Monday, April 25, 2011

लोकप्रियता के बहाने आधुनिक कविता


यह अोय, केदारनाथ अग्रवाल, नागाजरुन एवं उपेन्द्रनाथ अश्क और फैज अहमद फैज जैसे महत्वपूर्ण कवि-लेखकों का जन्मशती वर्ष है। इन सबके अवदान पर र्चचा से पूर्व आधुनिक हिंदी कविता को समृद्ध करने वाले महत्वपूर्ण कवियों पर भी समालोचकों को ध्यान देने की आवश्यकता है। प्रख्यात आलोचक प्रो. गोपेश्वर सिंह के एक लेख 'लोकप्रिय बनाम कठिन कविता' हिंदी आलोचना की अशक्त आंखों की तरफ इशारा करता है। लेखक की चिंता सार्थक है जिसके कारण उन्हें महसूस होता है कि समकालीन हिंदी कवि तो पुरस्कृत होते हैं किंतु कविता तिरस्कृत होती है। हिंदी समाज की अकृतज्ञता से लेखक रू-ब-रू हैं जिसे उन्होंने अपने लेख में उद्धृत भी किया है, आज का हिंदी समाज स्मृतिहीन और जातीय स्मृति-क्षीणता के दौर से गुजर रहा है। लेखक इस चिंता के बहाने लोकप्रिय बनाम कठिन कविता की सार्थकता पर नई बहस के अवसर पैदा किए हैं। लेकिन इस आलेख से पूर्व प्रख्यात आलोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी जी इस सवाल को बहुत ही गंभीरता से 'सामयिक मीमांसा' एवं समकालीन भारतीय साहित्य पत्रिका में क्रमश: 'दिनकर और दिल्ली' एवं 'लोकप्रिय और कविता' नामक लेख में उठा चुके हैं। तिवारी जी का कहना है कि लोकप्रिय रचनाएं समाज और इतिहास के भीतर से निकलती हैं तथा कविता और श्रोता समाज का एक परंपरागत संबंध सूत्र है जो अब टूट गया है। अब सुनने वाले समाज के बदले पढ़ने वाली पब्लिक आ गई है और अब श्रोता समाज नहीं रहा। उन्होंने कविता की लोकप्रियता या सार्वजनिकता के लोप के कारणों को समझने का एक सूत्र अोय के माध्यम से प्रस्तावित किया है जो कहता है कि अब आस्वाद प्रक्रिया के बदले आलोचनात्मक मूल्यांकन की प्रक्रिया का आगमन हुआ है। यानी कविता केवल आस्वाद नहीं है। पाठक उसे पढ़ते हुए आलोचनात्मक मूल्यांकन भी करता है। प्रो. तिवारी के अनुसार तीसरा सूत्र है कि कविता लिखने में कवि जितना अकेला होता है, पढ़ने में पाठक भी उतना ही अकेला होता है। यानी कविता और श्रोता समाज के बीच जो सामूहिकता थी, वह हाशिए पर चली गई। प्रो. तिवारी ने लोकप्रियता के बहाने दिनकर और बच्चन की कविताओं की जड़ों को तलाशने की भी कोशिश की है। वह कहते हैं कि 'श्रोता समाज या लोकप्रिय साहित्य स्वाधीनता आंदोलन और नवजागरण के ऐतिहासिक दवाब से उभरा था। भाषण और वक्तृत्व की भूमिका उस आंदोलनात्मक दौर में बहुत प्रभावी और परिवर्तनकारी थी। यह सुननेवाला 'श्रोता-समाज' कथा-वार्ता या धर्म-वार्ता वाला नहीं था। इसकी कुछ विशेषताएं थीं। वह बहुत व्यापक था। उसमें निरक्षर, साक्षर, विद्वान और चिंतक एक साथ शामिल थे। उसमें राजनीतिक चेतना और जाने-अनजाने आधुनिकता का आयाम था। वह इतिहास के विशेष दौर में उभरा और सक्रिय हुआ था। उसमें अकूत परिवर्तनकारी संभावनाएं थीं।'
लोकप्रियता सामूहिकता की देन है। प्रो. गोपेश्वर सिंह ने आचार्य शुक्ल की टिप्पणी उद्धृत की है कि 'सभ्यता के विकास के साथ भविष्य में कविकर्म कठिन हो जाएगा। शुक्ल जी की मान्यता थी कि आधुनिक युग जटिलताओं का युग होगा और कविता जटिल और कठिन होती जाएगी लेकिन उनका अनुमान गलत निकला। आज प्रतिदिन नए कवि का आगमन हो रहा है। लेखक ने कहा है कि हिंदी काव्य परंपरा में श्रेष्ठता और लोकप्रियता में कभी बैर कभी नहीं रहा। जो श्रेष्ठ थे वे लोकप्रिय भी थे। नई कवितावादियों ने छायावादोत्तर कवियों की रचनाओं को उत्कृष्ट नहीं माना। दरअसल हिंदी आलोचना की कमजोर आंखों के कारण लोकप्रिय कवि समीक्षा संकट के शिकार रहे या हाशिए पर ठेल दिए गए। लेखक ने यह स्पष्ट नहीं किया कि क्या कारण रहे हैं जिसके चलते लोकप्रिय या सार्वजनिक कवि का समाज से लोप हुआ। जबकि स्वयं नई कवितावादियों की कविता असंप्रेषणीय होने की वजह से जनप्रिय नहीं बन पाई। मुक्तिबोध और अोय की लगभग सभी कविताएं असंप्रेषणीय होने की वजह से आज तक अलोकप्रिय खाते की कविता बनकर रह गई हैं। अगर इन कवियों की कविताएं विश्वविद्यालय के एमए पाठय़क्रम में शामिल न हों तो शायद ही इनके नवीन संस्करण प्रकाशित हो पाएं। एक बात और कि नई कवितावादी भी जीवन भर कविता की संप्रेषणीयता पर बल देते रहे। यानी उन्हें आभास था कि संप्रेषणहीन कविता किसी काम की नहीं रह पाएगी। प्रो. गोपेश्वर सिंह का कहना कि हिंदी कविता को विकसित और समृद्ध करने में सार्वजनिक कवियों की ऐतिहासिक भूमिका है, सौ फीसद सार्थक टिप्पणी है। उन्होंने जो लोकप्रिय कवियों की सूची बनायी वह भी सही है। जिसमें मंचीय कवि को असग रखा है। नई कवितावादियों की कविता बौद्धिक-चिंतन की कठोरता के कारण ही कठिन कविता की श्रेणी में शामिल हो गई। हिंदी आलोचना के भीतर कुछ खास पार्टीबद्ध खलनायक आलोचकों के प्रवेश के कारण ही लोकप्रिय या सार्वजनिक कवि हाशिए पर ठेले गये। लेकिन जनता की टोकरी में बैठने के कारण लोकप्रिय या सार्वजनिक कवि हमेशा उद्धरणशील बने रहेंगे। इस बात से कोई भी पाठक या हिंदी प्रेमी अस्वीकार नहीं कर सकता कि कविता की अगली राह जूही और चमेली के कुंज से होकर नहीं प्रत्युत संघर्ष बुद्धि की कड़ी चट्टान पर से जाने वाली है। अंत में प्रो. गोपेश्वर सिंह एवं प्रो. नित्यानंद तिवारी ने लोकप्रिय और कठिन कविता जैसा अवधारणात्मक विमर्श पैदा कर एक तरह हिंदी का भला ही किया है।


