हिमालय से लेकर सह्याद्रि तक और गिरनार से लेकर कामरूप-कामाख्या तक फैले पर्वत भारतीय धर्म, संस्कृति और परंपरा से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं। डॉ. हरिकृष्ण देवसरे ने अपने ग्रंथ पर्वत गाथा में भारत के पर्वत, पर्वतीय जीवन, वहां की सभ्यता-संस्कृति और विकास को समेटा है
बलराम कहा जाता है कि दुनिया में अगर कहीं भी कुछ है तो वह महाभारत में है और जो महाभारत में नहीं है, वह कहीं नहीं है। इसी तरह हमारा भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां वह सब कुछ है जो दुनिया में कहीं भी पाया जाता है। गंगा, यमुना, नर्मदा और कावेरी जैसी नदियां और कहां हैं और कहां है हिंद महासागर की जलवायु? कहने का मतलब यह है कि जैव विविधता से लेकर प्रकृति तक भारत में सब कुछ दिव्य से दिव्यतम है। भारत का पर्वतराज हिमालय जैसा दुनिया में दूसरा पर्वत नहीं, जहां मानसरोवर जैसी दिव्य झील भी है। शायद इसीलिए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरिकृष्ण देवसरे ने पर्वत गाथा नाम से भारत के पर्वतों पर आधारित एक बड़ा ग्रंथ ही लिख डाला। डॉ. हरिकृष्ण देवसरे कहते हैं कि हिमालय से लेकर सह्याद्रि तक और गिरनार से लेकर कामरूप-कामाख्या तक फैले हमारे पर्वत भारतीय धर्म, संस्कृति और परंपरा से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं। हमारे ये पर्वत ऋषियों की तपोभूमि रहे हैं। इनमें देवताओं का निवास रहा है। प्राचीनकाल से ही पर्वत पूजनीय माने जाते हैं। समुद्र को भी केरल और कर्नाटक के लोग मां मानते हैं। हमारे पुराणों में पर्वतों का मानवीकरण तक कर दिया गया है। कहने का मतलब यह कि हमारे पुराण, इतिहास और साहित्य में पर्वतों का विस्तार से वर्णन हुआ है। हमारा अत्यंत निकटवर्ती संबंध रहा है पर्वतों से। पर्वत हैं तो हमारे देश को भरपूर वर्षा का पानी मिल रहा है, जिनसे हमारी नदियां सदानीरा बनी रहती हैं। वन हमें फल, फूल, जड़ी-बूटियां और लकड़ी ही नहीं देते, हमारे वन्य जीवन को शरण और संरक्षण भी देते हैं। खनिज संपदा भी हमें पर्वतों से प्राप्त होती है, जो हमारे लिए वरदान की तरह है। देश में जगह-जगह बिखरी पर्वत मालाओं की विस्तृत चर्चा के लिए ही शायद डॉ. हरिकृष्ण देवसरे ने पर्वत गाथा ग्रंथ लिखा है। भारत की चर्चा हो और हिमालय की चर्चा न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। हिमालय की चर्चा होगी तो भारत की पवित्र नदी गंगा की चर्चा भी जरूर होगी। इनकी चर्चा होगी तो केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की भी चर्चा होगी, जहां भारत की सभ्यता और संस्कृति फली-फूली। अमरनाथ की चर्चा के बिना भी भारत के पर्वतों की चर्चा अधूरी रह जाएगी। अरावली पर्वत श्रृंखलाएं अपने आगोश में हल्दी घाटी को छिपाए हुए हैं, तो कामदगिरि से चित्रकूट का आध्यात्मिक रिश्ता है। विंध्याचल पर्वत पर विंध्यवासिनी देवी विराजती हैं तो शेषाचल में तिरुपति मंदिर है। उधर, नीलाचल पर्वत की गोद में कामाख्या देवी विराजती हैं। अरुणाचल धुर पूरब में है