकी यात्रा पर संपादित उनकी पुस्तक में उन्होंने जो लिखा है वह कितने बड़े अंधविश्वास को ठीक विहिप की भाषा में दुहराता है? एकाध उदाहरण ही सिद्ध करने के लिए काफी होंगे-'जिसके अंत में विष्णु स्वरूप राम एक प्रभादीप्त तेजोमण्डल में आत्मस्थ हो जाते हैं।.. इसी के साथ सब देव-देवता, यक्ष-नाग, ऋषि, सिद्ध और मानुष मात्र हैं जो ऐसे अवसरों पर अगत्या उपस्थित होते हैं और सम्मोहित से ताकते रह जाते हैं। .. राम और सीता ऐसे ही अवतारी सनातन चरित्र हैं जिनका जीवन नियति का निर्धारण करने वाले क्षणों की सतत परंपरा है।'
अज्ञेय का इस तरह राम भक्त हो जाना और वह भी तब जब अयोध्या में साम्प्रदायिक आंदोलन शुरू हो चुका हो, यह आखिर अज्ञेय शती के मौके पर क्यों उपेक्षित किया गया? और आखिर हिंदी साहित्य 21वीं सदी में किस तरह अज्ञेय की देव पूजा पर आमादा हुआ? क्या यह इसका संकेत नहीं है कि हिंदी बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग अंदर से सांप्रदायिक हिंदू है?
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