मेरे लेखन की प्रेरणा मेरा बचपन


बच्चों के चहेते लेखक रस्किन बॉण्ड का चेहरा उन्हें सांताक्लॉज की तरह लगता है। रस्किन ब्रितानी थे लेकिन लंदन उन्हें रास नहीं आया। विपुल साहित्य रचते हुए उन्होंने अपना पूरा जीवन शिमला, मसूरी और देहरादून की वादियों में गुजारा है। उनकी असली पहचान बच्चों के दोस्त लेखक के रूप में है। और प्राय: सारी रचनाओं में प्रकृति और हिमालय की गोद में बसे छोटे शहरों के जनजीवन की छाप मिलती है। उन्हें साहित्य के लिए ढेरों पुरस्कार मिले जिनमें पद्मश्री भी शामिल है। पेश है उनसे एक बातचीत।
इधर आई आपकी रचनाओं पर गौर करें तो बाल रचनाओं का प्रतिशत बढ़ा ही दिखता है। उम्र के 77वें पड़ाव पर भी बच्चों के लिए इतना ताजगी भरा लेखन कैसे संभव हो पाता है?
जैसे-जैसे बुढ़ापा बढ़ता जा रहा है बचपन शिद्दत से मेरे करीब आता जा रहा है। साइकोलॉजिकल फेनोमिना भी बताता है कि उम्र के अंतिम दो दशकों में हम बूढ़े नहीं बल्कि बच्चे हो जाते हैं। यही वजह है कि बच्चे अपने माता-पिता और युवा पारिवारिक सदस्यों से अधिक दादा-दादी, नाना-नानी से चिपके रहते हैं। हां! यह जरूर है कि आज के दौर में परिवार का स्वरूप बदली है और बच्चे अपनी जगह कंप्यूटर, टीवी, वीडियो गेम में अधिक तलाशते हैं।
आपने गद्य और पद्य दोनों विधाओं में पर्याप्त लेखन किया लेकिन असली सफलता बाल साहित्य में मिली। बाल साहित्य की ओर आने की प्रेरणा कहां से मिली?
बच्चों ही नहीं बड़ों के लिए भी मैंने जो लिखा उसका स्रेत मेरा बचपन रहा है। मेरा बचपन बहुत एकांत में बीता और एकांत ने मुझे लेखक बनाया। दरअसल मैं बच्चों के एकाकीपन को गहराई से जानता हूं। मैंने कई बच्चों का जीवन करीब से देखा और पाया कि बड़ों से कहीं अधिक उनका जीवन संघर्षशील होता है। मेरी ज्यादातर कहानियां वास्तविकता पर आधारित हैं। उन सभी कहानियों में जीवन की संघर्ष, पीड़ा और संवेदना का स्वर दिखाई देगा। मेरा बचपन पहाड़ों में बीता यह भी एक कारण था कि मैं बाल साहित्य में अधिक आसानी से उतर पाया क्योंकि बच्चों की दुनिया में प्रकृति की अहम भूमिका होती है जो मुझे नैसर्गिक रूप से मिली। मैंने पाया कि बच्चे बहुत प्राकृतिक होते हैं। वे पर्वत की तरह कठोर और फूल की तरह कोमल होते हैं। आज हालत यह है कि मैं लिखने को कुछ और बैठता हूं किंतु लिखते-लिखते बालकथा ही लिख देता हूं।
बाल साहित्य को अमूमन वह सम्मान हासिल नहीं हो पाता जिसका वह हकदार है। कुछ लोग बाल साहित्य को दोयम दज्रे का साहित्य मानते रहे हैं। इस पर आपका क्या मत क्या है?
मेरा तो यही मानना है कि बाल साहित्य सबसे कठिन विधा है। बच्चों को आप शब्दजाल में नहीं बांध सकते। बड़े तो आपको शायद दो-चार पन्ना मौका दे भी दें लेकिन बच्चों को अगर कोई रचना शुरू से ही रोचक और सरस नहीं लगी तो वे दूसरे पन्ने को हाथ भी नहीं लगाएंगे। बच्चों के लिए लिखने में सख्त अनुशासन की जरूरत होती है। उनके लिए लिखना इसलिए भी कठिन है क्योंकि उनके विचारों में ताजगी और सवालों में ईमानदारी झलकती है। कोई बच्चा अगर आपके लेखन की प्रशंसा कर दे तो किसी आलोचक के आपके पक्ष में लिखे गए हजार शब्दों से वह बेहतर है। मैं एक बार एक स्कूल में गया। वहां के टीचर ने एक बच्ची से पूछा कि तुम्हें रस्किन कैसा लेखक लगता है। बच्ची ने कहा-' सो-सो। ही इज नॉट ए बैड राइटर'। इस टिप्पणी को मैं अपने लिए सबसे बड़ी प्रशंसा मानता हूं।
