आपके उपन्यास काशी का अस्सी पर फिल्म बनने जा रही है। कैसा लग रहा है? अच्छा लग रहा है। इसलिए भी कि डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी मेरे उपन्यास पर फिल्म बना रहे हैं। चंद्र प्रकाश उन लोगों गिने-चुने फिल्मकारों में एक हैं, जो लिखते-पढ़ते रहे हैं। साहित्य की समझ और इसमें दिलचस्पी रखते हैं। वे काशी का अस्सी कई बार पढ़ चुके हैं। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उन्होंने इसे कंठस्थ कर लिया है। दरअसल, चंद्र प्रकाश जी को यह उपन्यास बहुत पसंद आया और उन्होंने ठान लिया कि इस पर काम करना है और अंतत: वह मेरे उपन्यास पर मोहल्ला अस्सी के नाम से फिल्म बना रहे हैं, जिसकी शूटिंग इन दिनों चल रही है। इससे पहले कई बड़े लेखकों की कृतियों पर फिल्में बन चुकी हैं। कुछ में मूल कथानक से छेड़छाड़ के आरोप भी लगे और सबसे बड़ी बात यह कि ज्यादातर बाजार में पिट गई। फिल्म के लिए हामी भरते हुए ये सब बातें आपके जेहन में थीं? जब पहली बार चंद्र प्रकाश जी ने मुझसे संपर्क किया और फिल्म बनाने को लेकर अपनी मंशा जाहिर की तो मन में यह सवाल जरूर आया था कि क्या वह उपन्यास के साथ न्याय कर पाएंगे? जब मैंने चंद्र प्रकाश जी के आगे इस सवाल को उड़ेल दिया तो उन्होंने मुझे अमृता प्रीतम के उपन्यास पर बनाई गई अपनी फिल्म पिंजर देखने का आग्रह किया। फिर मैंने यह फिल्म देखी और वास्तव में उस शख्स ने (चंद्र प्रकाश द्विवेदी) एक कमजोर उपन्यास को बिना उसकी आत्मा से छेड़छाड़ किए एक बेहतरीन फिल्म बना दी। दूसरी बात यह है कि फिल्में मनोरंजन के लिए बनती हैं। कुछ बदलाव किए बिना फिल्म बनाना मुश्किल होता है और जोखिम भरा भी। अब मेरे उपन्यास और फिल्म के टाइटल को ही ले लीजिए। दोनों अलग-अलग हैं। वैसे, चंद्र प्रकाश द्विवेदी एक बेहतरीन फिल्म बनाने में सक्षम हैं। काशी का अस्सी में गालियों को लेकर आपकी आलोचना भी होती रही है। तो क्या एक बार फिर आप और चंद्र प्रकाश आलोचनाएं झेलने के लिए तैयार हैं? मैं आपका आशय समझ गया। देखिए, काशी का अस्सी की आत्मा और शरीर अगर पप्पू की दुकान है तो गालियां इसका गहना। फिल्म से अगर इन्हें निकाल दिया जाएगा तो फिर बचेगा ही क्या। वैसे भी गालियां बनारस या कह लें पूरे पूर्वाचल में प्यार जताने का भी साधन हैं। गालियों के बिना बनारस की तहजीब, परंपरा, संस्कृति को बयां करना अधूरा है। जाहिर है, फिल्म में गालियां होंगी, लेकिन मैं बता दूं कि मोहल्ला अस्सी की गालियों और आम फिल्मों की गालियों में अंतर है। मोहल्ला अस्सी में गालियां प्यार की अभिव्यंजना हैं। आपने जब काशी का अस्सी लिखा, वह दौर और था, आज का दौर बिल्कुल अलग है। लोगों की अभिरुचियां बदल गई हैं। काशी भी बहुत बदल गया है। ऐसे में मोहल्ला अस्सी फिल्म आज की पीढ़ी को उनका जायका दे पाएगी? यह बिल्कुल सच है कि आज ज्यादातर फिल्में एलीट क्लास को फोकस करके बनाई जा रही हैं, लेकिन हाल की कुछ फिल्मों ने यह मिथक तोड़ा है कि आज की तारीख में सिर्फ वही फिल्में कामयाब होती हैं, जो एलीट क्लास के ज्यादा करीब होती हैं। दरअसल, ग्लोबलाइजेशन के दौर में बहुत कुछ बदल गया है। लोग बदल गए हैं। संस्कृति, रहन-सहन, बोलचाल सबमें फर्क आया है। ऐसे में लोग जानना चाहतें हैं कि क्या-क्या बदला है। हमने क्या-क्या खोया है। किससे हम वंचित रहे हैं। देश के छोटे शहरों और खासकर पूरब के लोगों को तो मोहल्ला अस्सी अपने मोहल्ले की दास्तान लगेगी। चूंकि इस फिल्म के निर्माण से लखनऊ के रहने वाले सौरभ शुक्ला भी जुड़े हैं, लिहाजा इस नवाबी शहर की ठसक और तहजीब का अक्स भी इस फिल्म में नजर आएगा। कहते हैं कि बड़ी शख्सियत में शुमार होने के लिए बड़े शहरों में बसना जरूरी है। दूसरे शब्दों में कहें तो छोटे शहरों में सफलता का