Sunday, March 13, 2011

बाजारवाद के बीच इंसान


 पचास साल पहले नई कहानी और नई कविता में आया आयातित शहरी अकेलापन अब कितना देसी हो गया है। इसे जानना है तो गीत चतुर्वेदी के कहानी संग्रह पिंक स्लिप डैडी को पढ़ना जरूरी है। संग्रह की तीनों कहानियां गोमूत्र, सिमसिम और पिंक स्लिप डैडी आपको एक ऐसे रचना संसार में ले जाएंगी, जो वाचाल होते हुए भी मौन और ठोस होते हुए भी तरल है। इसलिए इन्हें पढ़ते हुए कहानी के साथ-साथ कविता का भी आनंद आता है। कथाकार की सबसे बड़ी खूबी उनकी मौलिकता है। न सिर्फ उनकी भाषा में ताजापन है, बल्कि कथा कहने का अंदाज भी निराला है। उनकी रचना पाठक को चुनौती देती प्रतीत होती हैं। यही सफल रचना की कसौटी होती है। तीन कहानियों के अपने पहले संग्रह सावंत आंटी की लड़कियां से चर्चित हुए गीत निस्संदेह आधुनिक साहित्य के सबसे सशक्त हस्ताक्षरों में शामिल हैं। इसमें कोई दोराय नहीं है कि जैनेंद्र के जहाज का पंछी से लेकर अज्ञेय के अपने अपने अजनबी तक में औद्योगिकीरणअकेलापन, संत्रास, कुंठा, स्वांग, भ्रम और अवसाद का बखूबी चित्रण हुआ है, लेकिन उनकी रचनाओं के पात्र और उनकी परिस्थितियां देशज नहीं लगती हैं। गीत के पात्र अपने आसपास के लगते हैं। पिछले बीस साल में उदारीकरण के कारण समाज के तानेबाने में जो परिवर्तन आए हैं, उन पर कथाकार की गजब की पकड़ है। 1990 से पहले होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड जैसे शब्द अनजाने लगते थे और अब हर दूसरी शख्स या तो इनका आनंद उठा रहा है या इनसे पीडि़त है। संग्रह की पहली कहानी गोमूत्र का नायक दूसरी श्रेणी में शामिल है। क्रेडिट कार्ड का बिल नहीं भरने पर जब बैंक के नुमाइंदे उसे बार-बार परेशान करते हैं तो वह उन पर बरस पड़ता है। इसके जवाब में उधर से आवाज आती है, भिखारी मैं हूं या आप? क्यों इस तरह चिल्लाकर बात कर रहे हैं? कर्जा आपने लिया है, मैंने नहीं..। पहले कर्जा चुकाइए, फिर जितनी मर्जी हो चिल्लाइए। जब भर नहीं सकते, तो क्यों ले लेते हो कर्जा? कहानी संग्रह की शीर्षक रचना पिंक स्लिप डैडी सही अर्थो में औपन्यासिक संभावनाओं वाली कहानी है। यह अध्याय कॉरपोरेट दुनिया के बदलते न सिर्फ चरित्र को बताती है, बल्कि इसकी वास्तविकताओं से भी पाठकों को भलीभांति अवगत कराती है। कुल मिलाकर यह कारपोरेट दुनिया की की एक सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करती है। इसका नायक प्रफुल्ल शशिकांत दाधीच यानी पीएसडी यानी पिंक स्लिप डैडी। सफलता की कामना करने वाला अपर मिडिल क्लास का एक व्यक्ति है, जिसके तरकश में वे सारे तीर हैं जो उसके निशाने को वेधने के लिए और लक्ष्यों को पाने के लिए ही बनाए गए हैं। इसके बावजूद भी वह स्थिर नहीं रह पाता, क्योंकि वह किसी भी स्थिति में खुद असफल होते नहीं देखना चाहता, बल्कि यों कहें कि विफल होने की कल्पना मात्र से ही उसे घृणा है। इसलिए वह धीरे-धीरे एक ऐसी दुनिया का हिस्सा बनता जाता है, जहां प्रेम और घृणा के बीच कोई फर्क नहीं रह जाता। उस दुनिया में चालाकी, मक्कारी, धूर्ततानाटक..का बड़ा मोल है। यही हकीकत है। ईमानदारी, सच्चाई और निष्ठा जैसे सद्गुण अब अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। इनका कोई मोल नहीं रह गया है। जो अब भी इनसे चिपके हुए हैं, यह उनकी मर्जी नहीं, बल्कि मजबूरी है। ऐसे लोगों के लिए इस सिस्टम में कोई जगह नहीं है। पीएसडी के उन पात्रों की तरह उन्हें भी एक-एक कर नेपथ्य में चले जाना होगा, जो सिस्टम के साथ नहीं चल सकते। सिस्टम कह रहा है कि मंदी है। छंटनी जरूरी है। लोगों को पिंक स्लिप देना ही पड़ेगा। टॉप मैनेजमेंट का कर्तव्य है कि वे सिस्टम के सुर में सुर मिलाएं। नहीं तो पीएसडी के जयंत लाल की तरह अलग हो जाएं। पीएसडी समकालीन भारत की पहली बड़ी कथा रचना है, जिसका संबंध कॉरपोरेट दुनिया से है। उस दुनिया से, जहां पुरानी बोतल में नई शराब डालकर उसे विज्ञापन के दम पर बेचा जाता है। पुराने जमाने में किसी कंपनी का एमडी अपने पुराने कर्मचारी को बरसों बाद उसके नाम से पुकारता था और उसके बच्चों की सुध लेता था तो उसे मानवीय कहा जाता है लेकिन आज इसे कॉरपोरेट सोशल रेस्पांसिबिलिटी यानी सीएसआर कहा जाता है। यह सचमुच में मानवीय हुए बिना मानवीयता होने का उपक्रम है। इस स्वांग के दुष्प्रभाव सिर्फ कंपनी पर ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े लोगों पर भी पड़ रहा है। वह अपने घर में भी नाटक करने लगते हैं। कथा नायक पिंक स्लिप डैडी का प्रफुल्ल शशिकांत दाधीच हो या फिर गोमूत्र का अनाम नायक, सबके लिए प्रेम स्थायी भाव न होकर क्षणिक आवेग की तरह है। इसलिए गोमूत्र के नायक को अपनी पत्नी कभी काम करने वाली नजर आती है और कभी खाना बनाने वाली तो कभी वह बगल में लेटी प्रेयसी बन जाती है। यह रूपांतरण आधुनिकता का आवश्यक बाई प्रोडक्ट है। वह आधुनिकता, जो बाजारवाद की बुनियाद पर बहुत मजबूती से आगे बढ़ रही है। हमारे और आपके जीवन में यह बाजार बहुत अंदर तक घुस आया है। इसके नतीजे भयानक हैं। यह कहां जाकर रुकेगा कोई नहीं जानता। इतने बड़े रचना संसार को शब्दों से सुंदर आकार देना आसान काम नहीं है। इसे कामयाबी से अंजाम देकर गीत चतुर्वेदी ने यह साबित कर दिखाया है कि वह सिर्फ स्वनदर्शी विचारक ही नहीं, बल्कि कलम के भी धनी हैं|

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