आप बाल साहित्य लिखते समय किन बातों का खास ध्यान रखते हैं?
सबसे पहले तो यह कि कथा पात्र अच्छे ढंग से चित्रित्र हो सकें। पात्र सशक्त और विश्वसनीय हों। कहानी उपदेशों के बजाय दिलचस्प हो। क्या सही है और क्या गलत- यह नैतिक प्रश्न रोचक तरीके से सामने आए। कहानी में अर्थपरकता के साथ साथ संतुष्ट करने का भाव हो। कुछ नया करने और हास्य प्रकरण भी हों। फिर मैं ऐसे पात्रों को रखना चाहता हूं, जो स्वाबलंबी और स्वयं के बारे में सोचने की क्षमता रखते हों। कहानी लिखने के पहले दिलचस्प चरित्रों को खोजता रहता हूं। अच्छी बात यह है कि मुझे अक्सर ये अपने परिवार और आसपास के लोगों में ही मिल जाते हैं।
आज के बाल लेखन के बारे में क्या सोचते हैं? क्या नये लेखकों ने इस विधा के साथ पूरा इंसाफ किया है?
बाल साहित्य में पूरा प्रयास नहीं किया जा रहा। इक्का-दुक्का नाम ही गंभीर हैं। बाल साहित्यकार को पूर्णतया समर्पित होना चाहिए। पश्चिमी देशों से तुलना करें तो पाएंगे कि हमारा बाल साहित्य गुणवत्ता में बहुत पीछे है। यूरोप और अमेरिका में बाल साहित्य के प्रति लेखक गंभीर हैं। हमारे यहां बांग्ला साहित्य में भी बाल साहित्य को गंभीरता से देखा जाता है।
आपने पहली बार कब और क्या लिखा था?
उस समय मैं स्कूल में ही था। मैंने मजाकिया पुट में अपने स्कूल, टीचर और हेडमास्टर के बारे में एक कहानी जैसी बना डाली और शीर्षक दे डाला-'हेडमास्टर'। दोस्तों ने इसे टीचर को दिखा दिया। फिर बात हेडमास्टर तक पहुंची और उन्होंने कहानी फाड़ डाली क्योंकि उसमें उनके बारे में सचाई से काफी कुछ लिखा हुआ था। हालांकि मेरे स्कूल की पढ़ाई अच्छी थी और वहां की लाइब्रेरी भी समृद्ध थी जहां मैं बेठकर कुछ न कुछ लिखता-पढ़ता रहता।
आपको प्रेरित करने वाले लेखक कौन-कौन रहे।
जब मैं छोटा था तो वार्लपोल और चार्ल्स डिकिंस ने मुझे बहुत प्रभावित किया। ये दोनों आज भी मेरे चहेते हैं। भारतीय लेखकों में टैगोर के नाटकों और कविताओं को खूब पढ़ा। मुल्कराज आनंद भी मेरे चहेते लेखक हैं। इसक अलावा कई ऐसे नाम जिन्हें ज्यादातर लोग भूल चुके हैं, मुझे बेहद प्रभावित करने वाले रहे। इनमें कमल माकन, भवानी भट्टाचार्य, जीवी देशानी शामिल हैं। कैरुप और मार्क ट्वेन का भी मैं नाम लेना चाहूंगा, जिन्होंने मुझमें लेखक का शऊर पैदा किया।
आप पूरी दुनिया में लोकप्रिय हैं लेकिन मसूरी को आपने नहीं छोड़ा है। इसकी क्या वजह है?
मैं चालीस सालों से यहां हूं और अब लगता है कि पहाड़ ही मेरा वजूद है। शायद मैं यहां रहा, इसलिए जिंदा हूं। यहां के सौंदर्य और शांति का कोई मुकाबला नहीं। हालांकि इधर काफी बदलाव हुए हैं और पहाड़ वैसा नहीं रहा जैसा पहले था फिर भी यह इतना सुंदर तो है ही कि इसके सौंदर्य में दिन-रात डूबा रहा जा सकता है।



आराधना क्यों अज्ञेय की?


