Sunday, March 27, 2011

प्रगतिशील आंदोलन के आखिरी कमांडर


आलोचक के तौर पर कमला प्रसाद जिन बातों को रचते थे, उसे जमीन पर उतारने के लिए संगठन के कायरें में सक्रिय हुए थे। प्रगतिशील वसुधा का संपादन भी इसी श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। प्रगतिशील मूल्यों की रचनाओं को अपनी पत्रिका में प्रकाशित कर एक तरफ वे ऐसे रचनाकारों को सामने ला रहे थे तो दूसरी तरफ समाज में व्याप्त कमजोरियों और चुप्पी को दरकाने की कोशिश भी कर रहे थे
हाल ही में जब प्रो. कमला प्रसाद के साहित्यिक अवदान के लिए 'प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान रायपुर' द्वारा सर्वसम्मति से वरिष्ठ आलोचना सम्मान की घोषणा हुई और फेसबुक पर इस खबर को प्रस्तुत किया गया तो एक युवा रचनाकार ने टिप्पणी की कि 'कमला प्रसाद जी को संपादक के रूप में कोई सम्मान मिलना चाहिए। उनका आलोचना से अधिक संपादन-क्षेत्र में योगदान है।' इस टिप्पणी के बाद कुछ लोगों ने आलोचना के क्षेत्र में कमला जी के योगदान की याद दिलाई। इस पुरस्कार के लिए निर्णायक समिति ने अनुशंसा के तौर पर कहा कि डॉ. कमला प्रसाद आधुनिक हिन्दी की प्रगतिशील परंपरा के महत्वपूर्ण और सुप्रसिद्ध आलोचक हैं, जिनकी साहित्यिक उपस्थिति पूरे हिन्दी क्षेत्र में जानी-पहचानी जाती है। अप्रतिम मेधा के धनी ऐसे साहित्यकार का निधन हिंदी साहित्य-समाज के लिए अपूरणीय क्षति है। प्रो. कमला प्रसाद ने आलोचना के अलावा साहित्य के तीन प्रमुख क्षेत्रों- अकादमिक दक्षता, संपादन और संगठनात्मक कौशल में जिस तरह अपना योगदान दिया, वह विशेष रूप से उल्लेखनीय और उनके व्यक्तित्व का असाधरण पहलू है। साहित्यशास्त्र, छायावाद प्रकृति और प्रयोग, छायावादोत्तर काव्य की सामाजिक- सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, दरअसल साहित्य और विचारधारा, रचना और आलोचना की द्वंद्वात्मकता, आधुनिक हिन्दी कविता और आलोचना की द्वंद्वात्मकता, समकालीन हिन्दी निबंध, मध्ययुगीन रचना और मूल्य, कविता तीरे, आलोचक और आलोचना जैसी कृतियों से उनकी प्रतिबद्ध दृष्टि, मानवीय मूल्यों के प्रति निष्ठा, गहरी निर्णय क्षमता व व्यापकता प्रदर्शित होती है। प्रो. प्रसाद ने अवधेश प्रताप विश्वविद्यालय रीवा में पहले प्राध्यापक और तत्पश्चात अध्यक्ष के रूप में बहुमूल्य अकादमिक भूमिका का निर्वाह कर नई पीढ़ी का सशक्त मार्गदर्शन किया। उनके कुशल संयोजन एवं संपादन में निकलने वाली पत्रिका 'प्रगतिशील वसुधा' भारतीय मनीषा के लिए एक जरूरी पत्रिका सिद्ध हुई है। इन सारे और बहुकोणीय क्षेत्रों में सतत संलग्न रहने के अलावा रचनात्मक लेखन कायरे में भी वे निरंतर सक्रिय रहे। चयन समिति की इस अनुशंसा के बावजूद सोचने वाली बात यह है कि आखिरकार एक संजीदा युवा रचनाकार कमला जी के संपादक रूप को ही अधिक महत्वपूर्ण क्यों मानता है? क्या यह उस युवा रचनाकार के सीमित ज्ञान को को दर्शाता है या कुछ और भी है? पिछले दो दशकों से प्रो. कमला प्रसाद विभिन्न स्थलों पर प्रगतिशील लेखक संघ के संगठनों को बनाने, बढ़ाने और मजबूती प्रदान करने में सक्रिय थे। 'पहल' के संपादन से अलग होने के बाद उन्होंने हरिशंकर परसाई द्वारा शुरू की गई पत्रिका वसुधा को निकालना शुरू किया। यही पत्रिका बाद के दिनों में प्रगतिशील वसुधा के तौर पर छपने लगी। यह प्रगतिशील लेखक संघ से ही प्रकाशित होती है। पर्लेस की गतिविधियों में अत्यधिक सक्रियता के कारण कमला प्रसाद को लोगों ने कमांडर साब कहना शुरू कर दिया था। उनकी यह सक्रियता निश्चित ही उनके लेखन का विस्तार और विकास था। आलोचक के तौर पर कमला प्रसाद जिन बातों को रचते थे, उसे जमीन पर उतारने के लिए संगठन के कायरें में सक्रिय हुए थे। प्रगतिशील वसुधा का संपादन भी इसी श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। प्रगतिशील मूल्यों की रचनाओं को अपनी पत्रिका में प्रकाशित कर एक तरफ वे ऐसे रचनाकारों को सामने ला रहे थे तो दूसरी तरफ समाज में व्याप्त कमजोरियों और चुप्पी को दरकाने की कोशिश भी कर रहे थे। अचरज की बात नहीं कि इस दौरान वे अपने संपादकीय और भाषणों के जरिए व्यापक समुदाय से संवाद स्थापित कर रहे थे और अपना पक्ष सामने रख रहे थे। इसमें उनकी आलोचना प्रतिभा का पता चलता था। 14 फरवरी, 1938 को मध्य प्रदेश के सतना में जन्में कमला प्रसाद ने एमए, पीएचडी करने के बाद सागर विश्वविद्यालय से डी लिट् की उपाधि प्राप्त की। वार्तालाप नाम से उनके द्वारा लिए गए साक्षात्कार की किताब, यशपाल और अवधेश प्रताप सिंह पर विनिबंध प्रकाशित है। उन्होंने जंगल बाबा नाम से बच्चों के लिए भी एक किताब लिखी थी। इसके जरिए उनके सरोकार को समझा जा सकता है। कमला प्रसाद भारतीय समाज में मौजूद कट्टरता, अंधविश्वास और शोषणमूलक संरचना के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे। वह तरक्की पसंद और खूबसूरत समाज के निर्माण में सक्रिय लोगों के साझीदार थे। धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत के विरोध में जाने वाली ताकतों की वह खुली मुखालफत करते थे। भारतीय राष्ट्र-राज्य के लिए चुनौती बनी नक्सल समस्या पर लिखे गये एक संपादकीय के जरिए उनकी चिंताओं को जाना-समझा जा सकता है। उन्होंने लिखा- 'नक्सलबाड़ी से शुरू हुई नक्सलपंथियों की क्रांतिधर्मिता आज अपने उद्देश्यों से भटक गयी है। कितने तो टुकड़े हो गए हैं। एक टुकड़ा माओवादी कहलाता है। माओवादी-नक्सलवादी दो अलग- अलग पद हैं। आए दिन इन समूहों के नाम से ऐसी घटनाएं जुड़ रही हैं जो दिल दहला देती हैं। दंतेवाड़ा में 72 सुरक्षाकर्मियों की हत्या और ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को पलट देने से हुई सैकड़ों निदरेषों की हत्या को कौन जायज ठहराएगा। मनुष्य की हत्याओं को कोई जनोन्मुख सिद्धांत अंगीकार नहीं कर सकता। जब यह आंदोलन शुरू हुआ था, तब धारणा थी कि नक्सल क्रांतिकारी मूलत: आदिवासियों के साथ होते शोषण और अन्याय के विरोध में उनके अधिकारों के रक्षक हैं। उनकी अस्मिता के हिमायती हैं। इसी अभिप्राय से वे आदिवासियों के शोषकों को सबक सिखाते हैं। बड़े-बड़े अधिकारियों, मंत्रियों और अमीरों पर निशाना साधते हैं। उनका संघर्ष वर्गयुद्ध है। वे सशस्त्र क्रांति लाना चाहते हैं। इतने वर्षों में उनके कृत्य उस तरह नहीं रहे। वे अपने ही वर्ग के हत्यारे बन गए हैं। आदिवासी समूहों में भी उनकी गतिविधि के प्रति पहले जैसा सद्भाव नहीं बचा। उनके साथ अभी तक जो सहानुभूति रखते थे, वे भी असहज महसूस करते हैं। साथ खड़े होने का नैतिक आधार खोते जा रहे हैं, राज्य सरकारें भी नक्सलपंथियों के बहाने चाहे जिन निरपराधियों को सजा देती है। राजकीय हिंसा को जायज ठहराने वाले लोगों को बढ़ावा मिला है। नक्सल पंथी आंदोलन के औचित्य-अनौचित्य पर लंबी बहस से अब ज्यादा उचित यह लगता है कि आदिवासी समाज के अगल-बगल झांक कर देखें। ..अत: आज जरूरत है कि आदिवासी समाज की बुनियाद को समझा जाए और उसी में से नक्सलपंथियों को निष्प्रभावी बनाने के रास्ते खोजे जाएं। इसे बहुत दूर तक केवल कानून की समस्या न जाना जाए।'

