अम्बेडकर जयंती के मौके पर एक बात खास तौर से चुभती है कि इतने विशाल हिंदी साहित्य परिसर में जो शख्स पूरी तरह अनुपस्थित दिखता है वह है, सामाजिक समता के लिए आंदोलन करने वाला डॉक्टर अम्बेडकर। जातिवाद, जातीय घृणा और जातीय उत्पीड़न की आधार पुस्तिकामनुस्मृति का अम्बेडकर ने दहन किया था। इसी जातिवाद की याद दिलाने वाली किताब जयशंकर प्रसाद ने लिखी थी कामायनी। जनता को जातिवाद में बांधने की विचारधारा का सीधा वर्णन था। वामपंथी कवि मुक्तिबोध ने भी इस अमानवीय तत्व की आलोचना की थी। हिंदी के समूचे वामपंथी समुदाय में जातिवाद की अमानवीय व्यवस्था पर साफ बात लगभग सिरे से नदारद रही है। प्रेमचंद ने अम्बेडकर के कम्युनल अवार्ड की कड़ी निंदा की थी लेकिन उन पर थोड़ा-सा लिखा भी था पर बाकी हिंदी साहित्यकारों ने अपने लेखन में उन्हें अछूत ही बनाए रखा और शूद्र जाति की समस्या को साहित्य, खास तौर से कविता में कोई जगह नहीं मिली। यह भी ध्यान देने की बात है कि विष्णु खरे आदि कुछ कवियों की कविताओं में दलित विमर्श ने बहुत थोड़ी-सी जगह पाई वहीं वर्तमान हिंदी कविता की मुख्यधारा हिंदू संस्कारों में ही सीमित रही। वह सबसे ज्यादा सहज उपनिषदों की दुनिया में महसूस करती रही। खुद नागाजरुन, जो अर्थवंचित समाज से सबसे ज्यादा गहरे जुड़े रहे थे, दलित विमर्श में सीधे कभी नहीं उतरे। एक और तथ्य बहुत दिलचस्प है। हिंदी उपन्यास के क्षेत्र में गोपाल उपाध्याय या जगदीशचन्द्र जैसे कुछ लेखकों के साठ और सत्तर के दशक में दलित प्रश्न को लेकर खासे अच्छे उपन्यास लिखे लेकिन उन्हें शायद इसीलिए ठीक जगह नहीं मिली कि उनका कथ्य मूलत: दलित विमर्श था। वैसे इस लेखन में रैल्फ एलिसन या टोनी मारिसन के उपन्यासों जैसी वाक तीक्ष्णता बहुत कम है। ऐसा शायद इसलिए कि अत्याचारी समाज के अत्याचार का भरपूर ब्योरा लेने के बावजूद अत्याचारी समुदाय की सामाजिक-सांस्कृतिक पड़ताल बहुत क्षीण है। ध्यान से देखा जाए तो हिंदी के कथा साहित्य और कविता की दुनिया के बीच एक भारी फांक दिखाई देगी। जहां कथा साहित्य दलित प्रश्न पर अपने दरवाजे थोड़े खुले रखता रहा है वहीं कविता का मुख्य परिसर पूरी तरह बंद रहा है। निश्चय ही हमारी-सी असहमतियों के बावजूद प्रेमचंद या निराला इस समस्या को अपने लेखन में उठाते हैं लेकिन हिंदी कविता छायावादी दौर में भी दलित प्रश्न को लेकर चिंतित नहीं हुई। छायावाद के बाद प्रगतिशील और परिमलपंथी कविताओं की धाराओं में से भी अच्छी कविता वहां खड़ी हुई जहां दलित की गंध भी न हो। धर्मवीर भारती के सरोकार, सूरज का सातवां घोड़ा के बावजूद, मुख्यत: महाभारतीय ही थे। अ™ोय ने अपना सरोकार रामजानकी जीवन यात्रा में साफ कर दिया था। यहां इतिहास सबसे ज्यादा बड़ी शिकायत प्रगतिशील लेखकों से करेगा। प्रगतिशील लेखन की सबसे बड़ी