इस समाज का चरित्र कुछ अजीब ही होता जा रहा है। धार्मिक देवपूजा ही नहीं बढ़ती जा रही है, सांस्कृतिक व्यक्तित्वों के प्रति हमारा पूजाभाव भी बढ़ता जा रहा है और इस पूजाभाव के चलते हमने प्रसिद्ध हुए लोगों को आब्जेक्टिव होकर देखना छोड़ दिया है। साहित्य में यह परिदृश्य चकित करने वाला है। कुछ साहित्यकार पिछले बरस ही सौ वर्ष पूरे कर चुके थे लेकिन पिछले साल यह याद नहीं आया था। इस साल याद आया तो बहुत शिद्दत के साथ। मैं नहीं जानता विदेशों में शती का क्या रिवाज है पर भारत में उत्सवधर्मिता का अध्ययन होना चाहिए। जन्मशती का अवसर किसी लेखक के संदर्भ में क्या सिर्फ इसलिए होना चाहिए कि वह पूजनीय हो चुका है और नई पीढ़ी को उसके चरण चिह्नों पर चलते रहना चाहिए यानी जो कुछ उसने सोचा वही सोचते रहना चाहिए और जो कुछ उसने लिखा उसे अपने लेखन की सीमा मान लेना चाहिए? यह मान कर चलना चाहिए कि जो सौ साल पहले एक लेखक जो कुछ लिख दिया था वही लेखन की अंतिम सीमा है? हिंदी में कुछ अरसा पहले प्रेमचंद को लेकर यही स्थिति पैदा हो गई थी। कुछ लेखकों ने तो इस मुद्दे को आजीवन शत्रुता का अभियान ही बना लिया था। प्रेमचंद उर्दू कहानी लेखकों के लिए बड़े सम्मानित आदि पुरुष हैं लेकिन उर्दू ने उन्हें लेखन की अंतिम सीमा नहीं माना था और तभी उर्दू में अली अब्बास हुसैनी और हयातुल्ला अंसारी से लेकर मंटो, बेदी, किशन चंदर, इस्मत चुगताई और उनके बाद के दर्जनों कद्दावर कथाकार पैदा हुए। यहां जिनकी जन्मशती इसी बरस याद की जा रही है उन फैज अहमद फैज की याद दिलाना चाहूंगा। वह उर्दू के सबसे बड़े शायरों में से एक हैं, जिन्हें भारत में भी चाहने वाले करोड़ों हैं जबकि भारत के ही हिंदी कवि शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल या अज्ञेय को जानने वाले लाखों भी मुश्किल से ही मिलेंगे। खैर फैज, प्रेमचंद का नाम बहुत इज्जत से लेते थे लेकिन हिंदी की तरह उन्हें देवता की तरह पूजते नहीं थे। फैज ने उनकी कई बातों के लिए कड़ी आलोचना भी की थी। ठीक यही देवपूजा हिंदी में शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल और अज्ञेय को लेकर देखने में आ रही है। शमशेर और केदार पर जो उत्सव हो रहे हैं, उनमें देवाराधन की प्रवृत्ति के बावजूद शालीनता और गंभीरता है लेकिन अज्ञेय को लेकर हिंदी में जो कुछ हो रहा है, वह कुछ हद तक बजरंग दल के अभियानों की याद दिलाता है। यह देखकर दुख होता है कि अज्ञेय में लगभग रामजन्मभूमि देखी जा रही है। अज्ञेय जितने के हकदार हैं उससे ज्यादा ही उन्हें मिला है और पश्चिम के वामपंथ विरोधी संगठन कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम में शरीक हो जाने के बाद के सुखों का तो जिक्र ही क्या। एक बार खुद डा. लोहिया ने मेरे अज्ञेय विरोध पर सवाल किया था- 'क्या तुम अज्ञेय को विदेशी यानी अमेरिकी एजेंट मानते हो?'मैंने कहा-'अज्ञेय जब कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के लिए काम करते हैं तो और क्या हो सकते हैं?'
डाक्टर लोहिया के घर पर साप्ताहिक जन गोष्ठी में अज्ञेय कभी नहीं बुलाए गए थे। लेकिन अज्ञेय की देवपूजा करने वाला हिंदी समाज रामजन्मभूमि आंदोलन शुरू होने के साथ ही जानकी यात्रा करता है, इसको सामने क्यों नहीं रखा जाना चाहिए? उनकी कविताओं और उपन्यासों के साथ इस बात की र्चचा भी क्यों नहीं होनी चाहिए कि जानकी यात्रा पर संपादित उनकी पुस्तक में उन्होंने जो लिखा है वह कितने बड़े अंधविश्वास को ठीक विहिप की भाषा में दुहराता है? एकाध उदाहरण ही सिद्ध करने के लिए काफी होंगे-'जिसके अंत में विष्णु स्वरूप राम एक प्रभादीप्त तेजोमण्डल में आत्मस्थ हो जाते हैं।.. इसी के साथ सब देव-देवता, यक्ष-नाग, ऋषि, सिद्ध और मानुष मात्र हैं जो ऐसे अवसरों पर अगत्या उपस्थित होते हैं और सम्मोहित से ताकते रह जाते हैं। .. राम और सीता ऐसे ही अवतारी सनातन चरित्र हैं जिनका जीवन नियति का निर्धारण करने वाले क्षणों की सतत परंपरा है।'
अज्ञेय का इस तरह राम भक्त हो जाना और वह भी तब जब अयोध्या में साम्प्रदायिक आंदोलन शुरू हो चुका हो, यह आखिर अज्ञेय शती के मौके पर क्यों उपेक्षित किया गया? और आखिर हिंदी साहित्य 21वीं सदी में किस तरह अज्ञेय की देव पूजा पर आमादा हुआ? क्या यह इसका संकेत नहीं है कि हिंदी बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग अंदर से सांप्रदायिक हिंदू है?