Tuesday, March 22, 2011

राजनीति में फुर्सत के क्षण


डॉ.राम मनोहर लोहिया की पुस्तक ‘इंटरवल ड्यूरिंग पॉलिटिक्स’ (राजनीति में फुर्सत के क्षण) में सोलह निबंध हैं जिनके विषय भिन्न-भिन्न हैं जैसे विश्व परिक्रमा, राम, कृष्ण और शिव, एक योगानुभूति, भारतीय वर्णमाला, सुंदरता और त्वचा का रंग, भारत की नदियां आदि। ‘विश्व परिक्रमा’ शीर्षक निबंध कई दृष्टियों से बहुत रोचक है और इसमें व्यक्तियों, स्थानों और वस्तुओं के, जिन्हें लोहिया ने दुनिया में देखा, शब्द चित्र दिए गए हैं। विनोद-व्यंग्य उनकी रचनाओं में जरा-सा मौका मिलने पर भी मौजूद रहता है। बाहरी पहलुओं का वर्णन और भीतरी पहलुओं का अंत: निरीक्षण उनकी रचनाओं को भौतिक जानकारी तथा आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रेत बनाता है। यथार्थ और कल्पना का प्रवाह समानांतर रेखाओं में बहता है।

कटाक्ष के उस्ताद
एक स्थान पर डॉ. लोहिया लिखते हैं : ‘मुझे अमेरिका के लोग बहुत अच्छे लगते हैं किंतु उनकी सभ्यता के बारे में मेरे मन में संदेह है।’ मनुष्यों और वस्तुओं के बीच इस प्रकार का सूक्ष्म विभेद उनके लेखन की मुख्य विशेषताएं हैं। कटाक्ष के तो वे उस्ताद हैं। वी.के. कृष्णा मेनन के बारे में लिखते हैं कि ‘मेनन कुशल राजनयज्ञ हैं। यह कौशल, कम से कम उसका बड़ा भाग, केरल के मातृप्रधान समाज की विशेष देन है। मां के शासन में बच्चे को एक साथ तीन मालिकों को खुश रखना पड़ता है, माता, पिता और मामा। इसमें कोई आश्र्चय नहीं कि श्री मेनन कभी-कभी छोटे पैमाने पर ही सही, रूस, फ्रांस और अमेरिका को खुश रखने में सफल रहे। अत: इसमें आश्र्चय नहीं होना चाहिए कि मेनन में तीन प्रतिद्वंद्वी शक्तियों के साथ खेलने का कौशल आया।’
डॉ. लोहिया की साहित्यिक और वर्णनात्मक प्रतिभा का एक पहलू है। साहित्यिक शैली का जादुई स्पर्श जिससे वे मामूली तथ्य को भी महत्त्वपूर्ण बना देते हैं। वे लिखते हैं :‘फ्रैंकफुर्त्त से बेलग्रेड तक मेरी विमान परिचारिका का नाम मीरा था, स्लाव भाषा में जिसका अर्थ होता है शांति और जो भारत में भक्ति के आवेग की प्रतीक मानी जाती है। यह मानव जाति के भौतिक और आध्यात्मिक सामीप्य का एक उदाहरण है।
राजनीति असंतोषजनक पेशा
संस्कृति की गहराई से अपरिचित व्यक्तियों के हाथ में राजनीति का आना उनके लिए न भी सही, देश के लिए घातक होता है। चूंकि लोहिया राजनीति और संस्कृति दोनों का संश्लिष्ट स्वरूप थे, राजनीति की वर्तमान स्थिति पर दुख प्रकट करते हुए उन्होंने लिखा ‘वर्तमान समय में राजनीति असंतोषजनक पेशा है। वह अपने भीतर अपर्याप्तता का दंश लिए रहती है। यह धन की समस्याओं से तथा जीत और हार के सवालों से बहुत ज्यादा आच्छादित रहती है। इसकी भाषा झगड़े और क्रोध की भाषा होती है। राजनीति में अंत: निरीक्षण का अनुशासन लाया जाना चाहिए। अनुशासन निष्ठा, अंतर्दृष्टि, मानवीय दृष्टिकोण और करुणा के गुण जिन राजनेताओं में नहीं हैं उनके हाथ में राजनीति की बागडोर होगी तो यह बहुत बुरी राजनीति करेंगे। राजनीति का दिशा-निर्देश प्यार की शक्ति से होना चाहिए, न कि शक्ति के प्यार से। स्वतंत्र देश की अनगढ़ राजनीति गुलाम देश की परिष्कृत राजनीति से ज्यादा हानिकारक होती है। इसीलिए प्रत्येक देश में राजनीति के गिर्द संस्कृति का वातावरण होना चाहिए तभी मानव जीवन के हर क्षेत्र में सच्चा लोकतंत्र आ सकता है।
असह्य नहीं हो सकती कोई पीड़ा
विद्रोही राजनीतिक कैदी के रूप में उन्होंने असह्य यातनाएं झेलीं तथापि वे कहते हैं कि जो यातनाएं उन्होंने झेलीं, वे असह्य नहीं थीं। उन्होंने कहा ‘अनेक असह्य यातनाओं को झेलने के बाद मैंने इनकी पीड़ा और सह्यता-असह्यता के बारे में अध्ययन किया। मुझे लगा कि असह्यता के विचार में निश्चय ही कोई गलती होगी। मैंने कितनी ही बार इसे झेला है। फिर भी मैंने हर बार इस पर विजय पाई है। यातनाओं को मैंने अधिक धैर्य के साथ सहा। इसका मुझे लाभ मिला और इस अकाट्य निष्कर्ष पर पहुंचा कि कोई भी पीड़ा असह्य नहीं हो सकती।’आदमी दुख को आने से रोक नहीं सकता किंतु वह उस पर लगातार अभ्यास से पीड़ा और मन के तनाव को सहन कर सकता है, अन्यथा जीवन अनवरत पीड़ा और अनंत दुखों का स्रेत बन जाएगा।
सौंदर्यानुभूति के गजब के उपासक
तर्कपूर्ण विचार के साथ-साथ लोहिया का झुकाव सौंदर्यानुभूति की ओर भी था। उन्होंने दिवस, संध्या, भोर और चांदनी का सौंदर्य देखा था। उन्होंने लिखा : ‘मैंने वस्तुओं को तेज धूप में, संध्या की फीकी रोशनी में तथा चांदनी में देखा तथा उसका अध्ययन किया। दिन की चमक सौंदर्य में वृद्धि नहीं करती। यह बहुत ज्यादा दिखाती है। विवरण सूक्ष्म रेखाओं पर छा जाते हैं। संध्या की फीकी पड़ती रोशनी सौंदर्य को निखारती है किंतु यह कुछ-कुछ अवास्तविक और ओझल हो रहा सौंदर्य होता है। चांदनी सौंदर्य को निखारने वाला सबसे बड़ा कारक है, चांद पूरा हो तो और भी अच्छा। यह अकारण नहीं है कि प्राचीन भारत की और सम्भवत: अन्य स्थानों की भी, सम्भावी बधुएं अपने को सर्वप्रथम पूर्णचंद्र के प्रकरण में ही दिखाती थीं। चंद्रमा सब चीजों को सौंदर्य से नहला देता है किंतु वह इसे भोर की स्वच्छता नहीं दे पाता।
मानवबोध के विशिष्ट पारखी
‘मीनिंग इन स्टोन’ शीर्षक का लेख बहुत रोचक है। इसमें कला की समीक्षा और इतिहास को विशेषकर स्थापत्य कला के इतिहास को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया है। अजंता, एलोरा, एलिफेंटा, खजुराहो, सांची, गंधार, मथुरा, अमरावती, महाबलिपुरम, हेलीबिड श्रवण बेलगोला आदि सभी की मूर्तिकला के कलात्मक सौंदर्य का वर्णन किया गया है। मूर्ति कला के सभी घरानों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है और उनके तकनीकी तथा विचारात्मक पहलुओं का विश्लेषण किया गया है। भारतीय स्थापत्य कला की अपनी मूर्ति निर्माण परम्परा रही है। अत: प्रस्तर अथवा कांस्य रूप न तो मूर्त है और न अमूर्त; वे आदर्शात्मक हैं। भारतीय मूर्तिकला प्रस्तर पर लिखी गई कविता, दर्शन तथा रूपांकन है। डॉ. लोहिया कहते हैं ‘भारतीय जनता ने अपने धर्म तथा इतिहास को पत्थर पर उकेरा है। उन्होंने इतिहास की विशेष चिंता नहीं की, यह देखकर कि यह अत्यंत अस्थायी एवं नश्वर है अत: उसने किंवदंतियों के रूप में उसे शाश्वतता प्रदान की है। किसी अन्य जाति ने इस प्रकार इतिहास की आत्मा या आत्मा के इतिहास को सुंदर प्रस्तर में रूपांतरित नहीं किया है।’




