Tuesday, March 22, 2011

राजनीति में फुर्सत के क्षण


डॉ.राम मनोहर लोहिया की पुस्तक ‘इंटरवल ड्यूरिंग पॉलिटिक्स’ (राजनीति में फुर्सत के क्षण) में सोलह निबंध हैं जिनके विषय भिन्न-भिन्न हैं जैसे विश्व परिक्रमा, राम, कृष्ण और शिव, एक योगानुभूति, भारतीय वर्णमाला, सुंदरता और त्वचा का रंग, भारत की नदियां आदि। ‘विश्व परिक्रमा’ शीर्षक निबंध कई दृष्टियों से बहुत रोचक है और इसमें व्यक्तियों, स्थानों और वस्तुओं के, जिन्हें लोहिया ने दुनिया में देखा, शब्द चित्र दिए गए हैं। विनोद-व्यंग्य उनकी रचनाओं में जरा-सा मौका मिलने पर भी मौजूद रहता है। बाहरी पहलुओं का वर्णन और भीतरी पहलुओं का अंत: निरीक्षण उनकी रचनाओं को भौतिक जानकारी तथा आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रेत बनाता है। यथार्थ और कल्पना का प्रवाह समानांतर रेखाओं में बहता है।

कटाक्ष के उस्ताद
एक स्थान पर डॉ. लोहिया लिखते हैं : ‘मुझे अमेरिका के लोग बहुत अच्छे लगते हैं किंतु उनकी सभ्यता के बारे में मेरे मन में संदेह है।’ मनुष्यों और वस्तुओं के बीच इस प्रकार का सूक्ष्म विभेद उनके लेखन की मुख्य विशेषताएं हैं। कटाक्ष के तो वे उस्ताद हैं। वी.के. कृष्णा मेनन के बारे में लिखते हैं कि ‘मेनन कुशल राजनयज्ञ हैं। यह कौशल, कम से कम उसका बड़ा भाग, केरल के मातृप्रधान समाज की विशेष देन है। मां के शासन में बच्चे को एक साथ तीन मालिकों को खुश रखना पड़ता है, माता, पिता और मामा। इसमें कोई आश्र्चय नहीं कि श्री मेनन कभी-कभी छोटे पैमाने पर ही सही, रूस, फ्रांस और अमेरिका को खुश रखने में सफल रहे। अत: इसमें आश्र्चय नहीं होना चाहिए कि मेनन में तीन प्रतिद्वंद्वी शक्तियों के साथ खेलने का कौशल आया।’
डॉ. लोहिया की साहित्यिक और वर्णनात्मक प्रतिभा का एक पहलू है। साहित्यिक शैली का जादुई स्पर्श जिससे वे मामूली तथ्य को भी महत्त्वपूर्ण बना देते हैं। वे लिखते हैं :‘फ्रैंकफुर्त्त से बेलग्रेड तक मेरी विमान परिचारिका का नाम मीरा था, स्लाव भाषा में जिसका अर्थ होता है शांति और जो भारत में भक्ति के आवेग की प्रतीक मानी जाती है। यह मानव जाति के भौतिक और आध्यात्मिक सामीप्य का एक उदाहरण है।
राजनीति असंतोषजनक पेशा
संस्कृति की गहराई से अपरिचित व्यक्तियों के हाथ में राजनीति का आना उनके लिए न भी सही, देश के लिए घातक होता है। चूंकि लोहिया राजनीति और संस्कृति दोनों का संश्लिष्ट स्वरूप थे, राजनीति की वर्तमान स्थिति पर दुख प्रकट करते हुए उन्होंने लिखा ‘वर्तमान समय में राजनीति असंतोषजनक पेशा है। वह अपने भीतर अपर्याप्तता का दंश लिए रहती है। यह धन की समस्याओं से तथा जीत और हार के सवालों से बहुत ज्यादा आच्छादित रहती है। इसकी भाषा झगड़े और क्रोध की भाषा होती है। राजनीति में अंत: निरीक्षण का अनुशासन लाया जाना चाहिए। अनुशासन निष्ठा, अंतर्दृष्टि, मानवीय दृष्टिकोण और करुणा के गुण जिन राजनेताओं में नहीं हैं उनके हाथ में राजनीति की बागडोर होगी तो यह बहुत बुरी राजनीति करेंगे। राजनीति का दिशा-निर्देश प्यार की शक्ति से होना चाहिए, न कि शक्ति के प्यार से। स्वतंत्र देश की अनगढ़ राजनीति गुलाम देश की परिष्कृत राजनीति से ज्यादा हानिकारक होती है। इसीलिए प्रत्येक देश में राजनीति के गिर्द संस्कृति का वातावरण होना चाहिए तभी मानव जीवन के हर क्षेत्र में सच्चा लोकतंत्र आ सकता है।