Monday, April 18, 2011

मंचीय-गैर मंचीय कविता के नफा-नुकसान


मंचीय और गैर मंचीय कवियों के बीच जो खाई बनी है, उसे पाटने की कोशिश होनी चाहिए ताकि दोनों धाराएं निर्बाध एक दूसरे की सीमा में प्रवेश कर सके
साहित्यिक खेमेबाजी के रूप में मंचीय-गैर मंचीय कवियों के बीच एक अघोषित लकीर हमेशा से रही है जो कई मौकों पर विवाद का कारण भी बनती रही है। कई बार विवाद इतना गहरा हो जाता है कि आम-खास पाठकों को भी दोनों के बीच की खाई साफ नजर आती है। मंचीय-गैरमंचीय कविता के बीच होने वाले इस भेद भाव की कीमत ही आज अनेक प्रतिभाशाली कवि चुका रहे हैं अन्यथा इनकी कविताओं पर भी अकादमिक र्चचा हो सकती है। इस भेदभाव का शिकार प्रमोद तिवारी और विनय विश्वास जैसे तमाम कवियों की पीड़ा है कि साहित्य के क्षेत्र में मंचीय-गैर मंचीय या साहित्यिक-गैर साहित्यिक जैसी लकीर का कोई अर्थ नहीं है। मंच की कविता भी साहित्यिक पत्रिकाओं में सराही जा सकती है। साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने वाले कवियों की कविताएं मंच की वाहवाही लूट सकती हैं। विश्वास ने अपने स्तर पर एक प्रयास भी किया है। वे मंच से राजेश जोशी, हेमंत कुकरेती, बद्रीनारायण की पंक्तियों को समय-समय पर अपनी प्रस्तुति में जोड़ते हैं। खास बात यह कि साहित्यिक कवि माने जाने वाले राजेश जोशी, बद्रीनारायण की कविताओं को मंच पर उद्धृत करने पर श्रोताओं की तरफ से कई-कई बार 'एक बार फिर' (वंस मोर) का आग्रह आया है। यदि साहित्यिक पत्रिकाओं के पास अरुण कमल, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, केदारनाथ सिंह, इब्बार रब्बी जैसे कवि हैं तो कविता के दूसरे पलड़े अर्थात मंच पर भी नीरज, सोम ठाकुर, बाल कवि बैरागी, उदय प्रताप सिंह, सुरेंद्र शर्मा जैसे जाने-माने हस्ताक्षर मौजूद हैं। अब मंच और साहित्यिक कविता के दो पलड़ों में कौन सा भारी है, यह कहना मुश्किल होगा। वरिष्ठ हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा इस पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि मेरी राय में मंच का कवि होना, पत्रिकाओं में कविता लिखने से अधिक चुनौतीपूर्ण है। चूंकि साहित्य की कविता का पाठक एक खास तरह का वर्ग होता है लेकिन मंच की कविता सुनने वालों में कुली से लेकर कलेक्टर तक हर स्तर के रसिक मौजूद होते हैं। सुरेंद्र शर्मा गम्भीर साहित्यिक कविताओं पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं 'उस कविता का भी क्या अर्थ माना जाए जो जिस शोषित समाज के लिए लिखी जा रही है, उस समाज की ही समझ में न आए।' अपनी बात को वह एक कविता के रूप में समझाते हुए व्यंग्य करते हैं- 'एक कवि ने पसीना बहाने वालों पर कविता लिखी/पसीना बहाने वालों को समझ में नहीं आई/मुझे समझने में पसीने आ गए।'
मंच पर कवि अपनी रचना के साथ श्रोताओं के सामने होता है। इस तरह श्रोता कवि के सामने अपनी नाराजगी या खुशी प्रकट कर देता है। तालियों की गड़गड़ाहट होती है या फिर कवि हूट होते हैं। यानी कविता का महत्व या परिणाम हाथ के हाथ सरेआम मिल जाता है। यह मंचीय कविता का ही जादू है, कि श्रोता अपने प्रिय कवि को सुनने के लिए पूरी-पूरी रात कवि सम्मेलनों में बैठे रह जाते हैं। नीरज के बारे में मशहूर है कि उनकी महफिल में जो बैठ गया, कार्यक्रम खत्म होने तक उठकर नहीं जा पाया। दूसरी तरफ साहित्यिक कविता के पाठकों के पास त्वरित प्रतिक्रिया का कोई विकल्प नहीं होता। बात मंच के जादू की करें तो गणतंत्र दिवस के मौके पर हर साल लाल किले में आयोजित होने वाले कवि सम्मेलन में जनवरी के महीने में रात के दस बजे से सुबह तीन चार बजे तक ठिठुरती ठंड में भी कविता सुनने के लिए हजारों की संख्या श्रोता में बैठे होते हैं। क्या शालीनता के साथ चलने वाला ऐसा कोई दूसरा आयोजन है, जो इतनी बड़ी संख्या में लोगों को अपने साथ कड़ाके की ठंड में पूरी रात बांध कर रखे। कहने का अभिप्राय सिर्फ इतना ही है कि मंचीय और गैर मंचीय कवियों के बीच जो खाई बनी है, उसे पाटने की कोशिश होनी चाहिए ताकि दोनों धाराएं निर्बाध एक दूसरे की सीमा में प्रवेश कर सकें।