सपना भारत-पाक महासंघ का


हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की जनता को चाहिए अब इस मसले पर सोचना शुरू करें। इसके बने बिना हम दुनिया में हमेशा किसी न किसी के मोहताज या शिकार बनते रह जाएंगे। अब रहा कश्मीर का सवाल तो मेरा बस चले तो मैं कश्मीर का मामला बिना इस महासंघ के हल नहीं करूंगा। मैं साफ बोलना चाहता हूं कि अगर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का महासंघ बनता है, तब मैं कश्मीर के बारे में कोई भी बात सोचने को तैयार हो जाता हूं। चाहे कश्मीर हिन्दुस्तान के साथ रहे, चाहे कश्मीर पाकिस्तान के साथ रहे या चाहे कश्मीर एक अलग इकाई बनकर इस हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के महासंघ में आए पर महासंघ बने कि जिससे हम सब लोग फिर से एक ही खानदान के अन्दर बने रहें
हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का मसला, अगर सरकारों की तरफ देखें, तो सचमुच बहुत बिगड़ा हुआ है। इसमें शक नहीं है। जरा-जरा-सी बातों को बढ़ावा दिया गया है और लड़ रहे हैं। अखबारों में दिन-रात एक दूसरे को गरमा रहे हैं। ऐसी सूरत में मैं आपसे पाकिस्तानिहन्दुस्तान के महासंघ की बात करना चाहता हूं। एक देश तो नहीं, एक राज नहीं लेकिन दोनों कम से कम कुछ मामलों में शुरुआत करें एका की। वह निभ जाए तो अच्छा और न निभे तो और कोई रास्ता देखा जाएगा। बस और बातों में न सही लेकिन नागरिकता के मामले में और अगर हो सके तो थोड़ा-बहुत विदेश नीति के मामले में, थोड़ा-बहुत पलटन के मामले में एक महासंघ की बातचीत शुरू हो। मैं साफ कह देना चाहता हूं जो विचार मैं आपके सामने रख रहा हूं, वही मैंने लोकसभा में भी रखा था। यह कहते हुए कि यह विचार सरकारों के पैमाने पर आज शायद अहमियत नहीं रखता। इसलिए हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की जनता को चाहिए अब इस ढंग से वह सोचना शुरू करें। नई तरह की चीजें सोचना भी जरूरी होता है। मैं इस बात के लिए तैयार हूं। मैं नहीं कहता कि हर एक आदमी इस चीज को मान ले लेकिन वह कम से कम सोचे तो इस बात पर। इसके दूसरे तरीके भी निकल सकते हैं। अगर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का महासंघ बनता है तो जब तक मुसलमानों को या पाकिस्तानियों को तसल्ली नहीं हो जाती, तब तक के लिए संविधान में कलम रख दी जाये कि इस महासंघ का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, दो में से एक पाकिस्तानी रहेगा। इस पर लोग कह सकते हैं कि तुम अन्दर-अन्दर रगड़ क्यों पैदा करना चाहते हो? जिस चीज को पुराने जमाने में कांग्रेस और मुस्लिम लीग वाले नहीं कर पाए। अब तुम फिर से रगड़ पैदा करना चाहते हो? इसका मैं एक सीधा-सा जवाब दूंगा कि 16 बरस हमने यह बाहर वाली रगड़ करके देख लिया, अब फिर अन्दर की रगड़ कैसी भी हो, इससे तो कम से कम ज्यादा अच्छी ही होगी। यह बाहर वाली पाकिस्तान-हिन्दुस्तान की रगड़ है। उसको हम निभा नहीं सकते। इसके चलते तो हम दुनिया में हमेशा मोहताज रहेंगे। हमेशा किसी न किसी के मोहताज या शिकार बनते रह जाएंगे। हो सकता है, लोग कश्मीर वाला सवाल उठाएं। कश्मीर का सवाल अलग से हल करने की जब बात चलती है, तो मैं कुछ भर लेने-देने को तैयार नहीं हूं। मेरा बस चले तो मैं कश्मीर का मामला बिना इस महासंघ के हल नहीं करूंगा। आजकल जो बातें चलती हैं, उनमें सिलसिला नहीं है। मैं इतना कहना चाहूंगा कि अगर नहरी पानी का हल अलग से करो तो फिर दूसरा कोई सवाल खड़ा हो जायेगा। मान लो कश्मीर का किसी तरह से हल कर लो, फिर तीसरा कोई सवाल खड़ा हो जायेगा। पूर्वी पाकिस्तान के हिन्दुओं का, या पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान आने-जाने के रास्ते का। इसलिए मैं साफ बोलना चाहता हूं कि अगर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का महासंघ बनता है, तब मैं कश्मीर के बारे में कोई भी बात सोचने को तैयार हो जाता हूं, चाहे कश्मीर हिन्दुस्तान के साथ रहे, चाहे कश्मीर पाकिस्तान के साथ रहे, चाहे कश्मीर एक अलग इकाई बनकर इस हिन्दुस्तान- पाकिस्तान के महासंघ में आये पर महासंघ बने कि जिससे हम सब लोग फिर से एक ही खानदान के अन्दर बने रहें। इस महासंघ के तरीके पर बुनियादी तौर पर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की जनता सोचना शुरू करे।
कश्मीर का समाधान
शेख अब्दुल्ला ने कभी भी कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की बात नहीं की, जहां तक मुझे मालूम है। उन्होंने जो कभी मांग की थी और मैं समझता हूं कि जिस ढंग से उन्होंने की वह गलत मांग थी, वह यह कि कश्मीर को अलग कर दिया जाये। उसे हिन्दुस्तान-पाकिस्तान से अलग स्वतंत्र देश बना दिया जाये। ऐसी मांग उन्होंने की थी। लेकिन मैं आपको एक इत्तला देना चाहता हूं। सुबूत तो शायद इसके रह नहीं गये होंगे, लेकिन यह बात है बिल्कुल सही। कई आदमियों से मैंने सुनी है। हो सकता है कि शेख अब्दुल्ला खुद इसको कहते हुए डरे, लेकिन मुझे काहे का डर है। जब शेख अब्दुल्ला ने स्वाधीन कश्मीर की बात की थी। तब थोड़ा-बहुत उकसावा उनको हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री से मिला था। खैर! अब शेख जैसे आदमी कहते हैं, तो सजा भुगतते हैं। हमारे जैसे आदमी बेवकूफी नहीं भी करते हैं तब भी भुगतनी पड़ती है क्योंकि कायदा बिगड़ चुका है। एक आदमी ने शेख के बारे में मुझसे कुछ बात की। समझाना चाहा तो मैंने उसे साफ-साफ कह दिया। एक चीज अलबत्ता कुछ अच्छी लगी मुझे उसमें कि शेख ने किसी आदमी को अपनी मौजूदा राय बतायी। वह बहुत अच्छी तो नहीं थी, बुरी भी नहीं थी, लेकिन उसमें कुछ शब्द ऐसे थे जिन्हें मैं दुहरा देना चाहता हूं। उन्होंने कहा, अलबत्ता मैं ऐसा कोई काम नहीं करूंगा कि जिससे हिन्दुस्तान के लोगों को, जिसमें