हिंदू धर्म की तरह ही हिन्दी भाषा बिना देव पुरुषों के चल नहीं पाती। हिन्दी के सबसे बड़े देवपुरुष भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं। साहित्य में उनकी वही स्थिति है जो हिन्दू इतिहास में समझिए महाराणा प्रताप की है। दोनों जगह समान रूप से पूजनीय हैं, वामपंथी साहित्य के लिए भी और वामपंथ विरोधी साहित्य के लिए भी। लेकिन इससे भी ज्यादा दिलचस्प तथ्य यह है कि भारतेन्दु की महानता का बखान वामपंथी और वामपंथ विरोधी, दोनों ही समान उत्साह से करते हैं और कोई भी इस बात के लिए तैयार नहीं दिखता कि प्रशंसित लेखक पर थोड़ा तटस्थ, पूर्वाग्रहमुक्त, तार्किक नजरिए से भी विचार किया जाना चाहिए। डॉ राम विलास शर्मा जैसे वामपंथी आलोचक ने तो अत्यधिक उत्साह में आकर भारतेन्दु को साम्राज्यवाद विरोधी लेखक भी घोषित कर डाला था केवल एक पंक्ति के आधार पर-धन बिदेश चलि जात यही है ख्वारी। उन्होंने भारतेन्दु के उस विपुल लेखन की तरफ से पूरी तरह आंखें मूंद ली थीं, जिसमें भारतेन्दु ने अंग्रेज शासकों की न सिर्फ प्रशंसा की थी बल्कि उनके होने से देश का कल्याण होने की घोषणाएं की थीं। यहां हम इस बात की याद भी दिलाना चाहेंगे कि जिस समय भारतेन्दु भाषा और शिल्प के नजरिए को नितान्त स्तरहीन और लगभग बचकानी तुकबंदियां लिख रहे थे लगभग उसी कालखण्ड में उर्दू में बेहतरीन और विश्वस्तरीय कविता मीर, जौक और गालिब लिख रहे थे। भारतेन्दु के नाटक भी नाट्य रचना के इतिहास में कोई जगह नहीं बनाते अंधेर नगरी जैसे छोटे से प्रहसन के बावजूद। जिस वक्त वे रत्नावली, प्रेमयोगिनी, चन्द्रावली जैसे स्तरहीन नाटक लिख रहे थे, उस वक्त दुनिया में इब्सन और चेखव अपनी कालजयी रचनाएं दे चुके थे। लेकिन सबसे ज्यादा हैरान करने करने वाला पक्ष था भारतेन्दु की अंग्रेज भक्ति का। यह पक्ष लगभग शर्मिदा करने वाला है और इसके बावजूद हिंदी जगत इसकी पूरी उपेक्षा करता है तो आखिर क्यों? इसका बहुत हल्का सा जिक्र मैं पहले कर चुका हूं। यहां थोड़े विस्तार से हम देखेंगे कि भारतेन्दु की अंग्रेज भक्ति की वास्तविकता क्या थी? धन बिदेश चलि जात की मामूली सी टिप्पणी करने वाले भारतेन्दु ‘भारत राज राजेश्वरी नंदन युवराज कुमार प्रिंस ऑफ वेल्स के चरणों में’ कविता संग्रह समर्पित करते हैं। यह शुभ काम वे करते हैं प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आने पर। ड्यूक ऑफ एडिनबरा के बनारस आने पर वे उन्हें फूल नहीं दे पाए इससे दुखी होते हैं। वे साम्राज्यवाद विरोधी कभी नहीं थे। एडिनबरा के भारत आगमन पर उनका उछाह अपरिमित हैं- हे हे लेखनी मानिनी बनना उचित नहीं क्योंकि इस भूमि के नायक ने चिर समय के पीछे अपने प्यारी की सुध ली है। वह इस देश को एडिनबरा की लगभग रखैल ही बना देते हैं। भारतेन्दु की यह पक्की धारणा थी कि अंग्रेज इस देश के स्वामी हैं और उन्हीं के कारण भारत का कल्याण होना है। भारत शिक्षा कविता में वे लिखते हैं- ब्रिटिश सुशासित भूमि में आनंद उमगे जात। ध्यान रहे भारतेन्दु यह उद्भावना उस समय प्रकट कर रहे थे, जब बंगाल की नटी विनोदिनी अंग्रेजों के भयानक अत्याचार पर अपना नाटक ‘नील दर्पण’ लेकर देश में घूम रही थी। उस वक्त भारतेन्दु को देश ब्रिटिश सुशासित लग रहा था। गवर्नर जनरल लार्ड मेयो की अण्डमान के दौरे के दौरान एक कैदी ने उनकी हत्या कर दी। भारत के स्वाभिमान के लिए यह एक सुखद घटना थी लेकिन भारतेन्दु इससे शोकाकुल हुए-हे भारतवर्ष की प्रजा, अपने परम प्रेमरूपी अश्रुजल से उपराज्य अधीश का दर्पण करो। वह चाहते थे कि सारा देश रोए पर यह नहीं हुआ। इसके लिए वे देश को कोसते हैं-लोगों में राजभक्ति नहीं है। मुसलमानों के अत्याचार से यह राजभक्ति हिंदुओं से निकल गई। हाय देश को कैसा दुख हुआ। शेर अली के लिए भारतेन्दु कहते हैं कि उसे सूअर की खाल में लपेट कर मारा जाए। मैं नहीं जानता अगर भगत सिंह उनके समय में हुए होते तो भारतेन्दु उनके लिए क्या सजा तजवीज करते क्योंकि भगत सिंह ने उनके प्रिय अंग्रेज को मार डाला था। हैरानी है, अंग्रेजपरस्त भारतेन्दु के इस पक्ष पर हिन्दी की दुनिया चुप लगा जाती है ।
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