अम्बेडकर का प्रच्छन्न विरोध


अम्बेडकर जयंती के मौके पर एक बात खास तौर से चुभती है कि इतने विशाल हिंदी साहित्य परिसर में जो शख्स पूरी तरह अनुपस्थित दिखता है वह है, सामाजिक समता के लिए आंदोलन करने वाला डॉक्टर अम्बेडकर। जातिवाद, जातीय घृणा और जातीय उत्पीड़न की आधार पुस्तिकामनुस्मृति का अम्बेडकर ने दहन किया था। इसी जातिवाद की याद दिलाने वाली किताब जयशंकर प्रसाद ने लिखी थी कामायनी। जनता को जातिवाद में बांधने की विचारधारा का सीधा वर्णन था। वामपंथी कवि मुक्तिबोध ने भी इस अमानवीय तत्व की आलोचना की थी। हिंदी के समूचे वामपंथी समुदाय में जातिवाद की अमानवीय व्यवस्था पर साफ बात लगभग सिरे से नदारद रही है। प्रेमचंद ने अम्बेडकर के कम्युनल अवार्ड की कड़ी निंदा की थी लेकिन उन पर थोड़ा-सा लिखा भी था पर बाकी हिंदी साहित्यकारों ने अपने लेखन में उन्हें अछूत ही बनाए रखा और शूद्र जाति की समस्या को साहित्य, खास तौर से कविता में कोई जगह नहीं मिली। यह भी ध्यान देने की बात है कि विष्णु खरे आदि कुछ कवियों की कविताओं में दलित विमर्श ने बहुत थोड़ी-सी जगह पाई वहीं वर्तमान हिंदी कविता की मुख्यधारा हिंदू संस्कारों में ही सीमित रही। वह सबसे ज्यादा सहज उपनिषदों की दुनिया में महसूस करती रही। खुद नागाजरुन, जो अर्थवंचित समाज से सबसे ज्यादा गहरे जुड़े रहे थे, दलित विमर्श में सीधे कभी नहीं उतरे। एक और तथ्य बहुत दिलचस्प है। हिंदी उपन्यास के क्षेत्र में गोपाल उपाध्याय या जगदीशचन्द्र जैसे कुछ लेखकों के साठ और सत्तर के दशक में दलित प्रश्न को लेकर खासे अच्छे उपन्यास लिखे लेकिन उन्हें शायद इसीलिए ठीक जगह नहीं मिली कि उनका कथ्य मूलत: दलित विमर्श था। वैसे इस लेखन में रैल्फ एलिसन या टोनी मारिसन के उपन्यासों जैसी वाक तीक्ष्णता बहुत कम है। ऐसा शायद इसलिए कि अत्याचारी समाज के अत्याचार का भरपूर ब्योरा लेने के बावजूद अत्याचारी समुदाय की सामाजिक-सांस्कृतिक पड़ताल बहुत क्षीण है। ध्यान से देखा जाए तो हिंदी के कथा साहित्य और कविता की दुनिया के बीच एक भारी फांक दिखाई देगी। जहां कथा साहित्य दलित प्रश्न पर अपने दरवाजे थोड़े खुले रखता रहा है वहीं कविता का मुख्य परिसर पूरी तरह बंद रहा है। निश्चय ही हमारी-सी असहमतियों के बावजूद प्रेमचंद या निराला इस समस्या को अपने लेखन में उठाते हैं लेकिन हिंदी कविता छायावादी दौर में भी दलित प्रश्न को लेकर चिंतित नहीं हुई। छायावाद के बाद प्रगतिशील और परिमलपंथी कविताओं की धाराओं में से भी अच्छी कविता वहां खड़ी हुई जहां दलित की गंध भी न हो। धर्मवीर भारती के सरोकार, सूरज का सातवां घोड़ा के बावजूद, मुख्यत: महाभारतीय ही थे। अोय ने अपना सरोकार रामजानकी जीवन यात्रा में साफ कर दिया था। यहां इतिहास सबसे ज्यादा बड़ी शिकायत प्रगतिशील लेखकों से करेगा। प्रगतिशील लेखन की सबसे बड़ी हलफ थी देश के वंचित समाज के पक्ष में खड़े होना लेकिन किसी भी तटस्थ बुद्धिजीवी को यह बात हैरान करेगी कि प्रगतिशील लेखन ने अपने आपको दलित विमर्श से दूर रखा। रामविलास शर्मा जैसे लेखकों के लिए तो दलित प्रश्न पूरी तरह अप्रासंगिक लगता रहा। बाकी प्रगतिशील लेखकों का मिजाज भी इससे अलग नहीं था। वे गरीब के पक्ष में है और चूंकि एक ब्राह्मण भी गरीब होता है तो उन्हें दलित प्रश्न पर भी ब्राह्मण ही उल्लेखनीय लगता रहा है। दलित विमर्श पर कुछ कविताओं और उपन्यासों के बावजूद साहित्यकारों ने दलित मुद्दे पर कभी कोई गम्भीर बहस क्यों नहीं छेड़ी? जेएनयू के एक पूर्व अध्यापक (मैनेजर पांडेय)की आलोचना पुस्तक है- साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका। इसमें रेमंड विलियम्स सहित दर्जनों समाजशास्त्रियों का जिक्र है लेकिन देश को प्रासंगिक समाजशास्त्र देने वाले अम्बेडकर का जिक्र कहीं नहीं है। ऐसी ही एक किताब है-कविता के नए प्रतिमान (नामवर सिंह)। यह किताब भी दलित प्रश्न से पूरी दूरी बरतती है। यह एक बड़ा सांस्कृतिक दुर्भाग्य है कि बुद्ध के बाद जो सबसे बड़ा सामाजिक अन्याय का आलोचक विचारक इस देश में हुआ उसके अस्तित्व मात्र को हिंदी बुद्धिजीवी नकारकर चलता है। मैं नहीं जानता यह स्थिति हिंदी की दुनिया में कब और कैसे बदल सकेगी?


