Sunday, April 10, 2011

काल के भाल पर शास्त्रीजी


शास्त्रीजी उत्तर छायावादी साहित्यिक परिदृश्य के सम्भवत: सबसे वरिष्ठ विभूति थे। संस्कृत में काव्य रचना से प्रारंभ करने वाले जानकीबल्लभ शास्त्री ने केवल कविता को ही अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं चुना, 'कालिदास' जैसे उपन्यास की रचना के अतिरिक्त कहानी, संस्मरण, निबंध और आलोचना में भी उनकी लेखनी की विशिष्टता अपनी अलग पहचान दिखाती है। 2 जनवरी, 1916 ई. को गया जिले के मैगरा गांव में जन्मे शास्त्री जी संस्कृत में ही काव्य रचना में प्रवृत्त रहते लेकिन निराला जी के सम्पर्क में आने के पश्चात उनके साहित्यिक फलक पर हिन्दी का रंग चढ़ा। कला को कलाकार की मजदूरी नहीं मजबूरी मानने वाले शास्त्री जी को साहित्यिक जगत में वह कभी नहीं मिल सका जो उनका प्राप्य था। भारत-भारती जैसा बड़ा पुरस्कार भी उन्हें उम्र के उस पड़ाव पर आकर मिला जब कोई सम्मान-पुरस्कार उनकी रचनात्मकता के लिए सर्वथा महत्वहीन हो चुका था। उन्हें इस बात का बड़े गहरे अहसास भी था, लेकिन किसी बात का पछतावा नहीं, 'युग स्वान्त: सुखाय लेखन का नहीं है। सो निजता बचाने की कीमत चुकानी पड़ी, अंधेरी तन्हाइयों में रहकर, उथली गहराइयों में ऊभ-चूभ होकर। बुनियादी सरोकारों से सुलह सम्भव न हुई। पछतावा मैंने नहीं लिखा है। अपना मजाक उड़ाने का एक और ही मजा है। दूसरों के उड़ाए मजाक का नतीजा बदस्तूर मालूम होने पर भी वक्त का जायजा ही लेता रहा, वक्त की सख्त चेतावनी तक अनसुनी कर दी।'
यह हिन्दी की विडम्बना है कि यहां रचनाकार-आलोचक के एक ऐसे युग्म की अनिवार्यता-सी हो गई है जिसमें एक आलोचक एक रचनाकार को उठाकर ऐसे प्रतिष्ठापित कर देता है कि फिर उसके लिए शेष तमाम साहित्यिक नेपथ्य में रहने वाले अभिशप्त पात्र की भूमिका वाले ही रह जाते हैं। कबीर को हजारी प्रसाद जी, निराला को रामविलास जी, जायसी को शुक्ल जी और साही, मुक्तिबोध को नामवर जी के यदि इसी तरह के युग्म न बने होते तो इनमें से तो नहीं लेकिन ऐसे कई और नाम सम्भवत: अचर्चित ही रह जाते। शास्त्री जी इस लंद-फंद से अनजान नहीं थे लेकिन नितांत अछूते थे। वे उस परम्परा के साहित्यिक थे जिसमें अपने लिखे शब्द की सत्ता पर ही एकमात्र भरोसा होता था- लिखे में ताकत होगी तो फिर वह लाख उपेक्षा के बाद भी अपना प्रभाव छोड़ेगा। शास्त्री जी चाहते तो निराला के सम्पर्क को भुना भी सकते थे लेकिन मुजफ्फरपुर में अपने निवास का नाम 'निराला निकेतन' रखने के अलावा उनके नाम का अन्यथा उपयोग नहीं किया। 'एक असाहित्यिक की डायरी' के 'असाहित्यिक' में जो व्यंग्य है वह भी उस पीड़ा के कारण है, लेकिन इस पीड़ा का उन्हें कभी अवसाद नहीं रहा। उन्होंने राजधानियों-अकादमियों समितियों-संस्थानों के इर्द-गिर्द चक्कर कभी नहीं लगाए क्योंकि उनका स्पष्ट मत था, 'कविता कुछ उल्टे-सीधे विचारों के प्रचार का मंच नहीं है, प्रवचन पिलाने की व्यास गद्दी नहीं है, व्यक्ति या समाज का स्वास्थ्य बढ़ाने वाला कोई राजकीय सम्मान प्राप्त टॉनिक भी नहीं है।' 'राधा' जैसा महाकाव्य और 'कालिदास' जैसा उपन्यास लिखने वाले शास्त्री जी उस परम्परा के कवि-मनीषी थे जिनके लिए साहित्य ही साधन था और साहित्य ही साध्य। साहित्य उनके लिए न तो यश प्राप्ति का साधन था न अर्थ प्राप्ति का। इसलिए उन्होंने न पुरस्कार समितियों की चिरौरी की और न साहित्य की राजनीति उन्होंने सिर्फ साहित्य रचना की। साठ से अधिक पुस्तकों का प्रणयन किया। शास्त्री जी ने छायावाद की 'त्रयी' प्रसाद, पंत और निराला पर जो भाववादी समीक्षा लिखी वह छायावाद और इन तीनों कवियों की परस्पर संबद्धता को समझने के लिए मील का पत्थर है-'आधुनिक हिन्दी कविता के इतिहास में पन्त, प्रसाद, निराला के नाम ज्योति के पत्र पर लिखे हैं। ये नाम शेक्सपीयर, गेटे या टैगोर की कोटि के हैं जिन्हें निकाल देने पर अंग्रेजी, जर्मन या बांग्ला की तरह ही हिन्दी में भी ऐसा कुछ न रह जाएगा, जो कभी पुराना न पड़े।'
शास्त्री जी संगीत की भी बड़ी गहरी जानकारी रखते थे। उनकी कविता की अवधारणा में सुर,लय और छन्द समाहित थे। इस दृष्टि से उन्हें कोई परम्परावादी कह कर खारिज करे तो यह सिर्फ अपनी मान्यताओं को दूसरे पर थोपने से अधिक कुछ नहीं होगा। हमें मालूम है कि शास्त्री जी के निधन पर उनके शहर से बाहर शायद ही कोई स्मृति सभा हो, क्योंकि न तो वे किसी लेखक संगठन के सदस्य थे और न किसी विचारधारा के सिपाही-लेखक। लेकिन यह भी सच है कि बहुत सारे ऐसे लेखक सिर्फ अपने समय में ही चर्चित रहते हैं। शास्त्री जी को उनके समकालीनों ने बेशक उपेक्षित किया हो, भविष्य में साहित्यिक इतिहास में वे एक मनीषी साहित्यकार के रूप में समादृत होंगे।


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