दायरा बहुत सीमित होता है। क्या आपको कोई मलाल है? बिल्कुल नहीं। मेरी अपनी दुनिया है। मैं यहीं मस्त हूं। जहां तक बड़े शहरों और बड़े शहरों के बड़े लेखकों का सवाल है तो उनकी शोहरत और सफलता उन्हें ही मुबारक। मैं यही कहूंगा कि उनकी शोहरत और उनका रुतबा तो तात्कालिक है। वे वर्तमान में भले जी लें, लेकिन रचनात्मकता के लिए छोटे शहरों में जीना पड़ता हैं। रचनात्मकता उनसे ही जुड़ी रहती है, जो अपनी जड़-जमीन से जुड़े होते हैं। दूसरे शब्दों में कहूं तो अपनी जड़ों पर ही खड़ा होता है साहित्य का वटवृक्ष। साहित्यिक हलकों में कहा जाता है कि अब संस्मरण विधा को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। इसे खतरा किससे है? मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता। मैं तो कहूंगा कि संस्मरण विधा पहले से ज्यादा सशक्त होती जा रही है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मेरे लिखने के बाद लोगों ने इसे गंभीरता से लेना शुरू किया। आज स्थिति यह है कि हर पत्र-पत्रिका में संस्मरण को स्थान दिया जा रहा है। अब जब आपके उपन्यास पर फिल्म बन रही है तो क्या आगे फिल्मों के लिए लिखने का कोई इरादा है? देखिए, मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि काशी का अस्सी पर कोई फिल्म बनेगी। हालांकि इससे पहले तमाम साहित्यकारों की कृतियों पर फिल्में बन चुकी हैं। मैं मानता हूं कि घर-घर, गली-फुटपाथ, शहर-गांव तक अपनी रचना पहुंचाने के लिए फिल्म एक सशक्त माध्यम है। हम लेखकों के सामने सचेत पाठक होता है। पाठक यानी जो पढ़ना-लिखना जानता हो, लेकिन फिल्मकारों के लिए ऑडियन्स का विस्तृत दायरा होता है। ऐसे में प्राय: लेखक फिल्म के लिए लिखने का मोह संवरण नहीं कर पाते। लेकिन जहां तक मेरी बात है तो मैं यह मानकर नहीं लिखूंगा कि मेरे उपन्यास, मेरी कहानी पर फिल्म बने। और न ही मैं मुंबई में फिल्म की कहानी लिखने जाऊंगा। हां, अगर किसी फिल्मकार को मेरी कोई रचना पसंद आती है तो इस पर वह काम कर सकता है। इससे पहले 1975 में लिखे मेरे उपन्यास अपना मोर्चा पर नाटक का मंचन हुआ था। जिसका निर्देशन देवेंद्र राज अंकुर ने किया था और अभिनय किया था मनोज वाजपेयी ने। इसी तरह कवन ठगवा नगरिया लूटल हो का भी नाट्य मंचन हुआ था। ऐसी मेरी कई रचनाएं हैं, जो किसी न किसी रूप में दर्शकों के सामने आई। हाल के दिनों में कोई ऐसी किताब, जिसे पढ़कर लेखक की पीठ थपथपाने का मन हुआ हो? कुछ दिनों पहले ही मैंने ग्लोबल गांव के देवता पढ़ा। यह एक बेहतरीन उपन्यास है। इसके लेखक हैं रणेंद्र। वह रांची में रहते हैं। उन्होंने अपने इस उपन्यास में आदिवासियों-जनजातियों की पीड़ा का जीवंत चित्रण किया है। इसमें मानव समाज की उत्पत्ति से विकास क्रम में बेहतरी की अदम्य तलाश एवं निरंतर कठिन श्रम के जरिये विशिष्ट योगदान देने वाले समुदायों और खासकर जनजातियों को कालांतर में निरंतर हाशिये पर धकेल दिए जाने की ऐतिहासिक समझ भी मिलती है। अब आपकी आगे की योजनाएं क्या हैं? हाल ही में दो कहानियां पूरी की हैं। इसमें से एक तद्भव के अगले अंक में प्रकाशित हो रही है। जहां तक आगे की बात है तो मैं कहानी के प्लॉट के लिए तड़प रहा हूं। उम्मीद है जल्द ही कथा के सारे पुर्जे मिल जाएंगे। लोक कथाएं हमारी पूंजी हैं। सोच रहा हूं इस पर कुछ काम किया जाए। आज की तारीख में किसी युवा लेखक से उम्मीद? ऐसे कई लेखक हैं, जो लिखते हैं तो मानो अपनी आत्मा को निकालकर अपनी कलम की रोशनाई में घोल देते हैं। मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहूंगा, क्योंकि इससे उन लोगों को तकलीफ भी हो सकती है, जो मेरी कसौटी पर खरे नहीं उतरते हों। ऐसा पहले हो भी चुका है|
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