बच्चों के चहेते लेखक रस्किन बॉण्ड का चेहरा उन्हें सांताक्लॉज की तरह लगता है। रस्किन ब्रितानी थे लेकिन लंदन उन्हें रास नहीं आया। विपुल साहित्य रचते हुए उन्होंने अपना पूरा जीवन शिमला, मसूरी और देहरादून की वादियों में गुजारा है। उनकी असली पहचान बच्चों के दोस्त लेखक के रूप में है। और प्राय: सारी रचनाओं में प्रकृति और हिमालय की गोद में बसे छोटे शहरों के जनजीवन की छाप मिलती है। उन्हें साहित्य के लिए ढेरों पुरस्कार मिले जिनमें पद्मश्री भी शामिल है। पेश है उनसे एक बातचीत।
इधर आई आपकी रचनाओं पर गौर करें तो बाल रचनाओं का प्रतिशत बढ़ा ही दिखता है। उम्र के 77वें पड़ाव पर भी बच्चों के लिए इतना ताजगी भरा लेखन कैसे संभव हो पाता है?
जैसे-जैसे बुढ़ापा बढ़ता जा रहा है बचपन शिद्दत से मेरे करीब आता जा रहा है। साइकोलॉजिकल फेनोमिना भी बताता है कि उम्र के अंतिम दो दशकों में हम बूढ़े नहीं बल्कि बच्चे हो जाते हैं। यही वजह है कि बच्चे अपने माता-पिता और युवा पारिवारिक सदस्यों से अधिक दादा-दादी, नाना-नानी से चिपके रहते हैं। हां! यह जरूर है कि आज के दौर में परिवार का स्वरूप बदली है और बच्चे अपनी जगह कंप्यूटर, टीवी, वीडियो गेम में अधिक तलाशते हैं।
आपने गद्य और पद्य दोनों विधाओं में पर्याप्त लेखन किया लेकिन असली सफलता बाल साहित्य में मिली। बाल साहित्य की ओर आने की प्रेरणा कहां से मिली?
बच्चों ही नहीं बड़ों के लिए भी मैंने जो लिखा उसका स्रेत मेरा बचपन रहा है। मेरा बचपन बहुत एकांत में बीता और एकांत ने मुझे लेखक बनाया। दरअसल मैं बच्चों के एकाकीपन को गहराई से जानता हूं। मैंने कई बच्चों का जीवन करीब से देखा और पाया कि बड़ों से कहीं अधिक उनका जीवन संघर्षशील होता है। मेरी ज्यादातर कहानियां वास्तविकता पर आधारित हैं। उन सभी कहानियों में जीवन की संघर्ष, पीड़ा और संवेदना का स्वर दिखाई देगा। मेरा बचपन पहाड़ों में बीता यह भी एक कारण था कि मैं बाल साहित्य में अधिक आसानी से उतर पाया क्योंकि बच्चों की दुनिया में प्रकृति की अहम भूमिका होती है जो मुझे नैसर्गिक रूप से मिली। मैंने पाया कि बच्चे बहुत प्राकृतिक होते हैं। वे पर्वत की तरह कठोर और फूल की तरह कोमल होते हैं। आज हालत यह है कि मैं लिखने को कुछ और बैठता हूं किंतु लिखते-लिखते बालकथा ही लिख देता हूं।
बाल साहित्य को अमूमन वह सम्मान हासिल नहीं हो पाता जिसका वह हकदार है। कुछ लोग बाल साहित्य को दोयम दज्रे का साहित्य मानते रहे हैं। इस पर आपका क्या मत क्या है?
मेरा तो यही मानना है कि बाल साहित्य सबसे कठिन विधा है। बच्चों को आप शब्दजाल में नहीं बांध सकते। बड़े तो आपको शायद दो-चार पन्ना मौका दे भी दें लेकिन बच्चों को अगर कोई रचना शुरू से ही रोचक और सरस नहीं लगी तो वे दूसरे पन्ने को हाथ भी नहीं लगाएंगे। बच्चों के लिए लिखने में सख्त अनुशासन की जरूरत होती है। उनके लिए लिखना इसलिए भी कठिन है क्योंकि उनके विचारों में ताजगी और सवालों में ईमानदारी झलकती है। कोई बच्चा अगर आपके लेखन की प्रशंसा कर दे तो किसी आलोचक के आपके पक्ष में लिखे गए हजार शब्दों से वह बेहतर है। मैं एक बार एक स्कूल में गया। वहां के टीचर ने एक बच्ची से पूछा कि तुम्हें रस्किन कैसा लेखक लगता है। बच्ची ने कहा-' सो-सो। ही इज नॉट ए बैड राइटर'। इस टिप्पणी को मैं अपने लिए सबसे बड़ी प्रशंसा मानता हूं।
आप बाल साहित्य लिखते समय किन बातों का खास ध्यान रखते हैं?
