यह अ™ोय, केदारनाथ अग्रवाल, नागाजरुन एवं उपेन्द्रनाथ अश्क और फैज अहमद फैज जैसे महत्वपूर्ण कवि-लेखकों का जन्मशती वर्ष है। इन सबके अवदान पर र्चचा से पूर्व आधुनिक हिंदी कविता को समृद्ध करने वाले महत्वपूर्ण कवियों पर भी समालोचकों को ध्यान देने की आवश्यकता है। प्रख्यात आलोचक प्रो. गोपेश्वर सिंह के एक लेख 'लोकप्रिय बनाम कठिन कविता' हिंदी आलोचना की अशक्त आंखों की तरफ इशारा करता है। लेखक की चिंता सार्थक है जिसके कारण उन्हें महसूस होता है कि समकालीन हिंदी कवि तो पुरस्कृत होते हैं किंतु कविता तिरस्कृत होती है। हिंदी समाज की अकृतज्ञता से लेखक रू-ब-रू हैं जिसे उन्होंने अपने लेख में उद्धृत भी किया है, आज का हिंदी समाज स्मृतिहीन और जातीय स्मृति-क्षीणता के दौर से गुजर रहा है। लेखक इस चिंता के बहाने लोकप्रिय बनाम कठिन कविता की सार्थकता पर नई बहस के अवसर पैदा किए हैं। लेकिन इस आलेख से पूर्व प्रख्यात आलोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी जी इस सवाल को बहुत ही गंभीरता से 'सामयिक मीमांसा' एवं समकालीन भारतीय साहित्य पत्रिका में क्रमश: 'दिनकर और दिल्ली' एवं 'लोकप्रिय और कविता' नामक लेख में उठा चुके हैं। तिवारी जी का कहना है कि लोकप्रिय रचनाएं समाज और इतिहास के भीतर से निकलती हैं तथा कविता और श्रोता समाज का एक परंपरागत संबंध सूत्र है जो अब टूट गया है। अब सुनने वाले समाज के बदले पढ़ने वाली पब्लिक आ गई है और अब श्रोता समाज नहीं रहा। उन्होंने कविता की लोकप्रियता या सार्वजनिकता के लोप के कारणों को समझने का एक सूत्र अ™ोय के माध्यम से प्रस्तावित किया है जो कहता है कि अब आस्वाद प्रक्रिया के बदले आलोचनात्मक मूल्यांकन की प्रक्रिया का आगमन हुआ है। यानी कविता केवल आस्वाद नहीं है। पाठक उसे पढ़ते हुए आलोचनात्मक मूल्यांकन भी करता है। प्रो. तिवारी के अनुसार तीसरा सूत्र है कि कविता लिखने में कवि जितना अकेला होता है, पढ़ने में पाठक भी उतना ही अकेला होता है। यानी कविता और श्रोता समाज के बीच जो सामूहिकता थी, वह हाशिए पर चली गई। प्रो. तिवारी ने लोकप्रियता के बहाने दिनकर और बच्चन की कविताओं की जड़ों को तलाशने की भी कोशिश की है। वह कहते हैं कि 'श्रोता समाज या लोकप्रिय साहित्य स्वाधीनता आंदोलन और नवजागरण के ऐतिहासिक दवाब से उभरा था। भाषण और वक्तृत्व की भूमिका उस आंदोलनात्मक दौर में बहुत प्रभावी और परिवर्तनकारी थी। यह सुननेवाला 'श्रोता-समाज' कथा-वार्ता या धर्म-वार्ता वाला नहीं था। इसकी कुछ विशेषताएं थीं। वह बहुत व्यापक था। उसमें निरक्षर, साक्षर, विद्वान और चिंतक एक साथ शामिल थे। उसमें राजनीतिक चेतना और जाने-अनजाने आधुनिकता का आयाम था। वह इतिहास के विशेष दौर में उभरा और सक्रिय हुआ था। उसमें अकूत परिवर्तनकारी संभावनाएं थीं।'
लोकप्रियता सामूहिकता की देन है। प्रो. गोपेश्वर सिंह ने आचार्य शुक्ल की टिप्पणी उद्धृत की है कि 'सभ्यता के विकास के साथ भविष्य में कविकर्म कठिन हो जाएगा। शुक्ल जी की मान्यता थी कि आधुनिक युग जटिलताओं का युग होगा और कविता जटिल और कठिन होती जाएगी लेकिन उनका अनुमान गलत निकला। आज प्रतिदिन नए कवि का आगमन हो रहा है। लेखक ने कहा है कि हिंदी काव्य परंपरा में श्रेष्ठता और लोकप्रियता में कभी बैर कभी नहीं रहा। जो श्रेष्ठ थे वे लोकप्रिय भी थे। नई कवितावादियों ने छायावादोत्तर कवियों की रचनाओं को उत्कृष्ट नहीं माना। दरअसल हिंदी आलोचना की कमजोर आंखों के कारण लोकप्रिय कवि समीक्षा संकट के शिकार रहे या हाशिए पर ठेल दिए गए। लेखक ने यह स्पष्ट नहीं किया कि क्या कारण रहे हैं जिसके चलते लोकप्रिय या सार्वजनिक कवि का समाज से लोप हुआ। जबकि स्वयं नई कवितावादियों की कविता असंप्रेषणीय होने की वजह से जनप्रिय नहीं बन पाई। मुक्तिबोध और अ™ोय की लगभग सभी कविताएं असंप्रेषणीय होने की वजह से आज तक अलोकप्रिय खाते की कविता बनकर रह गई हैं। अगर इन कवियों की कविताएं विश्वविद्यालय के एमए पाठय़क्रम में शामिल न हों तो शायद ही इनके नवीन संस्करण प्रकाशित हो पाएं। एक बात और कि नई कवितावादी भी जीवन भर कविता की संप्रेषणीयता पर बल देते रहे। यानी उन्हें आभास था कि संप्रेषणहीन कविता किसी काम की नहीं रह पाएगी। प्रो. गोपेश्वर सिंह का कहना कि हिंदी कविता को विकसित और समृद्ध करने में सार्वजनिक कवियों की ऐतिहासिक भूमिका है, सौ फीसद सार्थक टिप्पणी है। उन्होंने जो लोकप्रिय कवियों की सूची बनायी वह भी सही है। जिसमें मंचीय कवि को असग रखा है। नई कवितावादियों की कविता बौद्धिक-चिंतन की कठोरता के कारण ही कठिन कविता की श्रेणी में शामिल हो गई। हिंदी आलोचना के भीतर कुछ खास पार्टीबद्ध खलनायक आलोचकों के प्रवेश के कारण ही लोकप्रिय या सार्वजनिक कवि हाशिए पर ठेले गये। लेकिन जनता की टोकरी में बैठने के कारण लोकप्रिय या सार्वजनिक कवि हमेशा उद्धरणशील बने रहेंगे। इस बात से कोई भी पाठक या हिंदी प्रेमी अस्वीकार नहीं कर सकता कि कविता की अगली राह जूही और चमेली के कुंज से होकर नहीं प्रत्युत संघर्ष बुद्धि की कड़ी चट्टान पर से जाने वाली है। अंत में प्रो. गोपेश्वर सिंह एवं प्रो. नित्यानंद तिवारी ने लोकप्रिय और कठिन कविता जैसा अवधारणात्मक विमर्श पैदा कर एक तरह हिंदी का भला ही किया है।