कश्मीर के लोग शामिल हैं, नुकसान हो। एक मानी में बहुत बड़ी बात है। यह भी मैं आपसे कह दूं कि जब लोग हस्ताक्षर कराने आये शेख अब्दुल्ला की रिहाई के लिए तो मैंने हंसते हुए कहा कि क्या प्रधानमंत्री ने अब रिहाई के लिए भी आंदोलन शुरू कर दिया है? मैंने कहा, मैं तो सही चीज पर दस्तखत करूंगा। यह मैं जानता था कि यह सही चीज है। इस पर दस्तखत करना है, चाहे उसके लिए कहीं से भी इशारा आया हो, लेकिन फिर मैंने कहा कि शेख से जाकर कह देना कि पहचान तो हमारी बहुत पुरानी है। बड़ा वक्त बीत गया, तुम्हारा भी वक्त बीता है और हमारा भी वक्त बीता है, तुमने कोशिश की कि अपने दोस्त के भक्त बन करके, सरकार के ओहदों पर रह करके जनता का भला करो। जब मैंने लोकसभा में कहा कि हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के महासंघ की बात सोचनी चाहिए, तब कुछ लोगों ने बड़बड़ाना शुरू किया। एकाध ने बीच में टोका- टाकी की और एक आदमी तो दृढ़ता के साथ खड़ा हो गया और बोला, ‘अब मैं आगे नहीं बोलने दूंगा और फिर कहा, ये बड़े लीडर हैं। जब अपने मुंह से बात निकालते हैं तो हमारा हक हो जाता है पूछने का कि वे बताएं कि किस ढंग से हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का एका करेंगे?’ हम जवाब देना चाहते थे लेकिन अध्यक्ष बीच में बोले कि वह बहुत देर बोल चुके हैं और अगर मैंने यह भी मौका दिया तो लम्बी तकरीर हो जायेगी। तो हमने कहा कि और बातें चाहे समझ में न आयें लेकिन एक बात समझ लेना, सपना देखो,हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के महासंघ का सपना देखो।
बंटवारे पर कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक
मैं कांग्रेस कार्यसमिति की उस बैठक का जिक्र करना चाहूंगा, जिसमें बंटवारे की योजना स्वीकृत की गयी। हम दो सोशलिस्टों श्री जयप्रकाश नारायण और मुझे इस बैठक में विशेष निमंतण्रपर बुलाया गया था, हम दोनों महात्मा गांधी और खान अब्दुल गफ्फार खां को छोड़कर और कोई बंटवारे की योजना के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला। यह बैठक दो दिनों तक चली। मौलाना आजाद उसी छोटी-सी कोठरी के कोने में बैठकर अबाध गति से सिगरेट पीते रहते थे। वे एक शब्द नहीं बोले। सम्भव है कि उन्हें सदमा पहुंचा हो, लेकिन उनका यह बतलाने की कोशिश करना कि वे अकेले विरोध करने वाले थे, बेवकूफी के सिवा और कुछ नहीं है। मैं मान सकता हूं और यह समझ भी सकता हूं कि वे बंटवारे से दुखी थे। इस बैठक में आचार्य कृपलानी की स्थिति बड़ी दयनीय थी। इस समय वे कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे। वे झुककर बैठे थे और बीच बीच में ऊंघ रहे थे। बहस के दरम्यान महात्मा गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष की ओर संकेत किया। झुंझलाकर मैंने उनका हाथ पकड़कर झिंझोरा। उन्होंने बताया कि वे सिरदर्द से बुरी तरह पीड़ित हैं। बंटवारे से उनका विरोध निश्चित ही साफ रहा होगा क्योंकि उनके लिए यह वैयक्तिक भी था। लेकिन इस आजादी के लड़ाकू संगठन को बुढ़ापे की, बीमारी और थकान ने आफत के समय बुरी तरह धर दबाया था। खान अब्दुल गफ्फार खां महज दो वाक्य बोले। उनके सहयोगियों ने विभाजन योजना स्वीकृत कर ली, इस पर उन्होंने अफसोस जाहिर किया। उन्होंने विनती की कि प्रस्तावित जनमत गणना में पाकिस्तान या हिन्दुस्तान में सम्मिलित होने के इन दो विकल्पों के अलावा, क्या यह भी जोड़ा जा सकता है कि उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत चाहे तो स्वतंत्र भी रहे। इससे अधिक किसी भी अवसर पर वे एक शब्द भी नहीं बोले, निश्चय ही उन्हें काफी सदमा लगा था। श्री जयप्रकाश नारायण विभाजन के किलाफ संक्षेप में एक निश्चयात्मक ढंग से एक बार ही बोले और फिर अंत तक वे चुप रहे। उन्होंने ऐसा क्यों किया? जिस ढंग से कार्यसमिति देश का विभाजन करना चाह रही थी, क्या वे उससे क्षुब्ध थे? या उन्होंने चुप रहने में ही बुद्धिमानी समझी क्योंकि नेतृत्व विभाजन की स्वीकृति के लिए दृढ़ रूप से एकमत था? बंटवारे से मेरा विरोध निरंतर और मुखर था, शायद वह बहुत गम्भीर न था और अब याद पड़ता है कि उसमें कुछ खामियां भी थीं। हर हालत में, मेरे विरोध से मुसीबत नहीं टाली जा सकती थी। जो महत्त्वपूर्ण है, वह है इस मीटिंग में गांधीजी का हस्तक्षेप। यहां मैं विशेष रूप से उन दो बातों की र्चचा करूंगा, जिन्हें इस बैठक में गांधी जी ने उठाया था। शिकायत सी करते हुए उन्होंने नेहरू और पटेल से कहा कि विभाजन को मान लेने के पहले उन लोगों ने उसकी खबर उन्हें नहीं दी। नेहरू ने कुछ आवेश में आकर उन्हें टोका और कहा कि उनको वे पूरी तौर पर जानकारी देते रहे हैं। गांधी के दोहराने पर नेहरू ने अपनी पहली बात को थोड़ा बदल दिया। इस घटना के बारे में मैं गांधी की बात मानूंगा। नेहरू की नहीं। और भला कौन नहीं मानेगा? नेहरू को झूठा कहकर ठुकरा देना जरूरी नहीं है। यहां पर असल सवाल यह कि नेहरू और सरदार पटेल के विभाजन की योजना मान लेने के पहले, क्या उसकी जानकारी गांधी जी को थी? गांधी को लिखे गये संदिग्ध पत्रों को छुपा देने से नेहरू का काम नहीं चलेगा, जिनमें उन्होंने काल्पनिक और सतही जानकारी दी थी। ये लोग बुढ़ा गए थे और थक गए थे। वे अपने आखिरी दिनों के करीब पहुंच गये थे, कम से कम उन्होंने ऐसा जरूर सोचा होगा। यह भी सही है कि पद के आराम के बिना ये ज्यादा जिंदा भी नहीं रहते। अपने संघर्ष के जीवन को देखने पर उन्हें बड़ी निराशा होने लगी थी। बहुत ज्यादा मौकापरस्त बनने का मौका उनका नेता दे नहीं रहा था। अपने जीवन काल में प्रशासन की मदद से देश का भला करना, ताकत का मजा लेना, सरकार द्वारा देश की उन्नति करना और असफल समझे जाने से डरना, ये सब इसी के पहलू हैं। (लोहिया की किताब साम्प्रदायिकता की जहर के सम्पादित अंश)