असह्य नहीं हो सकती कोई पीड़ा
विद्रोही राजनीतिक कैदी के रूप में उन्होंने असह्य यातनाएं झेलीं तथापि वे कहते हैं कि जो यातनाएं उन्होंने झेलीं, वे असह्य नहीं थीं। उन्होंने कहा ‘अनेक असह्य यातनाओं को झेलने के बाद मैंने इनकी पीड़ा और सह्यता-असह्यता के बारे में अध्ययन किया। मुझे लगा कि असह्यता के विचार में निश्चय ही कोई गलती होगी। मैंने कितनी ही बार इसे झेला है। फिर भी मैंने हर बार इस पर विजय पाई है। यातनाओं को मैंने अधिक धैर्य के साथ सहा। इसका मुझे लाभ मिला और इस अकाट्य निष्कर्ष पर पहुंचा कि कोई भी पीड़ा असह्य नहीं हो सकती।’आदमी दुख को आने से रोक नहीं सकता किंतु वह उस पर लगातार अभ्यास से पीड़ा और मन के तनाव को सहन कर सकता है, अन्यथा जीवन अनवरत पीड़ा और अनंत दुखों का स्रेत बन जाएगा।
सौंदर्यानुभूति के गजब के उपासक
तर्कपूर्ण विचार के साथ-साथ लोहिया का झुकाव सौंदर्यानुभूति की ओर भी था। उन्होंने दिवस, संध्या, भोर और चांदनी का सौंदर्य देखा था। उन्होंने लिखा : ‘मैंने वस्तुओं को तेज धूप में, संध्या की फीकी रोशनी में तथा चांदनी में देखा तथा उसका अध्ययन किया। दिन की चमक सौंदर्य में वृद्धि नहीं करती। यह बहुत ज्यादा दिखाती है। विवरण सूक्ष्म रेखाओं पर छा जाते हैं। संध्या की फीकी पड़ती रोशनी सौंदर्य को निखारती है किंतु यह कुछ-कुछ अवास्तविक और ओझल हो रहा सौंदर्य होता है। चांदनी सौंदर्य को निखारने वाला सबसे बड़ा कारक है, चांद पूरा हो तो और भी अच्छा। यह अकारण नहीं है कि प्राचीन भारत की और सम्भवत: अन्य स्थानों की भी, सम्भावी बधुएं अपने को सर्वप्रथम पूर्णचंद्र के प्रकरण में ही दिखाती थीं। चंद्रमा सब चीजों को सौंदर्य से नहला देता है किंतु वह इसे भोर की स्वच्छता नहीं दे पाता।
मानवबोध के विशिष्ट पारखी
‘मीनिंग इन स्टोन’ शीर्षक का लेख बहुत रोचक है। इसमें कला की समीक्षा और इतिहास को विशेषकर स्थापत्य कला के इतिहास को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया है। अजंता, एलोरा, एलिफेंटा, खजुराहो, सांची, गंधार, मथुरा, अमरावती, महाबलिपुरम, हेलीबिड श्रवण बेलगोला आदि सभी की मूर्तिकला के कलात्मक सौंदर्य का वर्णन किया गया है। मूर्ति कला के सभी घरानों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है और उनके तकनीकी तथा विचारात्मक पहलुओं का विश्लेषण किया गया है। भारतीय स्थापत्य कला की अपनी मूर्ति निर्माण परम्परा रही है। अत: प्रस्तर अथवा कांस्य रूप न तो मूर्त है और न अमूर्त; वे आदर्शात्मक हैं। भारतीय मूर्तिकला प्रस्तर पर लिखी गई कविता, दर्शन तथा रूपांकन है। डॉ. लोहिया कहते हैं ‘भारतीय जनता ने अपने धर्म तथा इतिहास को पत्थर पर उकेरा है। उन्होंने इतिहास की विशेष चिंता नहीं की, यह देखकर कि यह अत्यंत अस्थायी एवं नश्वर है अत: उसने किंवदंतियों के रूप में उसे शाश्वतता प्रदान की है। किसी अन्य जाति ने इस प्रकार इतिहास की आत्मा या आत्मा के इतिहास को सुंदर प्रस्तर में रूपांतरित नहीं किया है।’




No comments:

Post a Comment