Sunday, April 10, 2011

काल के भाल पर शास्त्रीजी


शास्त्रीजी उत्तर छायावादी साहित्यिक परिदृश्य के सम्भवत: सबसे वरिष्ठ विभूति थे। संस्कृत में काव्य रचना से प्रारंभ करने वाले जानकीबल्लभ शास्त्री ने केवल कविता को ही अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं चुना, 'कालिदास' जैसे उपन्यास की रचना के अतिरिक्त कहानी, संस्मरण, निबंध और आलोचना में भी उनकी लेखनी की विशिष्टता अपनी अलग पहचान दिखाती है। 2 जनवरी, 1916 ई. को गया जिले के मैगरा गांव में जन्मे शास्त्री जी संस्कृत में ही काव्य रचना में प्रवृत्त रहते लेकिन निराला जी के सम्पर्क में आने के पश्चात उनके साहित्यिक फलक पर हिन्दी का रंग चढ़ा। कला को कलाकार की मजदूरी नहीं मजबूरी मानने वाले शास्त्री जी को साहित्यिक जगत में वह कभी नहीं मिल सका जो उनका प्राप्य था। भारत-भारती जैसा बड़ा पुरस्कार भी उन्हें उम्र के उस पड़ाव पर आकर मिला जब कोई सम्मान-पुरस्कार उनकी रचनात्मकता के लिए सर्वथा महत्वहीन हो चुका था। उन्हें इस बात का बड़े गहरे अहसास भी था, लेकिन किसी बात का पछतावा नहीं, 'युग स्वान्त: सुखाय लेखन का नहीं है। सो निजता बचाने की कीमत चुकानी पड़ी, अंधेरी तन्हाइयों में रहकर, उथली गहराइयों में ऊभ-चूभ होकर। बुनियादी सरोकारों से सुलह सम्भव न हुई। पछतावा मैंने नहीं लिखा है। अपना मजाक उड़ाने का एक और ही मजा है। दूसरों के उड़ाए मजाक का नतीजा बदस्तूर मालूम होने पर भी वक्त का जायजा ही लेता रहा, वक्त की सख्त चेतावनी तक अनसुनी कर दी।'
यह हिन्दी की विडम्बना है कि यहां रचनाकार-आलोचक के एक ऐसे युग्म की अनिवार्यता-सी हो गई है जिसमें एक आलोचक एक रचनाकार को उठाकर ऐसे प्रतिष्ठापित कर देता है कि फिर उसके लिए शेष तमाम साहित्यिक नेपथ्य में रहने वाले अभिशप्त पात्र की भूमिका वाले ही रह जाते हैं। कबीर को हजारी प्रसाद जी, निराला को रामविलास जी, जायसी को शुक्ल जी और साही, मुक्तिबोध को नामवर जी के यदि इसी तरह के युग्म न बने होते तो इनमें से तो नहीं लेकिन ऐसे कई और नाम सम्भवत: अचर्चित ही रह जाते। शास्त्री जी इस लंद-फंद से अनजान नहीं थे लेकिन नितांत अछूते थे। वे उस परम्परा के साहित्यिक थे जिसमें अपने लिखे शब्द की सत्ता पर ही एकमात्र भरोसा होता था- लिखे में ताकत होगी तो फिर वह लाख उपेक्षा के बाद भी अपना प्रभाव छोड़ेगा। शास्त्री जी चाहते तो निराला के सम्पर्क को भुना भी सकते थे लेकिन मुजफ्फरपुर में अपने निवास का नाम 'निराला निकेतन' रखने के अलावा उनके नाम का अन्यथा उपयोग नहीं किया। 'एक असाहित्यिक की डायरी' के 'असाहित्यिक' में जो व्यंग्य है वह भी उस पीड़ा के कारण है, लेकिन इस पीड़ा का उन्हें कभी अवसाद नहीं रहा। उन्होंने राजधानियों-अकादमियों समितियों-संस्थानों के इर्द-गिर्द चक्कर कभी नहीं लगाए क्योंकि उनका स्पष्ट मत था, 'कविता कुछ उल्टे-सीधे विचारों के प्रचार का मंच नहीं है, प्रवचन पिलाने की व्यास गद्दी नहीं है, व्यक्ति या समाज का स्वास्थ्य बढ़ाने वाला कोई राजकीय सम्मान प्राप्त टॉनिक भी नहीं है।' 'राधा' जैसा महाकाव्य और 'कालिदास' जैसा उपन्यास लिखने वाले शास्त्री जी उस परम्परा के कवि-मनीषी थे जिनके लिए साहित्य ही साधन था और साहित्य ही साध्य। साहित्य उनके लिए न तो यश प्राप्ति का साधन था न अर्थ प्राप्ति का। इसलिए उन्होंने न पुरस्कार समितियों की चिरौरी की और न साहित्य की राजनीति उन्होंने सिर्फ साहित्य रचना की। साठ से अधिक पुस्तकों का प्रणयन किया। शास्त्री जी ने छायावाद की 'त्रयी' प्रसाद, पंत और निराला पर जो भाववादी समीक्षा लिखी वह छायावाद और इन तीनों कवियों की परस्पर संबद्धता को समझने के लिए मील का पत्थर है-'आधुनिक हिन्दी कविता के इतिहास में पन्त, प्रसाद, निराला के नाम ज्योति के पत्र पर लिखे हैं। ये नाम शेक्सपीयर, गेटे या टैगोर की कोटि के हैं जिन्हें निकाल देने पर अंग्रेजी, जर्मन या बांग्ला की तरह ही हिन्दी में भी ऐसा कुछ न रह जाएगा, जो कभी पुराना न पड़े।'
शास्त्री जी संगीत की भी बड़ी गहरी जानकारी रखते थे। उनकी कविता की अवधारणा में सुर,लय और छन्द समाहित थे। इस दृष्टि से उन्हें कोई परम्परावादी कह कर खारिज करे तो यह सिर्फ अपनी मान्यताओं को दूसरे पर थोपने से अधिक कुछ नहीं होगा। हमें मालूम है कि शास्त्री जी के निधन पर उनके शहर से बाहर शायद ही कोई स्मृति सभा हो, क्योंकि न तो वे किसी लेखक संगठन के सदस्य थे और न किसी विचारधारा के सिपाही-लेखक। लेकिन यह भी सच है कि बहुत सारे ऐसे लेखक सिर्फ अपने समय में ही चर्चित रहते हैं। शास्त्री जी को उनके समकालीनों ने बेशक उपेक्षित किया हो, भविष्य में साहित्यिक इतिहास में वे एक मनीषी साहित्यकार के रूप में समादृत होंगे।