Sunday, March 13, 2011

हमारे गांव और किसान


अपने समय में हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय रहे साप्ताहिक पत्र धर्मयुग में ग्रामीण संवेदना के प्रखर कथाकर शिवमूर्ति की लंबी कहानी कसाईबाड़ा छपी तो सारे देश में धूम मच गई थी, क्योंकि इस कहानी में कथाकार ने आपातकाल के दौरान गांव में हुए नारी जीवन के शोषण और उत्पीड़न को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से रूपायित किया था। शयद इसीलिए बुंदेलखंड से शुरू हुई नई पत्रिका मंच ने अपना प्रवेशांक शिवमूर्ति पर केंद्रित कर अपने सफर का आगाज किया है। कसाईबाड़ा से भी बड़ी और बेहतर कहानी भरतनाट्यम के छपते ही शिवमूर्ति हिंदी कहानी के स्टार कथाकर बन गए थे। इसके बाद छपी तिरिया चरित्तर ने तो और भी कमाल कर दिया था, क्योंकि उस पर बासु भट्टाचार्य ने फिल्म बनाकर शिवमूर्ति को समकालीन कथाकारों का सिरमौर बना दिया। फणीश्वर नाथ रेणु, राही मासूम रजा और श्रीलाल शुक्ल के बाद ग्रामीण जीवन पर अपने लेखन के कारण कोई अन्य रचनाकार पाठकों का महबूब कथाकार बन सका, तो वे सिर्फ और सिर्फ शिवमूर्ति हैं। शायद इसलिए मंच के संपादक मयंक खरे ने बुंदेलखंड की पथरीली जमीन पर केदारनाथ अग्रवाल की किसान चेतना और उनकी प्रगतिशील दृष्टि को आगे बढ़ाने के लिए शिवमूर्ति को प्रतिनिधि कथाकार के रूप में चुनने का साहसिक निर्णय लिया। बस्ती और चित्रकूट जैसे छोटे-मोटे कस्बों में रहते हुए शिवमूर्ति वैश्विक और लोक विशेष, दोनों दृष्टियों से संपन्न रहे। सो, आठवें दशक की पीढ़ी में वे सबसे आगे निकल गए, सबसे कम लिखकर भी। मंच के इस विशेषांक में प्रकाशित विश्वनाथ त्रिपाठी, कमला प्रसाद, रवि भूषण, महेश कटारे, प्रेम शशांक, शशिकला राय, हरिश्चंद्र श्रीवास्तव तथा कमल नयन पांडेय के आलोचनापरक लेख इस बात को प्रमाणित करते हैं तो राजेंद्र राव, मदन मोहन, भीष्म प्रताप सिंह, जयप्रकाश धूमकेतु, भोलानाथ सिंह, दिनेश कुशवाह, संजीव तथा उत्तमचंद आदि के लेख शिवमूर्ति के ग्रामीण व्यक्तित्व को पाठकों के सामने साकार कर देते हैं। इन लेखों से पता चलता है कि उत्तर भारत के ग्रामीण जनजीवन, किसानों, मजदूरों, स्ति्रयों तथा दलितों की दयनीय स्थिति, शोषण एवं दमन को जिस कौशल से शिवमूर्ति रूपायित करते रहे हैं, उनका समकालीन कोई दूसरा कथाकार उस तरह नहीं कर पाया। घर से पलायन कर साधु बन गए पिता के कारण शिवमूर्ति ने बचपन से ही दो जून की रोटी के लिए कभी दर्जी का काम किया, तो कभी बीडि़यां बनाई, कैलेंडर बेचे, बकरियां पालीं, ट्यूशन पढ़ाया और मजमा लगाकर सामान भी बेचा। बावजूद इसके पढ़ाई करते-करते जब स्नातक हो गए तो उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग की परीक्षा में बैठकर पास भी हो गए और बिक्री कर अधिकारी बनकर सफल अफसर का जीवन जीते हुए जड़, जोरू और जमीन से जुड़ा लेखन भी करते रहे, जिसकी बानगी मंच के इस अंक में पाठक पा सकते हैं। शिवमूर्ति से गौतम सान्याल की बातचीत के अलावा संजीव-शिवमूर्ति के बीच हुआ मित्र संवाद भी इसमें है, जिससे शिवमूर्ति के रचनाधीन उपन्यास के बारे में जानकारियां भी पाठक को हासिल हो गई हैं। अब्दुल बिस्मिल्लाह, महीप सिंह, प्रहलाद अग्रवाल, सुशील कुमार सिंह, रामजी यादव तथा नंदल हितैषी आदि के लेखों और टिप्पणियों से सजा ढाई सौ पृष्ठ का यह अंक संग्रहणीय है|

