बांग्लादेश इस वर्ष अपने मुक्ति संघर्ष और स्थापना की 40वीं वर्षगांठ मना रहा है। ऐसे समय में तसलीमा नसरीन के बाद हिंदी के पाठकों से बांग्लादेश की एक और महत्वपूर्ण युवा उपन्यासकार तहमीमा अनम रू-ब-रू हैं। उनका पहला उपन्यास अ गोल्डन एज (2007) हिंदी में वो दौर सुनहरा शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। इस उपन्यास के लिए अनम को 2008 का कॉमनवेल्थ राइटर्स अवार्ड मिला था, जो लेखक की प्रथम रचना पर दिया जाता है। यह उपन्यास पूर्वी पाकिस्तान के बांगलादेश बनने (1971) की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। यह उसकी आजादी की लड़ाई का तारीखी इतिहास तो नहीं है, लेकिन उसके तानेबाने से ही कथा को बुना गया है। मुख्य रूप से यह कहानी एक ऐसी स्त्री की है, जिसके अतीत की जड़ें तत्कालीन पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान, दोनों में गहरे उतरी हैं। जबकि उसका वर्तमान उसके जवान हो चुके दो बच्चे हैं, जो अपने बांग्लादेश के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कहा जाता है कि स्त्री का कोई देश नहीं होता। उपन्यास की नायिका रेहाना हक भी शुरुआत में इस उलझन में रहती है कि उसकी वास्तविक जमीन कौन सी है? अपने आसपास के माहौल से अनजान तमाम दूसरे लोगों की तरह उसे भी यह भान नहीं होता कि आने वाले दिनों में क्या होने वाला है? लेकिन मुक्ति संघर्ष में शामिल अपने बच्चों को देखते-समझते रेहाना पाती है कि वह उसी तरफ है, जिस तरफ उसके बच्चे-सुहैल और माया! रेहाना की कहानी शुरू होती है, अपने बच्चों पर अधिकार खोने से। वह पूर्वी पाकिस्तान के शहर ढाका में रही है और अपने शौहर इकबाल के इंतकाल के बाद ससुराल, पश्चिमी पाकिस्तान या मायके कोलकाता (भारत) नहीं लौटना चाहती। उसके पास आय का कोई जरिया नहीं है और इसी कमजोरी का फायदा उठाकर ससुराल पक्ष अदालत में मुकदमा जीत सुहैल और माया को अपने अधिकार में लेलेता है। उपन्यास की कहानी परतों में उघड़ती हुई लगातार अतीत और वर्तमान में सक्रिय रहती है। रेहाना अपने लिए आय का जरिया बनाने के बाद बच्चों को फिर हासिल करती है। वे अब बड़े हो चुके हैं। उससे आजाद हो चुके हैं। रेहाना गौर करती है कि बच्चे अब बच्चे नहीं रहना चाहते और वह भी सिर्फ मां की भूमिका नहीं निभाना चाहती। इसके बावजूद तीनों एक छत के नीचे हैं। लेखिका ने मां-बेटी और मां-बेटे के रिश्तों को कुशलता से बुना है। खास तौर पर मां और बेटी के संबंधों को, जो लगातार तनाव में रहते हैं। युवा होती बेटी को लेकर मां की चिंता और बेटी का विद्रोह। हालांकि वक्त के साथ दोनों के रिश्ते में संतुलन पैदा होता है। वे एक-दूसरे को मां-बेटी के बजाय स्त्री के रूप में समझती हैं। इस समझ का शिखर वहां नजर आता है, जब मां अपनी बेटी के सामने अपने जीवन का अंतरंग सत्य उजागर करती है और कोई हाय-तौबा नहीं मचती। कॉलेज में पढ़ने वाले, बांगलादेश की आजादी की जंग लड़ रहे सुहैल और माया की रेहाना, घर और ढाका से अलग दुनिया बन चुकी है। उपन्यास में इन भाई-बहन की कहानी बांग्लादेश की जंग-ए-आजादी के हालात बयान करती चलती है। इसी के बीच में सुहैल का किरदार एक पे्रमी युवक के रूप में भी उभरता है। वह उस युवती को हासिल करना चाहता है, जो उसके बचपन की दोस्त है, मगर उसका निकाह किसी और से हो चुका है! ..