Tuesday, June 14, 2011

संस्कृत का आधुनिक लेखन


ये देखना थोड़ी उलझन पैदा करता है कि हिन्दी और संस्कृत के क्षेत्र में किसी भी विषय पर र्चचा हो उसमें वेदों को घसीटे बिना लोगों को संतोष नहीं होता। संस्कृत नाटक संबंधी कोई भी किताब उठा लीजिए उसकी शुरुआत में ही वेदों का जिक्र मिल जाएगा। यह हालत हिन्दी रंगर्चचा के विवेचनात्मक पक्ष को गहन और गम्भीर होने से रोकती है और यही वजह है कि हिन्दी में आधुनिक समय में नेमिचन्द्र जैन और परवर्ती जयदेव तनेजा, जे एन कौशल और देवेन्द्रराज अंकुर ने ही थोड़ा कुछ ऐसा रंगवैचारिक लेखन किया जिसमें आधुनिक भावबोध दिखाई देता है। लेकिन इस सारे लेखन में संस्कृत नाटकों की गम्भीर विवेचना लगभग पूरी तरह गायब रही है। निस्संदेह ईसवी सहस्रब्दि से पहले के भास से लेकर जयदेव तक अच्छे नाट्य लेखन का प्रशंसनीय इतिहास है। इनमें अनेक की कृतियां लुप्त हैं। यहां हम देखेंगे कि 12वीं सदी के बाद से आधुनिक युग तक संस्कृत नाट्य लेखन की स्थिति क्या है?12वीं सदी तक आते-आते संस्कृत नाटकों का स्तर गिरने लगा था। यह देख कर हैरानी होती है कि संस्कृत नाटक 20वीं सदी तक भी लिखे गए और बड़ी संख्या में लिखे गए लेकिन रंगलेखन के इतिहास में वे खासे ही कूड़ा कहे जायेंगे। दुनिया के नाट्य लेखन को देखते हुए 12वीं सदी के बाद का समूचा लेखन संस्कृत की काव्य परम्परा की अवमानना ही करता है जबकि आधुनिक संस्कृत नाटककार दुनिया में लिखे जा रहे नाटकों से अपरिचित नहीं रहे हैं। एस एन ताड़पत्रीकर भंडारकर इंस्टीट्यूट में रहे थे। उन्होंने डॉ. फाउस्टस के कथानक का हिन्दूकरण करके विश्वमोहन नाम का एक स्कूली सा नाटक रच डाला था। जिन संस्कृत के नाटकों को पूरी दुनिया में सराहा जा रहा हो, उसमें मात्र छात्रोपयोगी नाटक क्यों कर लिखे गये, वह भी 20वीं सदी में जब हिंदी में मुक्तिबोध, सव्रेश्वर, रघुवीर सहाय जैसे कवि विश्वस्तरीय लेखन कर रहे हों। हैरानी होती है कि जिन दिनों हिन्दी में आषाढ़ का एक दिन (मोहन राकेश) लिखा जा रहा हो उन्हीं दिनों संस्कृत में कश्मीरसंधानसमुद्यम लिखा गया हो जो कश्मीर समस्या को इसी के एक पात्र श्यामा प्रसाद मुखर्जी के शुद्ध जनसंघी संवादों द्वारा प्रचारित करता हो। हिन्दी के आधुनिक नाटकों में भारत के इतिहास और मिथक को जहां तुगलक या घासीराम कोतवाल जैसे नाटकों के माध्यम से पुनर्रचित और विवेचित किया गया था वहीं संस्कृत में लिखे अति सरलीकृत और दो आयामी वीर प्रताप, पृथ्वीराज, गांधी विजयम्, भारत विजयम् जैसे नाटक इतिहास भक्ति के जंजाल भर हैं। यह देखकर हैरानी होती है कि जिस संस्कृत भाषा में स्वप्नवासदत्ता, अभिज्ञान शाकुंतलम्, मृच्छकटिकम, मुद्राराक्षस जैसे दुनिया के बुद्धिजीवी वर्ग को स्तंभित करने वाले नाटक बड़ी संख्या में लिखे गए हों वहीं बाद के समय में नाट्य लेखन का स्तर इतना नीचे कैसे गिर गया? अनेक अतिशयोक्तियों के बावजूद आज के समय की संस्कृत कविताएं संस्कृत नाटकों की तरह ही नितांत गई बीती हैं। जिस संस्कृत भाषा में कालिदास, दण्डी, माघ जैसे कवियों की कालजयी कविताएं मौजूद हों उसे आधुनिक समय आते-आते यह क्या हो जाता है कि उसमें शुद्ध बचकानी कविताएं ही लिखी जाती हैं जो विश्व साहित्य में तो दूर, हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं की कविताओं से बहुत नीचे रह जाती हैं? हिन्दी के शीर्ष कवि और मैथिली के लिए साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत नागाजरुन ने संस्कृत भाषा में भी स्तरीय कविताएं लिखी हैं, जिनकी कभी र्चचा या विवेचना नहीं होती। भारत भवन, मध्य प्रदेश के चरित्र पर लिखी उनकी एक कविता उस सरकारी तंत्र का एक सशक्त और खासा तुर्श क्रिटीक है। उनकी अन्य कविताएं जैसे श्रमिक दशकम् या कृषक दशकम् भी अत्यंत संवेदनशील और प्रखर कथ्य वाली रचनाएं हैं। वस्तुत: आज के संस्कृत लेखकों में वर्तमान कला संस्कृत का भावबोध गायब है। वे हिन्दी की रचनाएं भी नहीं पढ़ते, सिर्फ सिद्धान्त कौमुदी या लघु सिद्धान्त कौमुदी में बंद रहते हैं। वे हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास भी पढ़ लेते तो आधुनिक ता की कोई कोई खिड़की जरूर खुल जाती। ऋग्वेद से कभी तो बाहर निकलो भाई!


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