बाजारवाद के बीच इंसान


 पचास साल पहले नई कहानी और नई कविता में आया आयातित शहरी अकेलापन अब कितना देसी हो गया है। इसे जानना है तो गीत चतुर्वेदी के कहानी संग्रह पिंक स्लिप डैडी को पढ़ना जरूरी है। संग्रह की तीनों कहानियां गोमूत्र, सिमसिम और पिंक स्लिप डैडी आपको एक ऐसे रचना संसार में ले जाएंगी, जो वाचाल होते हुए भी मौन और ठोस होते हुए भी तरल है। इसलिए इन्हें पढ़ते हुए कहानी के साथ-साथ कविता का भी आनंद आता है। कथाकार की सबसे बड़ी खूबी उनकी मौलिकता है। न सिर्फ उनकी भाषा में ताजापन है, बल्कि कथा कहने का अंदाज भी निराला है। उनकी रचना पाठक को चुनौती देती प्रतीत होती हैं। यही सफल रचना की कसौटी होती है। तीन कहानियों के अपने पहले संग्रह सावंत आंटी की लड़कियां से चर्चित हुए गीत निस्संदेह आधुनिक साहित्य के सबसे सशक्त हस्ताक्षरों में शामिल हैं। इसमें कोई दोराय नहीं है कि जैनेंद्र के जहाज का पंछी से लेकर अज्ञेय के अपने अपने अजनबी तक में औद्योगिकीरणअकेलापन, संत्रास, कुंठा, स्वांग, भ्रम और अवसाद का बखूबी चित्रण हुआ है, लेकिन उनकी रचनाओं के पात्र और उनकी परिस्थितियां देशज नहीं लगती हैं। गीत के पात्र अपने आसपास के लगते हैं। पिछले बीस साल में उदारीकरण के कारण समाज के तानेबाने में जो परिवर्तन आए हैं, उन पर कथाकार की गजब की पकड़ है। 1990 से पहले होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड जैसे शब्द अनजाने लगते थे और अब हर दूसरी शख्स या तो इनका आनंद उठा रहा है या इनसे पीडि़त है। संग्रह की पहली कहानी गोमूत्र का नायक दूसरी श्रेणी में शामिल है। क्रेडिट कार्ड का बिल नहीं भरने पर जब बैंक के नुमाइंदे उसे बार-बार परेशान करते हैं तो वह उन पर बरस पड़ता है। इसके जवाब में उधर से आवाज आती है, भिखारी मैं हूं या आप? क्यों इस तरह चिल्लाकर बात कर रहे हैं? कर्जा आपने लिया है, मैंने नहीं..। पहले कर्जा चुकाइए, फिर जितनी मर्जी हो चिल्लाइए। जब भर नहीं सकते, तो क्यों ले लेते हो कर्जा? कहानी संग्रह की शीर्षक रचना पिंक स्लिप डैडी सही अर्थो में औपन्यासिक संभावनाओं वाली कहानी है। यह अध्याय कॉरपोरेट दुनिया के बदलते न सिर्फ चरित्र को बताती है, बल्कि इसकी वास्तविकताओं से भी पाठकों को भलीभांति अवगत कराती है। कुल मिलाकर यह कारपोरेट दुनिया की की एक सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करती है। इसका नायक प्रफुल्ल शशिकांत दाधीच यानी पीएसडी यानी पिंक स्लिप डैडी। सफलता की कामना करने वाला अपर मिडिल क्लास का एक व्यक्ति है, जिसके तरकश में वे सारे तीर हैं जो उसके निशाने को वेधने के लिए और लक्ष्यों को पाने के लिए ही बनाए गए हैं। इसके बावजूद भी वह स्थिर नहीं रह पाता, क्योंकि वह किसी भी स्थिति में खुद असफल होते नहीं देखना चाहता, बल्कि यों कहें कि विफल होने की कल्पना मात्र से ही उसे घृणा है। इसलिए वह धीरे-धीरे एक ऐसी दुनिया का हिस्सा बनता जाता है, जहां प्रेम और घृणा के बीच कोई फर्क नहीं रह जाता। उस दुनिया में चालाकी, मक्कारी, धूर्ततानाटक..का बड़ा मोल है। यही हकीकत है। ईमानदारी, सच्चाई और निष्ठा जैसे सद्गुण अब अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। इनका कोई मोल नहीं रह गया है। जो अब भी इनसे चिपके हुए हैं, यह उनकी मर्जी नहीं, बल्कि मजबूरी है। ऐसे लोगों के लिए इस सिस्टम में कोई जगह नहीं है। पीएसडी के उन पात्रों की तरह उन्हें भी एक-एक कर नेपथ्य में चले जाना होगा, जो सिस्टम के साथ नहीं चल सकते। सिस्टम कह रहा है कि मंदी है। छंटनी जरूरी है। लोगों को पिंक स्लिप देना ही पड़ेगा। टॉप मैनेजमेंट का कर्तव्य है कि वे सिस्टम के सुर में सुर मिलाएं। नहीं तो पीएसडी के जयंत लाल की तरह अलग हो जाएं। पीएसडी समकालीन भारत की पहली बड़ी कथा रचना है, जिसका संबंध कॉरपोरेट दुनिया से है। उस दुनिया से, जहां पुरानी बोतल में नई शराब डालकर उसे विज्ञापन के दम पर बेचा जाता है। पुराने जमाने में किसी कंपनी का एमडी अपने पुराने कर्मचारी को बरसों बाद उसके नाम से पुकारता था और उसके बच्चों की सुध लेता था तो उसे मानवीय कहा जाता है लेकिन आज इसे कॉरपोरेट सोशल रेस्पांसिबिलिटी यानी सीएसआर कहा जाता है। यह सचमुच में मानवीय हुए बिना मानवीयता होने का उपक्रम है। इस स्वांग के दुष्प्रभाव सिर्फ कंपनी पर ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े लोगों पर भी पड़ रहा है। वह अपने घर में भी नाटक करने लगते हैं। कथा नायक पिंक स्लिप डैडी का प्रफुल्ल शशिकांत दाधीच हो या फिर गोमूत्र का अनाम नायक, सबके लिए प्रेम स्थायी भाव न होकर क्षणिक आवेग की तरह है। इसलिए गोमूत्र के नायक को अपनी पत्नी कभी काम करने वाली नजर आती है और कभी खाना बनाने वाली तो कभी वह बगल में लेटी प्रेयसी बन जाती है। यह रूपांतरण आधुनिकता का आवश्यक बाई प्रोडक्ट है। वह आधुनिकता, जो बाजारवाद की बुनियाद पर बहुत मजबूती से आगे बढ़ रही है। हमारे और आपके जीवन में यह बाजार बहुत अंदर तक घुस आया है। इसके नतीजे भयानक हैं। यह कहां जाकर रुकेगा कोई नहीं जानता। इतने बड़े रचना संसार को शब्दों से सुंदर आकार देना आसान काम नहीं है। इसे कामयाबी से अंजाम देकर गीत चतुर्वेदी ने यह साबित कर दिखाया है कि वह सिर्फ स्वनदर्शी विचारक ही नहीं, बल्कि कलम के भी धनी हैं|

