एक सदी पूर्व भारत भूमि पर जन्मे एक बालक का नाम पिता ने सच्चिदानंद रखा। पिता श्री हीरानंद वात्सायन, सरकारी अधिकारी और पंडित थे। आगे चलकर वह बच्चा सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस तीन शब्दों के नाम के आगे अज्ञेय भी जुड़ गया। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के कुशीनगर नामक ऐतिहासिक स्थान पर हुआ। पिता के स्थानांतरण के साथ लखनऊ, कश्मीर, बिहार और मद्रास घूमते हुए बचपन बीता और उन स्थानों की मिट्टी की सुगंध भी मन पर परत-दर-परत पड़ती गई। बाद में वह कवि, कहानीकार, उपन्यासकार और निबंध लेखक बने। साहित्य के विभिन्न विधाओं में कलम चलाते रहे। नई कविता के रचनाकार रहे। साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने प्रयोगवाद को बढ़ावा दिया। सफल संपादक और अध्यापक के रूप में भी अज्ञेय की पहचान बनी। 7 अप्रैल, 1911 को जन्मे सचिच्दानंद वात्सायन 4 अप्रैल, 1986 को दुनिया छोड़ चले। 76 वर्षीय जीवन का 36 वर्ष पराधीन भारत में तो 40 वर्ष स्वाधीन भारत में बीता। लगभग बराबर-बराबर। अज्ञेय ने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में दो सांस्कृतिक साहित्यिक यात्राएं निकाली। एक यात्रा राम और सीता की जीवन यात्रा थी। जन जनक-जानकी यात्रा। आज के समाज में जीवंत राम सीता के भावों को खोजना था। इसलिए यात्रा मिथिलांचल और अवध की थी। दूसरी यात्रा भागवत भूमि यात्रा हुई। जिस यात्रा के क्रम में कृष्ण के भाव और प्रभाव को जन-जन में ढूंढ़ना था। दोनों यात्राओं में उनके समकालीन बड़े-बड़े साहित्यकार सम्मिलित हुए। यात्रा समाप्ति पर उन साहित्यकारों ने अपने-अपने नजरिए से देखे क्षेत्र और भावों को अपने द्वारा लिखित लेखों में बांधा। सीता-राम और राधा-कृष्ण के भाव और प्रभाव को समझने के लिए ये यात्राएं तात्कालीन साहित्य के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। भागवत भूमि यात्रा के साहित्यिक अनुभवों को संजोकर पुस्तक का रूप देने के क्रम में भागवत भूमि यात्रा पुस्तक के संपादक कृष्णदत्त पालीवाल ने बड़े ही सूक्ष्म भाव और स्थूल अनुभवों का वर्णन करते हुए लिखा है-भागवत भूमि यात्रा, एक अनुभव का साकार रूप है। इस रूप की कल्पना सच्चिदानंद हीरानन्द वात्सायन अज्ञेय ने की थी। अज्ञेयजी यायावरी के लिए प्रसिद्ध थे और उनका अन्वेषी भाव इन यात्राओं में सक्रिय रहता था। इन यात्राओं में घटिया विकलांग भाव न रहकर भारतीय संस्कृति के मूल को खोजने और समझने का गंभीर भाव प्रयास था। साहित्य रचना में उन्होंने मधुमक्खी की भूमिका अपनाई थी। उन्होंने समाज के विभिन्न क्यारियों से भिन्न-भिन्न स्वाद के पराग एकत्रित कर साहित्य की रचना की थी। इसलिए उनका साहित्य अपने रचना के समय में ही समाज स्वीकृत और जनग्राह्य रहा था। वह भारतीय संस्कृति में गहरे धंसे थे। उनके पैर अपनी मूल सांस्कृतिक भूमि पर इतनी दृढ़ता से जमे रहे कि पश्चिमी आधुनिकता और आधुनिकतावाद उन्हें उखाड़ नहीं सका। मैथिली शरण गुप्त के मानसशिष्य अज्ञेय भारतीय-परंपरा-साहित्य के नए भाष्यकार बनकर सामने आए। उन्होंने भीतर से अनुभव किया कि भारत की आत्मा सनातन है और भारतीयता कोरी भौगोलिक परिवृत्ति की छाप नहीं है। जो बात एक भारतीय को सारे संसार से पृथक करती है वह यह है कि भारतीयता मानवीयता का निचोड़ है, उसकी हृदय-मणि है। यात्रा के नाम भागवत भूमि यात्रा से ही प्रकाशित इस पुस्तक में अज्ञेय के विद्वान सहयात्रियों मानिक लाल चतुर्वेदी, विद्या निवास मिश्र, भगवती शरण सिंह, मुकुंदलाल, रमेश चंद्र शाह, इला डालमिया, नरेश मेहता, विष्णुकांत शास्त्री, रघुवीर चौधरी, अज्ञेय, जुड़ावलाल मेहता और सच्चिदानंद वात्सायन के लेख हैं। सबों ने अपनी-अपनी दृष्टि से यात्रा की उपलब्धियों का बखान किया है। स्वयं अज्ञेयजी अपने आलेख में यात्रा के अंत के बाद के अपने मनोभाव व्यक्त करते हुए- कौन गली गए श्याम में कहते हैं-हमारी यात्रा में कहीं कुछ कमी रह गई है। यों तो सबै भूमि गोपाल की से आरंभ करें तो कोई भी यात्रा भागवत भूमि यात्रा है और कोई भी यात्रा अधूरी ही रहेगी, क्योंकि वह पूरी भागवत भूमि को तो नाप नहीं सकती, लेकिन मैं एक दूसरे अधूरेपन की बात कह रहा हूं। सोच रहा हूं कि इस कमी का सही निरूपण कैसे हो सकता है? क्या यात्रा में कुछ टूट गया कहना अधक उचित होगा या कि यात्रा में कहीं कुछ टूटन है कहना ही उसे सही निरूपित कर सकेगा? उनके जीवन काल में यात्रा वृतांत प्रकाशित नहीं हो पाया था। 1984 में इस पुस्तक के द्वारा भागवत भूमि यात्रा के भाव को समझा जा सकता है। यात्रा का आयोजन निश्चय ही अज्ञेय जी की कल्पना के अनुरूप हुई थी। पर उस यात्रा के साहित्यिक यात्रियों के बिना यात्रा सफल भी नहीं होती न उसका आशय अर्थवान होता। सहयात्री तो सब अपने-अपने ठिकाने लौट गए हैं। कुछ ने ब्रजमंडल की यात्रा की और घर लौटे, कुछ ने केवल द्वारका-ऊखा मंडल की यात्रा की और वे भी प्रसन्न-मन अपने-अपने घर गए। थोड़े से यात्री जिनका कह लीजिए भाग्य प्रबल था या जो अधिक फुरसतवाले या निठल्ले थे वे दोनों मंडलों की यात्रा पूरी कर आए। कृष्ण की जीवंतता के साथ अज्ञेयजी को भी समझा जा सकता है।
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