हलफ थी देश के वंचित समाज के पक्ष में खड़े होना लेकिन किसी भी तटस्थ बुद्धिजीवी को यह बात हैरान करेगी कि प्रगतिशील लेखन ने अपने आपको दलित विमर्श से दूर रखा। रामविलास शर्मा जैसे लेखकों के लिए तो दलित प्रश्न पूरी तरह अप्रासंगिक लगता रहा। बाकी प्रगतिशील लेखकों का मिजाज भी इससे अलग नहीं था। वे गरीब के पक्ष में है और चूंकि एक ब्राह्मण भी गरीब होता है तो उन्हें दलित प्रश्न पर भी ब्राह्मण ही उल्लेखनीय लगता रहा है। दलित विमर्श पर कुछ कविताओं और उपन्यासों के बावजूद साहित्यकारों ने दलित मुद्दे पर कभी कोई गम्भीर बहस क्यों नहीं छेड़ी? जेएनयू के एक पूर्व अध्यापक (मैनेजर पांडेय)की आलोचना पुस्तक है- साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका। इसमें रेमंड विलियम्स सहित दर्जनों समाजशास्त्रियों का जिक्र है लेकिन देश को प्रासंगिक समाजशास्त्र देने वाले अम्बेडकर का जिक्र कहीं नहीं है। ऐसी ही एक किताब है-कविता के नए प्रतिमान (नामवर सिंह)। यह किताब भी दलित प्रश्न से पूरी दूरी बरतती है। यह एक बड़ा सांस्कृतिक दुर्भाग्य है कि बुद्ध के बाद जो सबसे बड़ा सामाजिक अन्याय का आलोचक विचारक इस देश में हुआ उसके अस्तित्व मात्र को हिंदी बुद्धिजीवी नकारकर चलता है। मैं नहीं जानता यह स्थिति हिंदी की दुनिया में कब और कैसे बदल सकेगी?
Monday, April 18, 2011
अम्बेडकर का प्रच्छन्न विरोध
अम्बेडकर जयंती के मौके पर एक बात खास तौर से चुभती है कि इतने विशाल हिंदी साहित्य परिसर में जो शख्स पूरी तरह अनुपस्थित दिखता है वह है, सामाजिक समता के लिए आंदोलन करने वाला डॉक्टर अम्बेडकर। जातिवाद, जातीय घृणा और जातीय उत्पीड़न की आधार पुस्तिकामनुस्मृति का अम्बेडकर ने दहन किया था। इसी जातिवाद की याद दिलाने वाली किताब जयशंकर प्रसाद ने लिखी थी कामायनी। जनता को जातिवाद में बांधने की विचारधारा का सीधा वर्णन था। वामपंथी कवि मुक्तिबोध ने भी इस अमानवीय तत्व की आलोचना की थी। हिंदी के समूचे वामपंथी समुदाय में जातिवाद की अमानवीय व्यवस्था पर साफ बात लगभग सिरे से नदारद रही है। प्रेमचंद ने अम्बेडकर के कम्युनल अवार्ड की कड़ी निंदा की थी लेकिन उन पर थोड़ा-सा लिखा भी था पर बाकी हिंदी साहित्यकारों ने अपने लेखन में उन्हें अछूत ही बनाए रखा और शूद्र जाति की समस्या को साहित्य, खास तौर से कविता में कोई जगह नहीं मिली। यह भी ध्यान देने की बात है कि विष्णु खरे आदि कुछ कवियों की कविताओं में दलित विमर्श ने बहुत थोड़ी-सी जगह पाई वहीं वर्तमान हिंदी कविता की मुख्यधारा हिंदू संस्कारों में ही सीमित रही। वह सबसे ज्यादा सहज उपनिषदों की दुनिया में महसूस करती रही। खुद नागाजरुन, जो अर्थवंचित समाज से सबसे ज्यादा गहरे जुड़े रहे थे, दलित विमर्श में सीधे कभी नहीं उतरे। एक और तथ्य बहुत दिलचस्प है। हिंदी