Sunday, March 6, 2011

भागवत भूमि यात्रा और अज्ञेया


एक सदी पूर्व भारत भूमि पर जन्मे एक बालक का नाम पिता ने सच्चिदानंद रखा। पिता श्री हीरानंद वात्सायन, सरकारी अधिकारी और पंडित थे। आगे चलकर वह बच्चा सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस तीन शब्दों के नाम के आगे अज्ञेय भी जुड़ गया। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के कुशीनगर नामक ऐतिहासिक स्थान पर हुआ। पिता के स्थानांतरण के साथ लखनऊ, कश्मीर, बिहार और मद्रास घूमते हुए बचपन बीता और उन स्थानों की मिट्टी की सुगंध भी मन पर परत-दर-परत पड़ती गई। बाद में वह कवि, कहानीकार, उपन्यासकार और निबंध लेखक बने। साहित्य के विभिन्न विधाओं में कलम चलाते रहे। नई कविता के रचनाकार रहे। साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने प्रयोगवाद को बढ़ावा दिया। सफल संपादक और अध्यापक के रूप में भी अज्ञेय की पहचान बनी। 7 अप्रैल, 1911 को जन्मे सचिच्दानंद वात्सायन 4 अप्रैल, 1986 को दुनिया छोड़ चले। 76 वर्षीय जीवन का 36 वर्ष पराधीन भारत में तो 40 वर्ष स्वाधीन भारत में बीता। लगभग बराबर-बराबर। अज्ञेय ने अपने जीवन के उत्तरा‌र्द्ध में दो सांस्कृतिक साहित्यिक यात्राएं निकाली। एक यात्रा राम और सीता की जीवन यात्रा थी। जन जनक-जानकी यात्रा। आज के समाज में जीवंत राम सीता के भावों को खोजना था। इसलिए यात्रा मिथिलांचल और अवध की थी। दूसरी यात्रा भागवत भूमि यात्रा हुई। जिस यात्रा के क्रम में कृष्ण के भाव और प्रभाव को जन-जन में ढूंढ़ना था। दोनों यात्राओं में उनके समकालीन बड़े-बड़े साहित्यकार सम्मिलित हुए। यात्रा समाप्ति पर उन साहित्यकारों ने अपने-अपने नजरिए से देखे क्षेत्र और भावों को अपने द्वारा लिखित लेखों में बांधा। सीता-राम और राधा-कृष्ण के भाव और प्रभाव को समझने के लिए ये यात्राएं तात्कालीन साहित्य के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। भागवत भूमि यात्रा के साहित्यिक अनुभवों को संजोकर पुस्तक का रूप देने के क्रम में भागवत भूमि यात्रा पुस्तक के संपादक कृष्णदत्त पालीवाल ने बड़े ही सूक्ष्म भाव और स्थूल अनुभवों का वर्णन करते हुए लिखा है-भागवत भूमि यात्रा, एक अनुभव का साकार रूप है। इस रूप की कल्पना सच्चिदानंद हीरानन्द वात्सायन अज्ञेय ने की थी। अज्ञेयजी यायावरी के लिए प्रसिद्ध थे और उनका अन्वेषी भाव इन यात्राओं में सक्रिय रहता था। इन यात्राओं में घटिया विकलांग भाव न रहकर भारतीय संस्कृति के मूल को खोजने और समझने का गंभीर भाव प्रयास था। साहित्य रचना में उन्होंने मधुमक्खी की भूमिका अपनाई थी। उन्होंने समाज के विभिन्न क्यारियों से भिन्न-भिन्न स्वाद के पराग एकत्रित कर साहित्य की रचना की थी। इसलिए उनका साहित्य अपने रचना के समय में ही समाज स्वीकृत और जनग्राह्य रहा था। वह भारतीय संस्कृति में गहरे धंसे थे। उनके पैर अपनी मूल सांस्कृतिक भूमि पर इतनी दृढ़ता से जमे रहे कि पश्चिमी आधुनिकता और आधुनिकतावाद उन्हें उखाड़ नहीं सका। मैथिली शरण गुप्त के मानसशिष्य अज्ञेय भारतीय-परंपरा-साहित्य के नए भाष्यकार बनकर सामने आए। उन्होंने भीतर से अनुभव किया कि भारत की आत्मा सनातन है और भारतीयता कोरी भौगोलिक परिवृत्ति की छाप नहीं है। जो बात एक भारतीय को सारे संसार से पृथक करती है वह यह है कि भारतीयता मानवीयता का निचोड़ है, उसकी हृदय-मणि है। यात्रा के नाम भागवत भूमि यात्रा से ही प्रकाशित इस पुस्तक में अज्ञेय के विद्वान सहयात्रियों मानिक लाल चतुर्वेदी, विद्या निवास मिश्र, भगवती शरण सिंह, मुकुंदलाल, रमेश चंद्र शाह, इला डालमिया, नरेश मेहता, विष्णुकांत शास्त्री, रघुवीर चौधरी, अज्ञेय, जुड़ावलाल मेहता और सच्चिदानंद वात्सायन के लेख हैं। सबों ने अपनी-अपनी दृष्टि से यात्रा की उपलब्धियों का बखान किया है। स्वयं अज्ञेयजी अपने आलेख में यात्रा के अंत के बाद के अपने मनोभाव व्यक्त करते हुए- कौन गली गए श्याम में कहते हैं-हमारी यात्रा में कहीं कुछ कमी रह गई है। यों तो सबै भूमि गोपाल की से आरंभ करें तो कोई भी यात्रा भागवत भूमि यात्रा है और कोई भी यात्रा अधूरी ही रहेगी, क्योंकि वह पूरी भागवत भूमि को तो नाप नहीं सकती, लेकिन मैं एक दूसरे अधूरेपन की बात कह रहा हूं। सोच रहा हूं कि इस कमी का सही निरूपण कैसे हो सकता है? क्या यात्रा में कुछ टूट गया कहना अधक उचित होगा या कि यात्रा में कहीं कुछ टूटन है कहना ही उसे सही निरूपित कर सकेगा? उनके जीवन काल में यात्रा वृतांत प्रकाशित नहीं हो पाया था। 1984 में इस पुस्तक के द्वारा भागवत भूमि यात्रा के भाव को समझा जा सकता है। यात्रा का आयोजन निश्चय ही अज्ञेय जी की कल्पना के अनुरूप हुई थी। पर उस यात्रा के साहित्यिक यात्रियों के बिना यात्रा सफल भी नहीं होती न उसका आशय अर्थवान होता। सहयात्री तो सब अपने-अपने ठिकाने लौट गए हैं। कुछ ने ब्रजमंडल की यात्रा की और घर लौटे, कुछ ने केवल द्वारका-ऊखा मंडल की यात्रा की और वे भी प्रसन्न-मन अपने-अपने घर गए। थोड़े से यात्री जिनका कह लीजिए भाग्य प्रबल था या जो अधिक फुरसतवाले या निठल्ले थे वे दोनों मंडलों की यात्रा पूरी कर आए। कृष्ण की जीवंतता के साथ अज्ञेयजी को भी समझा जा सकता है।