और बेटे के स्नेह में गिरफ्तार रेहाना हक भी उसे अपनी पे्रमिका का प्यार दिलाने की खातिर जिंदगी में जोखिम उठाती जाती है। बांगलादेश के मुक्ति संघर्ष के समानांतार उपन्यास में रेहाना की कथा चलती है। रेहाना की जिंदगी से जुड़े नए-नए किरदार कहानी में आते हैं। मिस्टर और मिसेज सेनगुप्ता, मिसिज चौधुरी और उनकी बेटी सिल्वी, सिल्वी का फौजी अफसर मंगेतर/पति सबीर, रेहाना का देवर पाकिस्तानी फौजी फैज, उसकी पत्नी परवीन और मुक्ति संघर्ष में शामिल एक मेजर जो पहले पाकिस्तानी सेना में हुआ करता था। इन किरादरों में उत्साह है, जुनून है, उम्मीद है, विश्वास है, संघर्ष है, हताशा है, ईष्र्या है, डाह है, खोना और पाना है। उपन्यास में उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें अनम ने मुक्ति संघर्ष में तमाम लोगों की कुर्बानियों के बीच मुख्य किरदारों को कड़े संघर्ष के बीच जिंदा बचाए रखा। उन्हें मरने नहीं दिया। हाल में अनम का दूसरा अंग्रेजी उपन्यास आया है द गुड मुस्लिम नाम से। यह अ गोल्डन एज उपन्यास की दूसरी कड़ी है। बांग्लादेश बनने के बाद माया और सुहैल की कहानी। तहमीमा अनम का इरादा अभी खत्म नहीं हुआ है और वह इसकी तीसरी कड़ी लिखने के लिए तैयार है। अपने इस नए क्रम में वह माया और सुहैल के बच्चों की बात कहेंगी। वो दौर सुनहरा में 36 वर्षीया तहमीमा अनम अतीत के एक ऐतिहासिक दौर को पाठकों के सामने उभारने में पूरी तरह कामयाब रही हैं। इसमें कॉलेज के छात्रों का संघर्ष है, रिफ्यूजियों की दीन-हीन दशा है, मुक्ति वाहिनी को मदद देने वाले अनाम हाथ हैं, पाकिस्तानी सेना के अत्याचार हैं.. और बीबीसी वर्ल्ड सर्विस का यह रेडियो संदेश भी कि अगर इंदिरा गांधी दखल दें, तो यह जंग यकीनन बांगलादेश के लोगों के हक में जीती जा सकेगी..। इन सबके बीच रेहाना की कहानी एक मां होने से इतर भी बढ़ती है और घर में शरण लिए घायल मेजर से उसे पे्रम हो जाता है। एक मोड़ पर दोनों की कहानी हिंदी की अमर कथा उसने कहा था (चंद्रधर शर्मा गुलेरी) की याद दिला देती है। शिवानी खरे ने अंगे्रेजी से इस उपन्यास का अनुवाद किया है-यह सहज है।
Wednesday, June 29, 2011
मुक्ति संघर्ष के दिनों की यादें
बांग्लादेश इस वर्ष अपने मुक्ति संघर्ष और स्थापना की 40वीं वर्षगांठ मना रहा है। ऐसे समय में तसलीमा नसरीन के बाद हिंदी के पाठकों से बांग्लादेश की एक और महत्वपूर्ण युवा उपन्यासकार तहमीमा अनम रू-ब-रू हैं। उनका पहला उपन्यास अ गोल्डन एज (2007) हिंदी में वो दौर सुनहरा शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। इस उपन्यास के लिए अनम को 2008 का कॉमनवेल्थ राइटर्स अवार्ड मिला था, जो लेखक की प्रथम रचना पर दिया जाता है। यह उपन्यास पूर्वी पाकिस्तान के बांगलादेश बनने (1971) की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। यह उसकी आजादी की लड़ाई का तारीखी इतिहास तो नहीं है, लेकिन उसके तानेबाने से ही कथा को बुना गया है। मुख्य रूप से यह कहानी एक ऐसी स्त्री की है, जिसके अतीत की जड़ें तत्कालीन पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान, दोनों में गहरे उतरी हैं। जबकि उसका वर्तमान उसके जवान हो चुके दो बच्चे हैं, जो अपने बांग्लादेश के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कहा जाता है कि स्त्री का कोई देश नहीं होता। उपन्यास की नायिका रेहाना हक भी शुरुआत में इस उलझन में रहती है कि उसकी वास्तविक जमीन कौन सी है? अपने आसपास के माहौल से अनजान तमाम दूसरे लोगों की तरह उसे भी यह भान नहीं होता कि आने वाले दिनों में क्या होने वाला है? लेकिन मुक्ति संघर्ष में शामिल अपने बच्चों को देखते-समझते रेहाना पाती है कि वह उसी तरफ है, जिस तरफ उसके बच्चे-सुहैल और माया! रेहाना की कहानी शुरू होती है, अपने बच्चों पर अधिकार खोने से। वह पूर्वी पाकिस्तान के शहर ढाका में रही है और अपने शौहर इकबाल के इंतकाल के बाद ससुराल, पश्चिमी पाकिस्तान या मायके कोलकाता (भारत) नहीं लौटना चाहती। उसके पास आय का कोई जरिया नहीं है और इसी