हिंदी में ग्रंथावली, रचनावली, संचयिता और संचयन की परम्परा बहुत पुरानी नहीं है, अलबत्ता अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं में खासकर बांग्ला में कलैक्टेड वर्क्स, सिलेक्टेड वर्क्स और कम्पलीट वर्क्स की पुरानी परम्परा रही है। बांग्ला में संचयिता की भी। हिंदी में पहली ग्रंथावली भारतेन्दु ग्रंथावली थी, जिसका प्रकाशन सन 1912 में पटना के खड्ग विलास प्रेस, बांकीपुर से हुआ था। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हिंदी के जीवित और दिवंगत लेखकों की ग्रंथावलियां और संचयिता के प्रकाशन शुरू हुए। ग्रंथावली या रचनावली का महत्व शोध की दृष्टि से है जबकि संचयिता और संचयन किसी लेखक के बेस्ट लेखन को पाठकों को कम समय में जानने का अवसर प्रदान करता है। अ™ोय हमारे समय के कृती-व्यक्तित्व थे। स्वतंत्रता पूर्व और पश्चात का हिंदी साहित्य उनकी रचनात्मक प्रतिभा से आलोकित है। कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, यात्रा वृत्तांत, पत्रकारिता जैसी विधाओं में अ™ोय ने शीर्ष लेखन ही नहीं किया बल्कि हर जगह नया मानदंड भी स्थापित किया। लंबे अरसे तक उन्होंने हिंदी कविता की अगुआई की। 1943 में प्रकाशित ‘तार सप्तक’, 1952 में ‘दूसरा सप्तक’ और 1959 में ‘तीसरा सप्तक’ ने आधुनिक हिंदी कविता को नई दिशा दी। निराला को छोड़कर आधुनिक हिंदी कविता का कोई भी ऐसा महत्त्वपूर्ण कवि नहीं है जो अ™ोय के दृष्टिपथ से छूट गया हो। मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, रघुवीर सहाय, भवानी प्रसाद मिश्र, साही, कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, सव्रेश्वर दयाल सप्तक के माध्यम से ही हिंदी कविता के परिदृश्य पर उभरे। आजादी के ठीक पूर्व अ™ोय के संपादन में इलाहाबाद से ‘प्रतीक’ निकला जो लंबे अंतराल बाद ‘नया प्रतीक’ नाम से पुन: प्रकाशित हुआ। जहां तक उपन्यास का सवाल है तो मुंशी प्रेमचंद के ‘गोदान’ के बाद अ™ोय रचित ‘शेखर एक जीवनी’ दो खंड, (1940- 44) भाषा के स्तर पर ही नहीं, भाव बोध के स्तर पर भी एक नया प्रस्थान बिन्दु है। इस उपन्यास का विद्रोही नायक शेखर स्वयं अ™ोय ही हैं। उनके दूसरे उपन्यास ‘नदी के द्वीप’ (1951) के पीछे तो उस समय की साहित्य प्रेमी युवा पीढ़ी पागल सी हो गई थी क्योंकि इस उपन्यास में प्रेम का अद्भुत त्रिकोणात्मक आयाम है। एक तरफ भुवन, रेखा तथा गौरा और दूसरी तरफ चन्द्रमाधव। उपन्यास में भावना की गरमाहट तो है ही, प्रेम की ऐन्द्रिकता भी कम नहीं। अ™ोय इस अर्थ में भी युग प्रवर्तक थे कि ‘हरी घास पर क्षण भर’ (1949) से नई कविता की शुरुआत मानी जाती है। नंद किशोर आचार्य के संपादन में अ™ोय संचयिता का प्रकाशन 2001 में हुआ और अ™ोय के जन्म शताब्दी के निमित्त ‘अ™ोय रचना संचयन’ (मैं वह धनु हूं) डॉ कन्हैयालाल नंदन (अब स्वर्गीय) के संपादन में प्रकाशित हुआ है। पुस्तक की प्रस्तावना में कन्हैयालाल नंदन लिखते हैं, ‘यह संचयन न तो ‘अ™ोय’ जी की रचनाशीलता का क्रम निर्धारण करने के लिए है और न इस दृष्टि से इसे देखा जाना चाहिए। सिर्फ अ™ोय अपने रचना-वैविध्य के साथ उपस्थित हैं। यही इसका लक्ष्य है।’ आगे उन्होंने संकेत दिया है कि डॉ कृष्णदत्त पालीवाल ने अपनी कृति ‘अ™ोय : कवि कर्म का संकट’ में लिखा है-’कैसा दुर्भाग्य है कि हिंदी आलोचना अ™ोय को विदेश का नकलची ही सिद्ध करती रही। अथवा व्यक्ति स्वातंत्र्यवाद का समर्थक कहकर नीचट कलावादी सिद्ध करती रही। उन्हें परम्परा भारतीयता, भारतीय आधुनिकता, नवीन प्रयोगधर्मिता, शब्द का सच्चा पारखी, सम्पूर्ण अर्थ में सांस्कृतिक अस्मिता और जातीय स्मृति से जोड़कर समझने में असमर्थ रही है।’ अ™ोय शब्द से परे जाकर घोषित करते हैं, ‘शब्द में मेरी समायी नहीं होगी, मैं सन्नाटे का छन्द हूं।’
