Tuesday, March 22, 2011

सपना भारत-पाक महासंघ का


हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की जनता को चाहिए अब इस मसले पर सोचना शुरू करें। इसके बने बिना हम दुनिया में हमेशा किसी न किसी के मोहताज या शिकार बनते रह जाएंगे। अब रहा कश्मीर का सवाल तो मेरा बस चले तो मैं कश्मीर का मामला बिना इस महासंघ के हल नहीं करूंगा। मैं साफ बोलना चाहता हूं कि अगर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का महासंघ बनता है, तब मैं कश्मीर के बारे में कोई भी बात सोचने को तैयार हो जाता हूं। चाहे कश्मीर हिन्दुस्तान के साथ रहे, चाहे कश्मीर पाकिस्तान के साथ रहे या चाहे कश्मीर एक अलग इकाई बनकर इस हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के महासंघ में आए पर महासंघ बने कि जिससे हम सब लोग फिर से एक ही खानदान के अन्दर बने रहें
हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का मसला, अगर सरकारों की तरफ देखें, तो सचमुच बहुत बिगड़ा हुआ है। इसमें शक नहीं है। जरा-जरा-सी बातों को बढ़ावा दिया गया है और लड़ रहे हैं। अखबारों में दिन-रात एक दूसरे को गरमा रहे हैं। ऐसी सूरत में मैं आपसे पाकिस्तानिहन्दुस्तान के महासंघ की बात करना चाहता हूं। एक देश तो नहीं, एक राज नहीं लेकिन दोनों कम से कम कुछ मामलों में शुरुआत करें एका की। वह निभ जाए तो अच्छा और न निभे तो और कोई रास्ता देखा जाएगा। बस और बातों में न सही लेकिन नागरिकता के मामले में और अगर हो सके तो थोड़ा-बहुत विदेश नीति के मामले में, थोड़ा-बहुत पलटन के मामले में एक महासंघ की बातचीत शुरू हो। मैं साफ कह देना चाहता हूं जो विचार मैं आपके सामने रख रहा हूं, वही मैंने लोकसभा में भी रखा था। यह कहते हुए कि यह विचार सरकारों के पैमाने पर आज शायद अहमियत नहीं रखता। इसलिए हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की जनता को चाहिए अब इस ढंग से वह सोचना शुरू करें। नई तरह की चीजें सोचना भी जरूरी होता है। मैं इस बात के लिए तैयार हूं। मैं नहीं कहता कि हर एक आदमी इस चीज को मान ले लेकिन वह कम से कम सोचे तो इस बात पर। इसके दूसरे तरीके भी निकल सकते हैं। अगर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का महासंघ बनता है तो जब तक मुसलमानों को या पाकिस्तानियों को तसल्ली नहीं हो जाती, तब तक के लिए संविधान में कलम रख दी जाये कि इस महासंघ का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, दो में से एक पाकिस्तानी रहेगा। इस पर लोग कह सकते हैं कि तुम अन्दर-अन्दर रगड़ क्यों पैदा करना चाहते हो? जिस चीज को पुराने जमाने में कांग्रेस और मुस्लिम लीग वाले नहीं कर पाए। अब तुम फिर से रगड़ पैदा करना चाहते हो? इसका मैं एक सीधा-सा जवाब दूंगा कि 16 बरस हमने यह बाहर वाली रगड़ करके देख लिया, अब फिर अन्दर की रगड़ कैसी भी हो, इससे तो कम से कम ज्यादा अच्छी ही होगी। यह बाहर वाली पाकिस्तान-हिन्दुस्तान की रगड़ है। उसको हम निभा नहीं सकते। इसके चलते तो हम दुनिया में हमेशा मोहताज रहेंगे। हमेशा किसी न किसी के मोहताज या शिकार बनते रह जाएंगे। हो सकता है, लोग कश्मीर वाला सवाल उठाएं। कश्मीर का सवाल अलग से हल करने की जब बात चलती है, तो मैं कुछ भर लेने-देने को तैयार नहीं हूं। मेरा बस चले तो मैं कश्मीर का मामला बिना इस महासंघ के हल नहीं करूंगा। आजकल जो बातें चलती हैं, उनमें सिलसिला नहीं है। मैं इतना कहना चाहूंगा कि अगर नहरी पानी का हल अलग से करो तो फिर दूसरा कोई सवाल खड़ा हो जायेगा। मान लो कश्मीर का किसी तरह से हल कर लो, फिर तीसरा कोई सवाल खड़ा हो जायेगा। पूर्वी पाकिस्तान के हिन्दुओं का, या पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान आने-जाने के रास्ते का। इसलिए मैं साफ बोलना चाहता हूं कि अगर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का महासंघ बनता है, तब मैं कश्मीर के बारे में कोई भी बात सोचने को तैयार हो जाता हूं, चाहे कश्मीर हिन्दुस्तान के साथ रहे, चाहे कश्मीर पाकिस्तान के साथ रहे, चाहे कश्मीर एक अलग इकाई बनकर इस हिन्दुस्तान- पाकिस्तान के महासंघ में आये पर महासंघ बने कि जिससे हम सब लोग फिर से एक ही खानदान के अन्दर बने रहें। इस महासंघ के तरीके पर बुनियादी तौर पर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की जनता सोचना शुरू करे।