सबसे पहले तो यह कि कथा पात्र अच्छे ढंग से चित्रित्र हो सकें। पात्र सशक्त और विश्वसनीय हों। कहानी उपदेशों के बजाय दिलचस्प हो। क्या सही है और क्या गलत- यह नैतिक प्रश्न रोचक तरीके से सामने आए। कहानी में अर्थपरकता के साथ साथ संतुष्ट करने का भाव हो। कुछ नया करने और हास्य प्रकरण भी हों। फिर मैं ऐसे पात्रों को रखना चाहता हूं, जो स्वाबलंबी और स्वयं के बारे में सोचने की क्षमता रखते हों। कहानी लिखने के पहले दिलचस्प चरित्रों को खोजता रहता हूं। अच्छी बात यह है कि मुझे अक्सर ये अपने परिवार और आसपास के लोगों में ही मिल जाते हैं।
आज के बाल लेखन के बारे में क्या सोचते हैं? क्या नये लेखकों ने इस विधा के साथ पूरा इंसाफ किया है?
बाल साहित्य में पूरा प्रयास नहीं किया जा रहा। इक्का-दुक्का नाम ही गंभीर हैं। बाल साहित्यकार को पूर्णतया समर्पित होना चाहिए। पश्चिमी देशों से तुलना करें तो पाएंगे कि हमारा बाल साहित्य गुणवत्ता में बहुत पीछे है। यूरोप और अमेरिका में बाल साहित्य के प्रति लेखक गंभीर हैं। हमारे यहां बांग्ला साहित्य में भी बाल साहित्य को गंभीरता से देखा जाता है।
आपने पहली बार कब और क्या लिखा था?
उस समय मैं स्कूल में ही था। मैंने मजाकिया पुट में अपने स्कूल, टीचर और हेडमास्टर के बारे में एक कहानी जैसी बना डाली और शीर्षक दे डाला-'हेडमास्टर'। दोस्तों ने इसे टीचर को दिखा दिया। फिर बात हेडमास्टर तक पहुंची और उन्होंने कहानी फाड़ डाली क्योंकि उसमें उनके बारे में सचाई से काफी कुछ लिखा हुआ था। हालांकि मेरे स्कूल की पढ़ाई अच्छी थी और वहां की लाइब्रेरी भी समृद्ध थी जहां मैं बेठकर कुछ न कुछ लिखता-पढ़ता रहता।
आपको प्रेरित करने वाले लेखक कौन-कौन रहे।
जब मैं छोटा था तो वार्लपोल और चार्ल्स डिकिंस ने मुझे बहुत प्रभावित किया। ये दोनों आज भी मेरे चहेते हैं। भारतीय लेखकों में टैगोर के नाटकों और कविताओं को खूब पढ़ा। मुल्कराज आनंद भी मेरे चहेते लेखक हैं। इसक अलावा कई ऐसे नाम जिन्हें ज्यादातर लोग भूल चुके हैं, मुझे बेहद प्रभावित करने वाले रहे। इनमें कमल माकन, भवानी भट्टाचार्य, जीवी देशानी शामिल हैं। कैरुप और मार्क ट्वेन का भी मैं नाम लेना चाहूंगा, जिन्होंने मुझमें लेखक का शऊर पैदा किया।
आप पूरी दुनिया में लोकप्रिय हैं लेकिन मसूरी को आपने नहीं छोड़ा है। इसकी क्या वजह है?
मैं चालीस सालों से यहां हूं और अब लगता है कि पहाड़ ही मेरा वजूद है। शायद मैं यहां रहा, इसलिए जिंदा हूं। यहां के सौंदर्य और शांति का कोई मुकाबला नहीं। हालांकि इधर काफी बदलाव हुए हैं और पहाड़ वैसा नहीं रहा जैसा पहले था फिर भी यह इतना सुंदर तो है ही कि इसके सौंदर्य में दिन-रात डूबा रहा जा सकता है।
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