कमजोरी का फायदा उठाकर ससुराल पक्ष अदालत में मुकदमा जीत सुहैल और माया को अपने अधिकार में लेलेता है। उपन्यास की कहानी परतों में उघड़ती हुई लगातार अतीत और वर्तमान में सक्रिय रहती है। रेहाना अपने लिए आय का जरिया बनाने के बाद बच्चों को फिर हासिल करती है। वे अब बड़े हो चुके हैं। उससे आजाद हो चुके हैं। रेहाना गौर करती है कि बच्चे अब बच्चे नहीं रहना चाहते और वह भी सिर्फ मां की भूमिका नहीं निभाना चाहती। इसके बावजूद तीनों एक छत के नीचे हैं। लेखिका ने मां-बेटी और मां-बेटे के रिश्तों को कुशलता से बुना है। खास तौर पर मां और बेटी के संबंधों को, जो लगातार तनाव में रहते हैं। युवा होती बेटी को लेकर मां की चिंता और बेटी का विद्रोह। हालांकि वक्त के साथ दोनों के रिश्ते में संतुलन पैदा होता है। वे एक-दूसरे को मां-बेटी के बजाय स्त्री के रूप में समझती हैं। इस समझ का शिखर वहां नजर आता है, जब मां अपनी बेटी के सामने अपने जीवन का अंतरंग सत्य उजागर करती है और कोई हाय-तौबा नहीं मचती। कॉलेज में पढ़ने वाले, बांगलादेश की आजादी की जंग लड़ रहे सुहैल और माया की रेहाना, घर और ढाका से अलग दुनिया बन चुकी है। उपन्यास में इन भाई-बहन की कहानी बांग्लादेश की जंग-ए-आजादी के हालात बयान करती चलती है। इसी के बीच में सुहैल का किरदार एक पे्रमी युवक के रूप में भी उभरता है। वह उस युवती को हासिल करना चाहता है, जो उसके बचपन की दोस्त है, मगर उसका निकाह किसी और से हो चुका है! ..और बेटे के स्नेह में गिरफ्तार रेहाना हक भी उसे अपनी पे्रमिका का प्यार दिलाने की खातिर जिंदगी में जोखिम उठाती जाती है। बांगलादेश के मुक्ति संघर्ष के समानांतार उपन्यास में रेहाना की कथा चलती है। रेहाना की जिंदगी से जुड़े नए-नए किरदार कहानी में आते हैं। मिस्टर और मिसेज सेनगुप्ता, मिसिज चौधुरी और उनकी बेटी सिल्वी, सिल्वी का फौजी अफसर मंगेतर/पति सबीर, रेहाना का देवर पाकिस्तानी फौजी फैज, उसकी पत्नी परवीन और मुक्ति संघर्ष में शामिल एक मेजर जो पहले पाकिस्तानी सेना में हुआ करता था। इन किरादरों में उत्साह है, जुनून है, उम्मीद है, विश्वास है, संघर्ष है, हताशा है, ईष्र्या है, डाह है, खोना और पाना है। उपन्यास में उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें अनम ने मुक्ति संघर्ष में तमाम लोगों की कुर्बानियों के बीच मुख्य किरदारों को कड़े संघर्ष के बीच जिंदा बचाए रखा। उन्हें मरने नहीं दिया। हाल में अनम का दूसरा अंग्रेजी उपन्यास आया है द गुड मुस्लिम नाम से। यह अ गोल्डन एज उपन्यास की दूसरी कड़ी है। बांग्लादेश बनने के बाद माया और सुहैल की कहानी। तहमीमा अनम का इरादा अभी खत्म नहीं हुआ है और वह इसकी तीसरी कड़ी लिखने के लिए तैयार है। अपने इस नए क्रम में वह माया और सुहैल के बच्चों की बात कहेंगी। वो दौर सुनहरा में 36 वर्षीया तहमीमा अनम अतीत के एक ऐतिहासिक दौर को पाठकों के सामने उभारने में पूरी तरह कामयाब रही हैं। इसमें कॉलेज के छात्रों का संघर्ष है, रिफ्यूजियों की दीन-हीन दशा है, मुक्ति वाहिनी को मदद देने वाले अनाम हाथ हैं, पाकिस्तानी सेना के अत्याचार हैं.. और बीबीसी वर्ल्ड सर्विस का यह रेडियो संदेश भी कि अगर इंदिरा गांधी दखल दें, तो यह जंग यकीनन बांगलादेश के लोगों के हक में जीती जा सकेगी..। इन सबके बीच रेहाना की कहानी एक मां होने से इतर भी बढ़ती है और घर में शरण लिए घायल मेजर से उसे पे्रम हो जाता है। एक मोड़ पर दोनों की कहानी हिंदी की अमर कथा उसने कहा था (चंद्रधर शर्मा गुलेरी) की याद दिला देती है। शिवानी खरे ने अंगे्रेजी से इस उपन्यास का अनुवाद किया है-यह सहज है।
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