तो गोवर्द्धन पर्वत से कृष्ण का गहरा लगाव रहा। कालिंजर, गिरनार, वराहगिर, सम्मेद शिखर, श्रवणवेल गोल, आबू पर्वत, अजंता-एलोरा की गुफाएं, राजगीर तथा पावागढ़ आदि हमारे देश के पर्वतों पर स्थित हैं और इनके बिना भारत के जीवन-जगत की कल्पना नहीं की जा सकती। इनके बिना भारत की सभ्यता-संस्कृति भी पनप नहीं सकती। माउंट एवरेस्ट नाम से लिखे गए अध्याय में डॉ. देवसरे बताते हैं कि अभी हम हिमालय की जिस सर्वोच्च चोटी को एवरेस्ट के रूप में जानते हैं, उसका जिक्र हमारे प्राचीन ग्रंथों में कहीं नहीं मिलता। गौरीशंकर और कंचनजंगा नाम मिलते हैं, मगर वहां एवरेस्ट कहीं नहीं है। नेपाल के लोग एवरेस्ट को सागरमाथा यानी विश्व जननी के नाम से पुकारते हैं तो भारत के लोग सरगमाथा यानी स्वर्ग का माथा कहने लगे हैं। तिब्बत के लोग एवरेस्ट को चोमूमूलुंगमा कहते हैं। वर्ष 1904 में कर्नल वेडन ने इसका तिब्बती नाम चोम कंकर लिखा तो 1907 में नत्था सिंह ने इसे छोलुंगबु लिखा। वर्ष 1909 में जनरल ब्रूस ने इसका तिब्बती नाम चोमो लुंगमो लिखा था तो 1921 में कर्नल हावर्ड बेरी ने एवरेस्ट का तिब्बती नाम चोमो उरी बताया था। वर्ष 1921 में हावर्ड ने ही एवरेस्ट का एक और नाम चोमो लुंगमा लिखा था। चोमो संस्कृत के गौरी का तिब्बती पर्याय है। कुल मिलाकर लगता यही है कि एवरेस्ट नाम विदेशियों का दिया हुआ है, जबकि इसका मूल नाम गौरी ही रहा होगा, गौरीशंकर भी। बर्फीली चोटियां कंचन की तरह चमक उठती हैं, जब सूर्य की किरणों से उनकी मुलाकात या फिर विदाई होती है। तब वह कंचनजंगा लगने लगती है। कुछ भी हो, अब उसे गौरीशंकर या कंचनजंगा की बजाय ज्यादातर लोग एवरेस्ट लगे हैं और नाम वही अच्छा लगने लगता है, जिसे दुनिया भर के लोग पुकारने लगते हैं। अग्नि पुराण में भारत के कुल सात पर्वत गिनाए गए हैं : महेंद्राचल, मलयगिरि, सह्याद्रि, शक्तिमान, हिमालय, विंध्याचल और परियात्र। मार्कडेय पुराण में भी सात ही पर्वत हैं। महेंद्र पर्वतमाला उड़ीसा में है। पश्चिमी घाटों का दक्षिणी हिस्सा मलयगिरि कहा जाता है। विंध्य पर्वतमाला खंभात की खाड़ी से पूर्व में राजमहल तक फैली है, जो देश को दो भागों में बांटती है। पहला भाग उत्तर भारत का गंगा का बेसिन है, तो दूसरा दकन का पठार कहलाता है। पश्चिम से पूर्व की ओर फैली यह पर्वतमाला मध्य भारत में काफी चौड़ी है। विंध्य पर्वत की श्रेणियां दक्षिण में नर्मदा घाटी के पास ढाई हजार फीट ऊंची दीवार की तरह और उत्तर की तरफ चौदह सौ फीट की ऊंचाई में खड़ी हैं। मुख्य शिखर लगभग दो हजार फीट ऊंचा है। यह ज्यादातर बलुआ पत्थरों का है, जिसमें कहीं-कहीं चूना पत्थर और शैल मिलते हैं। कुल मिलाकर, डॉ. हरिकृष्ण देवसरे अपनी कृति पर्वत गाथा से भारत के पर्वत ही नहीं, यहां का जीवन, यहां की सभ्यता-संस्कृति और विकास की धारा तक सभी आयामों से पाठक का परिचय करा देते हैं। किताब की भाषा पठनीय है जिसे पढ़ते हुए कथारस में डूबता हुआ पाठक पूरी किताब पढ़े बिना खुद को रोक नहीं सकता।
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