Thursday, April 7, 2011

गांधी जी पर विवादित किताब इस महीने आएगी बाजार में


पुलित्जर पुरस्कार विजेता जोसफ लेलीवेल्ड द्वारा महात्मा गांधी पर लिखी गई विवादास्पद किताब इस महीने के अंत तक भारत के बाजार में उपलब्ध हो जाएगी। लेलीवेल्ड ने उम्मीद जताई है कि बाजार में आने पर इसे लेकर मचे बवाल पर रोक लग जाएगी। अमेरिका और ब्रिटेन में हुई इस पुस्तक की समीक्षाओं में बापू के यौन जीवन को लेकर की गईं कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों के बाद बवाल मचा है। जबकि लेखक ने किताब में ऐसी कोई बात लिखने से इंकार किया है। उन्होंने बताया कि उनकी किताब ग्रेट सोल : महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया आगामी तीन हफ्तों में भारत में उपलब्ध होगी। फिलहाल उनकी भारत यात्रा की कोई योजना नहीं है। उन्होंने कहा कि वह भारत तभी जाएंगे जब आमंत्रित किया जाएगा। लेलीवेल्ड ने कहा, गांधीजी में रुचि रखने वालों को इसे पढ़ना चाहिए। यह विवाद आंधी की तरह है, जो थम जाएगा। लोग इसे भूल जाएंगे, लेकिन मेरी किताब हमेशा मौजूद रहेगी। इसलिए इसे लेकर मैं चिंतित नहीं हूं। उल्लेखनीय है कि इस किताब की समीक्षाओं में दावा किया गया है कि गांधीजी उभयलिंगी थे और उनका हरमन कालेनबाख नाम के जर्मन यहूदी बॉडी बिल्डर प्रेमी भी था। गुजरात में किताब पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। महाराष्ट्र सरकार भी प्रतिबंध पर विचार कर रही है। लेलीवेल्ड ने किताब में गांधी जी की यौन आकांक्षाओं की विवेचना करने का खंडन किया है। उन्होंने कहा कि किताब में सनसनीखेज कुछ नहीं है। बल्कि भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद तथ्यों को ही इसमें जगह दी गई है। उन्होंने बताया कि किताब में तीन पैराग्राफ हैं जिसमें गांधी जी के इस वास्तुकार के साथ संबंधों को उकेरा गया है। इसमें कुछ बिंदुओं के बारे में चर्चा की गई है, जिसकी मदद से लोग अपने निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं। मैं चाहता हूं कि लोग इस खंड को पूरा पढ़े|

Tuesday, April 5, 2011

दुश्मन नेताओं को जहर देने की साजिश रची थी हिटलर ने


द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम महीनों मे जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने गठबंधन देशों के नेताओं को जहर मिली कॉफी, चॉकलेट और ह्विस्की देकर मारने की साजिश रची थी। इस तथ्य को ब्रिटिश खुफिया एजेंसी के पकड़े गए नाजी सैनिकों ने उजागर किया था, जिसे पहली बार सार्वजनिक किया गया है। डेली एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार हिटलर अपनी हार को सुनिश्चित जानकर इतना परेशान हो गया था कि सभी नेताओं को एक साथ ठिकाने लगा देना चाहता था। लंदन की नेशनल आर्काइव इन क्यू वेबसाइट पर ब्रिटिश खुफिया एजेंसी मिलिटरी इंटेलिजेंस सेक्शन-5 (एमआइ-5) के इन दस्तावेजों को प्रकाशित किया गया है। दस्तावेजों के मुताबिक अक्टूबर, 1944 में बर्लिन में हुए एक सम्मेलन में ये साजिश रची गई थी। तब तक तय हो चुका था कि गठबंधन सेनाएं हिटलर के कब्जे वाले यूरोप पर अधिकार करने के नजदीक हैं। साजिश का राज खुल जाने के बाद गठबंधन सेना को निर्देश दिए गए थे कि जर्मनी सैनिकों से मिली चॉकलेट, शराब और दूसरी खाने-पीने की चीजों का बिल्कुल इस्तेमाल न करें। जीत के बाद उन्हें ब्रिटेन की प्रयोगशालाओं में भेजा गया था। इन दस्तावेजों के अनुसार हिटलर अपने गुप्त नााजी एजेंटों को पूरे विश्व में भेजकर फासीवाद भी फैलाना चाहता था। द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के कुछ अरसे पहले ही उसकी यह दोनों साजिशें नाकाम हो गईं|