आलोच्य पुस्तक में अ™ोय की लंबी कविता ‘असाध्य वीणा’ 1961 में उनकी कविता पुस्तक ‘आंगन के पार द्वार’ में छपी थी। चूंकि यह उनकी पहली लंबी कविता थी, इसलिए उस समय भी इसने पाठकों और विद्वानों का ध्यान खींचा था लेकिन 1964 में मुक्तिबोध की मृत्यु के साथ उनके कविता संग्रह ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ में उनकी लंबी कविता ‘अंधेरे में’ संगृहीत हुई तो उसकी इतनी व्यापक र्चचा हुई कि उसके शोर में ‘असाध्य वीणा’ की र्चचा बिल्कुल खो गई। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बाद के हिंदी आलोचकों ने ‘असाध्य वीणा’ के महत्व को नहीं समझा। डॉ नामवर सिंह ठीक कहते हैं कि लंबी होते हुए भी ‘असाध्य वीणा की मूल संवेदना वतरुलाकार है, इसलिए अंतत: यह एक प्रगीत है।’ ‘अंधेरे में ‘ की तरह इस कविता ने पूर्णता के साथ अपने लक्ष्य को प्राप्त किया है। स्वभावत: उसी की तरह यह भी हिंदी में एक श्रेष्ठ कविता की तरह मान्य हो रही है। अन्य महत्वपूर्ण कविताओं में ‘कलगी बाजरे की’, ‘कांगडे की छोरियां’, ‘आज तुम शब्द न दो’, ‘यह द्वीप अकेला’, ‘आज थका हिय-हारिल मोरा’, ‘कतकी पूनो’, ‘सम्राज्ञी का नैवेद्य-दान’, ‘नंदा देवी’, ‘महावृक्ष के नीचे’, ‘नाच’ और ‘मैं वह धनु हूं’ जैसी कविताएं संकलित हैं। पुस्तक में अ™ोय की डायरी के साथ सप्तकों की भूमिका और पंत की षष्ठि पूर्ति पर प्रकाशित पुस्तक ‘रूपांबरा’ की भूमिका भी संकलित है। अ™ोय ने अपने समय की श्रेष्ठ पत्रिका ‘कल्पना’ में ‘कुट्टिचातन’
छद्म नाम से कुछ निबंध भी लिखे। उनके साथ कुछ अन्य निबंध भी आलोच्य पुस्तक में शामिल हैं। उपन्यासों में ‘अपने-अपने अजनबी’
(पूरा) ‘बीनू भगत’ (अधूरा) और ‘शेखर एक जीवनी’ के कुछ अंश संकलित हैं। अ™ोय यायावर के रूप में भी प्रसिद्ध रहे हैं। उनका चर्चित यात्रा संग्रह का नाम ही है ‘अरे यायावर रहेगा याद’। उनकी दस कहानियां इस संचयन में हैं जिनमें ‘गैंग्रीन’, हीली बोन की बत्तखें’, ‘कलाकार की मुक्ति’, ‘और ‘मेजर चौधरी की वापसी’ वास्तव में उल्लेखनीय हैं। यदि उनकी दो और कहानियां ‘शरणार्थी’ और ‘पठार का धीरज’ भी शामिल कर ली जातीं तो पुस्तक का महत्व निश्चय ही और बढ़ जाता। पहली कहानी में जहां बंटवारे का दर्द है, वहीं दूसरी प्रेम की अद्भुत कहानी है। पुस्तक में अ™ोय के नाटक ‘उत्तर प्रियदर्शी’ और उनसे चार संवाद भी उल्लिखित हैं। इस पुस्तक की एक अन्य महत्वपूर्ण सामग्री है, ‘अ™ोय अपनी निगाह में।’ उन पर केन्द्रित पुस्तक ‘अ™ोय अपने बारे में’ रघुवीर सहाय से रेडियो पर लंबे संवाद से ली गई है जिसमें अ™ोय के जीवन, संघर्ष और परिवेश को समझने में मदद मिलेगी। पुस्तक के अंत में पहले परिशिष्ट में अ™ोय द्वारा लिखे और उनके नाम लिखे कुछ पत्र हैं और दूसरे परिशिष्ट में कालक्रम से उनकी प्रकाशित पुस्तकों की सूची है। अंतिम परिशिष्ट में उनका जीवन वृत्त है। अ™ोय जन्म शताब्दी के अवसर पर प्रकाशित इस संचयन का महत्व इस दृष्टि से है कि अ™ोय जैसे महान साहित्यकार को नई पीढ़ी ठीक से समझ सके। यह अच्छी बात है कि हिंदी भाषी समाज ने अ™ोय के बारे में अपने रूढ़ दृष्टिकोण को बदलने की कोशिश की है और उनके महत्व को ठीक से समझा है।
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