कश्मीर का समाधान
शेख अब्दुल्ला ने कभी भी कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की बात नहीं की, जहां तक मुझे मालूम है। उन्होंने जो कभी मांग की थी और मैं समझता हूं कि जिस ढंग से उन्होंने की वह गलत मांग थी, वह यह कि कश्मीर को अलग कर दिया जाये। उसे हिन्दुस्तान-पाकिस्तान से अलग स्वतंत्र देश बना दिया जाये। ऐसी मांग उन्होंने की थी। लेकिन मैं आपको एक इत्तला देना चाहता हूं। सुबूत तो शायद इसके रह नहीं गये होंगे, लेकिन यह बात है बिल्कुल सही। कई आदमियों से मैंने सुनी है। हो सकता है कि शेख अब्दुल्ला खुद इसको कहते हुए डरे, लेकिन मुझे काहे का डर है। जब शेख अब्दुल्ला ने स्वाधीन कश्मीर की बात की थी। तब थोड़ा-बहुत उकसावा उनको हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री से मिला था। खैर! अब शेख जैसे आदमी कहते हैं, तो सजा भुगतते हैं। हमारे जैसे आदमी बेवकूफी नहीं भी करते हैं तब भी भुगतनी पड़ती है क्योंकि कायदा बिगड़ चुका है। एक आदमी ने शेख के बारे में मुझसे कुछ बात की। समझाना चाहा तो मैंने उसे साफ-साफ कह दिया। एक चीज अलबत्ता कुछ अच्छी लगी मुझे उसमें कि शेख ने किसी आदमी को अपनी मौजूदा राय बतायी। वह बहुत अच्छी तो नहीं थी, बुरी भी नहीं थी, लेकिन उसमें कुछ शब्द ऐसे थे जिन्हें मैं दुहरा देना चाहता हूं। उन्होंने कहा, अलबत्ता मैं ऐसा कोई काम नहीं करूंगा कि जिससे हिन्दुस्तान के लोगों को, जिसमें कश्मीर के लोग शामिल हैं, नुकसान हो। एक मानी में बहुत बड़ी बात है। यह भी मैं आपसे कह दूं कि जब लोग हस्ताक्षर कराने आये शेख अब्दुल्ला की रिहाई के लिए तो मैंने हंसते हुए कहा कि क्या प्रधानमंत्री ने अब रिहाई के लिए भी आंदोलन शुरू कर दिया है? मैंने कहा, मैं तो सही चीज पर दस्तखत करूंगा। यह मैं जानता था कि यह सही चीज है। इस पर दस्तखत करना है, चाहे उसके लिए कहीं से भी इशारा आया हो, लेकिन फिर मैंने कहा कि शेख से जाकर कह देना कि पहचान तो हमारी बहुत पुरानी है। बड़ा वक्त बीत गया, तुम्हारा भी वक्त बीता है और हमारा भी वक्त बीता है, तुमने कोशिश की कि अपने दोस्त के भक्त बन करके, सरकार के ओहदों पर रह करके जनता का भला करो। जब मैंने लोकसभा में कहा कि हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के महासंघ की बात सोचनी चाहिए, तब कुछ लोगों ने बड़बड़ाना शुरू किया। एकाध ने बीच में टोका- टाकी की और एक आदमी तो दृढ़ता के साथ खड़ा हो गया और बोला, ‘अब मैं आगे नहीं बोलने दूंगा और फिर कहा, ये बड़े लीडर हैं। जब अपने मुंह से बात निकालते हैं तो हमारा हक हो जाता है पूछने का कि वे बताएं कि किस ढंग से हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का एका करेंगे?’ हम जवाब देना चाहते थे लेकिन अध्यक्ष बीच में बोले कि वह बहुत देर बोल चुके हैं और अगर मैंने यह भी मौका दिया तो लम्बी तकरीर हो जायेगी। तो हमने कहा कि और बातें चाहे समझ में न आयें लेकिन एक बात समझ लेना, सपना देखो,हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के महासंघ का सपना देखो।
बंटवारे पर कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक
मैं कांग्रेस कार्यसमिति की उस बैठक का जिक्र करना चाहूंगा, जिसमें बंटवारे की योजना स्वीकृत की गयी। हम दो सोशलिस्टों श्री जयप्रकाश नारायण और मुझे इस बैठक में विशेष निमंतण्रपर बुलाया गया था, हम दोनों महात्मा गांधी और खान अब्दुल गफ्फार खां को छोड़कर और कोई बंटवारे की योजना के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला। यह बैठक दो दिनों तक चली। मौलाना आजाद उसी छोटी-सी कोठरी के कोने में बैठकर अबाध गति से सिगरेट पीते रहते थे। वे एक शब्द नहीं बोले। सम्भव है कि उन्हें सदमा पहुंचा हो, लेकिन उनका यह बतलाने की कोशिश करना कि वे अकेले विरोध करने वाले थे, बेवकूफी के सिवा और कुछ नहीं है। मैं मान सकता हूं और यह समझ भी सकता हूं कि वे बंटवारे से दुखी थे। इस बैठक में आचार्य कृपलानी की स्थिति बड़ी दयनीय थी। इस समय वे कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे। वे झुककर बैठे थे और बीच बीच में ऊंघ रहे थे। बहस के दरम्यान महात्मा गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष की ओर संकेत किया। झुंझलाकर मैंने उनका हाथ पकड़कर झिंझोरा। उन्होंने बताया कि वे सिरदर्द से बुरी तरह पीड़ित हैं। बंटवारे से उनका विरोध निश्चित ही साफ रहा होगा क्योंकि उनके लिए यह वैयक्तिक भी था। लेकिन इस आजादी के लड़ाकू संगठन को बुढ़ापे की, बीमारी और थकान ने आफत के समय बुरी तरह धर दबाया था। खान अब्दुल गफ्फार खां महज दो वाक्य बोले। उनके सहयोगियों ने विभाजन योजना स्वीकृत कर ली, इस पर उन्होंने अफसोस जाहिर किया। उन्होंने विनती की कि प्रस्तावित जनमत गणना में पाकिस्तान या हिन्दुस्तान में सम्मिलित होने के इन दो विकल्पों के अलावा, क्या यह भी जोड़ा जा सकता है कि उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत चाहे तो स्वतंत्र भी रहे। इससे अधिक किसी भी अवसर पर वे एक शब्द भी नहीं बोले, निश्चय ही उन्हें काफी सदमा लगा था। श्री जयप्रकाश नारायण विभाजन के किलाफ संक्षेप में एक निश्चयात्मक ढंग से एक बार ही बोले और फिर अंत तक वे चुप रहे। उन्होंने ऐसा क्यों किया? जिस ढंग से कार्यसमिति देश का विभाजन करना चाह रही थी, क्या वे उससे क्षुब्ध थे? या उन्होंने चुप रहने में ही बुद्धिमानी समझी क्योंकि नेतृत्व विभाजन की स्वीकृति के लिए दृढ़ रूप से एकमत था? बंटवारे से मेरा विरोध निरंतर और मुखर था, शायद वह बहुत गम्भीर न था और अब याद पड़ता है कि उसमें कुछ खामियां भी थीं। हर हालत में, मेरे विरोध से मुसीबत नहीं टाली जा सकती थी। जो महत्त्वपूर्ण है, वह है इस मीटिंग में गांधीजी का हस्तक्षेप। यहां मैं विशेष रूप से उन दो बातों की र्चचा करूंगा, जिन्हें इस बैठक में गांधी जी ने उठाया था। शिकायत सी करते हुए उन्होंने नेहरू और पटेल से कहा कि विभाजन को मान लेने के पहले उन लोगों ने उसकी खबर उन्हें नहीं दी। नेहरू ने कुछ आवेश में आकर उन्हें टोका और कहा कि उनको वे पूरी तौर पर जानकारी देते रहे हैं। गांधी के दोहराने पर नेहरू ने अपनी पहली बात को थोड़ा बदल दिया। इस घटना के बारे में मैं गांधी की बात मानूंगा। नेहरू की नहीं। और भला कौन नहीं मानेगा? नेहरू को झूठा कहकर ठुकरा देना जरूरी नहीं है। यहां पर असल सवाल यह कि नेहरू और सरदार पटेल के विभाजन की योजना मान लेने के पहले, क्या उसकी जानकारी गांधी जी को थी? गांधी को लिखे गये संदिग्ध पत्रों को छुपा देने से नेहरू का काम नहीं चलेगा, जिनमें उन्होंने काल्पनिक और सतही जानकारी दी थी। ये लोग बुढ़ा गए थे और थक गए थे। वे अपने आखिरी दिनों के करीब पहुंच गये थे, कम से कम उन्होंने ऐसा जरूर सोचा होगा। यह भी सही है कि पद के आराम के बिना ये ज्यादा जिंदा भी नहीं रहते। अपने संघर्ष के जीवन को देखने पर उन्हें बड़ी निराशा होने लगी थी। बहुत ज्यादा मौकापरस्त बनने का मौका उनका नेता दे नहीं रहा था। अपने जीवन काल में प्रशासन की मदद से देश का भला करना, ताकत का मजा लेना, सरकार द्वारा देश की उन्नति करना और असफल समझे जाने से डरना, ये सब इसी के पहलू हैं। (लोहिया की किताब साम्प्रदायिकता की जहर के सम्पादित अंश)

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