उपन्यास के क्षेत्र में गोपाल उपाध्याय या जगदीशचन्द्र जैसे कुछ लेखकों के साठ और सत्तर के दशक में दलित प्रश्न को लेकर खासे अच्छे उपन्यास लिखे लेकिन उन्हें शायद इसीलिए ठीक जगह नहीं मिली कि उनका कथ्य मूलत: दलित विमर्श था। वैसे इस लेखन में रैल्फ एलिसन या टोनी मारिसन के उपन्यासों जैसी वाक तीक्ष्णता बहुत कम है। ऐसा शायद इसलिए कि अत्याचारी समाज के अत्याचार का भरपूर ब्योरा लेने के बावजूद अत्याचारी समुदाय की सामाजिक-सांस्कृतिक पड़ताल बहुत क्षीण है। ध्यान से देखा जाए तो हिंदी के कथा साहित्य और कविता की दुनिया के बीच एक भारी फांक दिखाई देगी। जहां कथा साहित्य दलित प्रश्न पर अपने दरवाजे थोड़े खुले रखता रहा है वहीं कविता का मुख्य परिसर पूरी तरह बंद रहा है। निश्चय ही हमारी-सी असहमतियों के बावजूद प्रेमचंद या निराला इस समस्या को अपने लेखन में उठाते हैं लेकिन हिंदी कविता छायावादी दौर में भी दलित प्रश्न को लेकर चिंतित नहीं हुई। छायावाद के बाद प्रगतिशील और परिमलपंथी कविताओं की धाराओं में से भी अच्छी कविता वहां खड़ी हुई जहां दलित की गंध भी न हो। धर्मवीर भारती के सरोकार, सूरज का सातवां घोड़ा के बावजूद, मुख्यत: महाभारतीय ही थे। अ™ोय ने अपना सरोकार रामजानकी जीवन यात्रा में साफ कर दिया था। यहां इतिहास सबसे ज्यादा बड़ी शिकायत प्रगतिशील लेखकों से करेगा। प्रगतिशील लेखन की सबसे बड़ी हलफ थी देश के वंचित समाज के पक्ष में खड़े होना लेकिन किसी भी तटस्थ बुद्धिजीवी को यह बात हैरान करेगी कि प्रगतिशील लेखन ने अपने आपको दलित विमर्श से दूर रखा। रामविलास शर्मा जैसे लेखकों के लिए तो दलित प्रश्न पूरी तरह अप्रासंगिक लगता रहा। बाकी प्रगतिशील लेखकों का मिजाज भी इससे अलग नहीं था। वे गरीब के पक्ष में है और चूंकि एक ब्राह्मण भी गरीब होता है तो उन्हें दलित प्रश्न पर भी ब्राह्मण ही उल्लेखनीय लगता रहा है। दलित विमर्श पर कुछ कविताओं और उपन्यासों के बावजूद साहित्यकारों ने दलित मुद्दे पर कभी कोई गम्भीर बहस क्यों नहीं छेड़ी? जेएनयू के एक पूर्व अध्यापक (मैनेजर पांडेय)की आलोचना पुस्तक है- साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका। इसमें रेमंड विलियम्स सहित दर्जनों समाजशास्त्रियों का जिक्र है लेकिन देश को प्रासंगिक समाजशास्त्र देने वाले अम्बेडकर का जिक्र कहीं नहीं है। ऐसी ही एक किताब है-कविता के नए प्रतिमान (नामवर सिंह)। यह किताब भी दलित प्रश्न से पूरी दूरी बरतती है। यह एक बड़ा सांस्कृतिक दुर्भाग्य है कि बुद्ध के बाद जो सबसे बड़ा सामाजिक अन्याय का आलोचक विचारक इस देश में हुआ उसके अस्तित्व मात्र को हिंदी बुद्धिजीवी नकारकर चलता है। मैं नहीं जानता यह स्थिति हिंदी की दुनिया में कब और कैसे बदल सकेगी?
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment