Sunday, May 1, 2011

हमारे समय के जरूरी संदर्भ


कवि/लेखक की जन्मशती हम क्यों मनाते हैं, तो इस प्रश्न का उत्तर यही होगा कि भावी पीढ़ी के लिए हम आधुनिक साहित्य के निर्माण में उनकी भूमिका और अवदान को रेखांकित करना चाहते हैं ताकि 'इतिहास' संतुलित रहे। लेखक की ग्रंथावली/रचनावली, चुनी रचनाएं, संचयन/संचयिता, छवि संग्रह आदि का प्रकाशन इसी उद्देश्य से किया जाता है। इधर हमने अोय, शमशेर, नागाजरुन, केदारनाथ अग्रवाल और फैज की जन्मशती धूमधाम से मनाई और आगे भी मनाएंगे लेकिन इस क्रम में कुछ लेखक/कवि हमारे दृष्टिपथ से ओझल हो गये, जबकि साहित्य में उनका प्रदेय कम नहीं है। उपेन्द्रनाथ अश्क, मजाज, भुवनेश्वर, गोपाल सिंह नेपाली, राधाकृष्ण, भगवतशरण उपाध्याय, आरसी प्रसाद सिंह को हमने आंशिक रूप से याद किया। साहित्य का इतिहास वस्तुत: मुख्यधारा के लेखकों व कवियों से ही नहीं बनता है, बल्कि उनसे भी बनता है जिन्हें हम गौण या क्षीण उपधारा के लेखक समझते हैं। पश्चिम में टीएस इलियट और रेनवेलक जैसे आलोचकों ने छोटे कवियों और लेखकों पर सुचिंतित लेख लिखे हैं। भुवनेश्वर की 'भेड़िए' कहानी याद करें, जिसकी आधुनिक संवेदना को लेकर अब भी साहित्य-संसार में जब-तब सुगबुगाहट होती है। भगवतशरण उपाध्याय जैसे भाषाविद् और संस्कृति के विश्लेषक का महत्व इसलिए नहीं है कि उन्होंने 'संस्कृति के स्रेत' जैसी पुस्तक लिखी बल्कि इसलिए भी है कि उन्होंने 1961 में प्रकाशित दिनकर की 'उर्वशी' पर 'कल्पना' पत्रिका में ऐसी धारदार समीक्षा लिखी, जिससे उठे विवाद में हिंदी के लगभग डेढ़ दर्जन लेखकों ने हिस्सा लिया। इसी के परिणाम में डॉ. नामवर सिंह को 'कविता के नये प्रतिमान' में 'उर्वशी: मूल्यों की टकराहट' जैसा लेख लिखना पड़ा। समकालीन हिंदी आलोचना इस विचारोत्तजेक विवाद से न केवल समृद्ध हुई, बल्कि किसी कृति की वस्तुपरक समीक्षा कैसे लिखी जाए, यह भी स्पष्ट हुआ। नेपाली उत्तर छायावाद के चर्चित कवि रहे हैं। धर्मवीर भारती 'धर्मयुग' में उन्हें प्रमुखता से छापते थे। उनकी काव्य-पंक्तियां अभी भी सुधी पाठकों को याद होंगी- 'मेरी दुलहन-सी रातों को नौ लाख सितारों ने लूटा' या फिर 'यदि मैं भी लहरों में बहता तो, मैं भी सत्ता गह लेता। ईमान बेचता चलता तो मैं भी महलों में रह लेता।'
आरसी प्रसाद सिंह बिहार के थे और हिंदी और मैथिली में कविताएं लिखते थे। उन्हें मैथिली कविताओं के लिए नागाजरुन के बाद साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिला था। आरसी प्रसाद भी उत्तर छायावादी कवि थे। 'यौवन और मस्ती' के कवि। संभवत: सातवीं क्लास के पाठ्यक्रम में उनकी एक कविता संग्रहीत थी- 'यह जीवन क्या है निर्झर है/मस्ती ही इसका पानी है/सुख-दुख के दोनों तीरों से/चल रहा राह मनमानी है।' जहां तक शायर मजाज की बात है, पाठक अली सरदार जाफरी की संस्मरणात्मक पुस्तक 'लखनऊ की पांच रातें' पढ़ें। अंतिम रात में मजाज की मृत्यु का मार्मिक ही नहीं, हृदय विदारक संस्मरण है। राधाकृष्ण अपने समय के सेलेब्रेटेड कथा लेखक थे। दिनकर, नंद दुलारे वाजपेयी, नागाजरुन, अमृतराय आदि ने उनकी विलक्षण प्रतिभा की पहचान की थी। उपेन्द्रनाथ अश्क (1910-1996) को लंबी उम्र मिली। जीवन में ज्यादा, लेकिन साहित्य में कम। हैरानी है कि अश्क को उनके जन्मशती वर्ष में हमने उस तरह याद नहीं किया, जिसके वे अधिकारी थे। यदि गुलेरी जी को हम पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में 1915 में प्रकाशित 'उसने कहा था' कहानी के लिए याद करते हैं तो अश्क जी को उनकी कालजयी कहानी 'डाची', संस्मरण 'मंटो : मेरा दुश्मन', आत्मकथा 'चेहरे अनेक' (पांच खंड) और उपन्यास 'गिरती दीवारें' के लिए तो याद कर ही सकते हैं। बेशक, नीलाभ के अप्रत्यक्ष प्रभाव से दिल्ली या अन्यत्र उन पर दो-तीन आयोजन हुए लेकिन वे अश्क जैसे बड़े लेखक की गरिमा के अनुकूल नहीं लगे। उपेन्द्रनाथ अश्क के लेखन की चौहद्दी बहुत बड़ी है- खेसरा और खतौनी भी। साहित्य की शायद ही कोई विधा उनसे अछूती रही। उपन्यास, कहानी, नाटक-एकांकी, कविता, आलोचना, संस्मरण आत्मकथा, संपादन और अनुवाद उनके लेखन के क्षेत्र थे। उन्होंने हिंदी, उर्दू और पंजाबी में विपुल लेखन किया। हालांकि किसी लेखक की पुस्तकों की संख्या नहीं, उसकी गुणवत्ता उसके मूल्यांकन का आखिरी आधार बनता है। बेशक, अश्क जी ने परिमाण में बहुत लिखा और उनके लेखक के बीच से छांट या बांचकर चार- पांच चीजें भी मूल्यवान निकलती हैं तो हमें उनकी जन्मशती पर उन्हें याद करने की जरूरत है। सबसे पहले उनकी 'डाची' कहानी। हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक प्रो. नंदकिशोर नवल के संपादन में प्रकाशित कसौटी-15' (समापन अंक) में उन्होंने हिंदी की 19 कालजयी कहानियों पर टिप्पणी की। आठवीं कहानी उपेंद्रनाथ अश्क की 'डाची' थी। 'कसौटी' में इस कहानी पर डॉ. नवल की टिप्पणी थी- 'उपेंद्रनाथ अश्क लिखित कहानी 'डाची' भी एक अविस्मरणीय कहानी है। यह एक नजाकत से भरी हुई कहानी है, लेकिन कितना दिलचस्प है कि राजस्थान के रेगिस्तान की पृष्ठभूमि में रचित है।' आगे 'यह कहानी बतलाती है कि संपन्न लोग कैसे गरीब की इच्छा को मसल देते हैं, बेहिचक, बिना कुछ कल्पना किए। दूसरी तरफ एक गरीब है, जो अतिशय कल्पनाशील है। ..यह एक बिना शोरगुल के घटित होने वाली त्रासदी है, जिसका चितण्रअश्क ने बहुत बारीकी और बिना किसी अतिरेक के किया है।' डॉ. नवल से सहमत होते हुए मैं एक वाक्य जोड़ना चाहता हूं कि यह कहानी बेटी के प्रेम से सराबोर ऐसे भावुक पिता की कहानी है जो बेटी के सपने के साथ पत्नी की स्मृति में भी शामिल है। शमशेर जी पर एक गोष्ठी के दौरान उनकी पुस्तक 'शमशेर बहादुर सिंह की कुछ गद्य रचनाएं (1989) में संकलित 'उपेन्द्रनाथ 'अश्क': कहानीकार' लेख पड़ने को मिला। शमशेर जी ने लिखा है- 'डाची' में डाची ही एक पूर्ण कलाकृति है जो हृदय पर अमिट प्रभाव छोड़ जाती है, यों-और भी सफल कहानियां इस संग्रह में हैं- जैसे, '324, 'लीडर', 'रिफाकत'। शमशेर का यह लेख 'हंस' में 1941 में छपा था। अश्क की सिर्फ एक कहानी 'डाची' उन्हें अमर करने के लिए काफी है। अश्क जी का 'मंटो : मेरा दुश्मन'- संस्मरण 1956 में छपा, जो बेहद चर्चित हुआ। इस तरह के संस्मरण हिंदी में विरल है। यह न केवल संस्मरण का आदर्श है, बल्कि मानदंड भी। मंटो के साथ गुजरे वक्त को अश्क ने इस संस्मरण में पास से या दूर से जिस आत्मीयता के साथ लिखा है, वह पाठकों को गुदगुदाने के साथ कम विचलित भी नहीं करता। अश्क जी ने 1956 में ही 'संकेत' संकलन का संपादन किया था- मार्कण्डेय और कमलेश्वर के सहयोग से। यह संकलन 'निकष' की तरह ही चर्चित हुआ, क्योंकि इसमें ढेर-सारी महत्वपूर्ण सामग्री छपी थी। अश्क के संपादक का यह नया रूप था। उनका साहित्यिक व्यक्तित्व एक साथ बेहद जटिल, सरल और संश्लिष्ट था। साहित्य संसार प्राय: उनके आखेट के घेरे पर होता था। वे साहित्यिक मित्रों को पनाह देते थे, चुटकी भी काटते थे लेकिन बख्शते किसी को नहीं थे। अश्क ने अपनी आत्मकथा- 'चेहरे : अनेक' (1977-1988) पांच खंडों में लिखी, जिसमें एक तरफ साहित्यिक समाज की अर्धशताब्दी की हलचल है तो दूसरी ओर खुद उनका क्रमश: बदलता चेहरा। साथ ही मित्रों और शत्रुओं के बेनकाब चेहरे भी। उनके साथ एक बड़ी दिक्कत थी- प्राय: लेखन में वे विस्तार में जाते थे। चाहे उनकी आत्मकथा हो या महत्वाकांक्षी उपन्यास 'गिरती दीवारें'। यदि वे अपने लेखन को खंडित कर सकते तो उनकी प्रतिभा के विस्फोट का सही पता हिन्दी पाठकों को मिलता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आत्मकथा लिखने का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा- 'चेहरे-अनेक'
जिंदगी की (विशेषकर लेखक-समाज की जिन्दगी की) पेचीदगियों के उद्घाटनार्थ लिखी गई है, अपने या उनके गुण बताने के लिए नहीं। मेरे उपन्यासों, नाटकों, कहानियों की ही तरह आदमी नाम के जीव को समझाने-समझने का शास्त्र है। भले ही मैंने अपने किरदार के माध्यम से आत्मचितण्रकी शैली में इसे सृजा है।'
पत्रों में लेखक का मन ही नहीं, उसके जीवन और रचनात्मक संघर्ष की नाजुक पंखुड़ियां भी खुलती हैं। इसीलिए पत्र साहित्येहास लेखन के प्रामाणिक स्रेत होते हैं। 'आलोचना' त्रैमासिक के सह-संपादक नंद किशोर नवल ने उनसे पत्रिका के 'मार्क्‍स विशेषांक' पर लिखने का आग्रह किया था। प्रत्युत्तर में उन्होंने लिखा- 'तुम्हारा 19.07.84 का पत्र मिला। इससे पहले भी एक-दो पत्र मिले हैं। यद्यपि मेरी उम्र बहुत घट गई है और मैं 'गिरती दीवारें' का पांचवां और अंतिम खंड लिख रहा हूं और मेरे पास जरा भी समय नहीं है तो भी यदि तुमने आलोचना' के बजाय किसी दूसरी पत्रिका का मार्क्‍स विशेषांक निकाला होता तो मैं समय निकालकर भी प्रश्नों के विस्तृत उत्तर देता कि मार्क्‍स केंिचंतन का मेरे लेखन पर कितना बड़ा और व्यापक प्रभाव पड़ा है और कैसे मार्क्‍स की धारणाओं को मैंने अपने उपन्यासों, नाटकों और कविताओं के माध्यम से रूपायित किया। लेकिन आलोचना ऐसी पत्रिका है, जिसने गत दो दशकों में (जिस दौरान मैंने बीस ग्रंथ लिखे हैं) मेरे किसी उपन्यास, नाटक अथवा काव्य संग्रह पर सारगर्भित आलोचना तो दूर रही, कोई अन्यमनस्क टिप्पणी भी नहीं दी। हिंदी साहित्य से, इस आलोचना पत्रिका ने मुझे अक्सर काट रखा है। मेरा तो कुछ नहीं बिगड़ा। जाने देशिवदेश में कहां-कहां मेरे साहित्य पर शोध कार्य हो रहा है।'
अश्क जी के पत्र बेहद दिलचस्प होते थे। आत्ममुग्धता के बीच कहीं-कहीं उनमें साहित्य की चिनगारी भी होती थी। मधुरेश की पुस्तक 'अश्क के पत्र' में लंबी अवधि में लिखे सन 1963 से लेकर 1995 तक के लगभग 50 से ऊपर पत्र संकलित हैं। अंत में अश्क हमारे समय के आवश्यक संदर्भ हैं और उनको जन्मशती पर बड़े लेखक के रूप में याद किया जाना चाहिए।

No comments:

Post a Comment