जड़ों पर ही खड़ा होता है साहित्य का वटवृक्ष


आपके उपन्यास काशी का अस्सी पर फिल्म बनने जा रही है। कैसा लग रहा है? अच्छा लग रहा है। इसलिए भी कि डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी मेरे उपन्यास पर फिल्म बना रहे हैं। चंद्र प्रकाश उन लोगों गिने-चुने फिल्मकारों में एक हैं, जो लिखते-पढ़ते रहे हैं। साहित्य की समझ और इसमें दिलचस्पी रखते हैं। वे काशी का अस्सी कई बार पढ़ चुके हैं। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उन्होंने इसे कंठस्थ कर लिया है। दरअसल, चंद्र प्रकाश जी को यह उपन्यास बहुत पसंद आया और उन्होंने ठान लिया कि इस पर काम करना है और अंतत: वह मेरे उपन्यास पर मोहल्ला अस्सी के नाम से फिल्म बना रहे हैं, जिसकी शूटिंग इन दिनों चल रही है। इससे पहले कई बड़े लेखकों की कृतियों पर फिल्में बन चुकी हैं। कुछ में मूल कथानक से छेड़छाड़ के आरोप भी लगे और सबसे बड़ी बात यह कि ज्यादातर बाजार में पिट गई। फिल्म के लिए हामी भरते हुए ये सब बातें आपके जेहन में थीं? जब पहली बार चंद्र प्रकाश जी ने मुझसे संपर्क किया और फिल्म बनाने को लेकर अपनी मंशा जाहिर की तो मन में यह सवाल जरूर आया था कि क्या वह उपन्यास के साथ न्याय कर पाएंगे? जब मैंने चंद्र प्रकाश जी के आगे इस सवाल को उड़ेल दिया तो उन्होंने मुझे अमृता प्रीतम के उपन्यास पर बनाई गई अपनी फिल्म पिंजर देखने का आग्रह किया। फिर मैंने यह फिल्म देखी और वास्तव में उस शख्स ने (चंद्र प्रकाश द्विवेदी) एक कमजोर उपन्यास को बिना उसकी आत्मा से छेड़छाड़ किए एक बेहतरीन फिल्म बना दी। दूसरी बात यह है कि फिल्में मनोरंजन के लिए बनती हैं। कुछ बदलाव किए बिना फिल्म बनाना मुश्किल होता है और जोखिम भरा भी। अब मेरे उपन्यास और फिल्म के टाइटल को ही ले लीजिए। दोनों अलग-अलग हैं। वैसे, चंद्र प्रकाश द्विवेदी एक बेहतरीन फिल्म बनाने में सक्षम हैं। काशी का अस्सी में गालियों को लेकर आपकी आलोचना भी होती रही है। तो क्या एक बार फिर आप और चंद्र प्रकाश आलोचनाएं झेलने के लिए तैयार हैं? मैं आपका आशय समझ गया। देखिए, काशी का अस्सी की आत्मा और शरीर अगर पप्पू की दुकान है तो गालियां इसका गहना। फिल्म से अगर इन्हें निकाल दिया जाएगा तो फिर बचेगा ही क्या। वैसे भी गालियां बनारस या कह लें पूरे पूर्वाचल में प्यार जताने का भी साधन हैं। गालियों के बिना बनारस की तहजीब, परंपरा, संस्कृति को बयां करना अधूरा है। जाहिर है, फिल्म में गालियां होंगी, लेकिन मैं बता दूं कि मोहल्ला अस्सी की गालियों और आम फिल्मों की गालियों में अंतर है। मोहल्ला अस्सी में गालियां प्यार की अभिव्यंजना हैं। आपने जब काशी का अस्सी लिखा, वह दौर और था, आज का दौर बिल्कुल अलग है। लोगों की अभिरुचियां बदल गई हैं। काशी भी बहुत बदल गया है। ऐसे में मोहल्ला अस्सी फिल्म आज की पीढ़ी को उनका जायका दे पाएगी? यह बिल्कुल सच है कि आज ज्यादातर फिल्में एलीट क्लास को फोकस करके बनाई जा रही हैं, लेकिन हाल की कुछ फिल्मों ने यह मिथक तोड़ा है कि आज की तारीख में सिर्फ वही फिल्में कामयाब होती हैं, जो एलीट क्लास के ज्यादा करीब होती हैं। दरअसल, ग्लोबलाइजेशन के दौर में बहुत कुछ बदल गया है। लोग बदल गए हैं। संस्कृति, रहन-सहन, बोलचाल सबमें फर्क आया है। ऐसे में लोग जानना चाहतें हैं कि क्या-क्या बदला है। हमने क्या-क्या खोया है। किससे हम वंचित रहे हैं। देश के छोटे शहरों और खासकर पूरब के लोगों को तो मोहल्ला अस्सी अपने मोहल्ले की दास्तान लगेगी। चूंकि इस फिल्म के निर्माण से लखनऊ के रहने वाले सौरभ शुक्ला भी जुड़े हैं, लिहाजा इस नवाबी शहर की ठसक और तहजीब का अक्स भी इस फिल्म में नजर आएगा। कहते हैं कि बड़ी शख्सियत में शुमार होने के लिए बड़े शहरों में बसना जरूरी है। दूसरे शब्दों में कहें तो छोटे शहरों में सफलता का दायरा बहुत सीमित होता है। क्या आपको कोई मलाल है? बिल्कुल नहीं। मेरी अपनी दुनिया है। मैं यहीं मस्त हूं। जहां तक बड़े शहरों और बड़े शहरों के बड़े लेखकों का सवाल है तो उनकी शोहरत और सफलता उन्हें ही मुबारक। मैं यही कहूंगा कि उनकी शोहरत और उनका रुतबा तो तात्कालिक है। वे वर्तमान में भले जी लें, लेकिन रचनात्मकता के लिए छोटे शहरों में जीना पड़ता हैं। रचनात्मकता उनसे ही जुड़ी रहती है, जो अपनी जड़-जमीन से जुड़े होते हैं। दूसरे शब्दों में कहूं तो अपनी जड़ों पर ही खड़ा होता है साहित्य का वटवृक्ष। साहित्यिक हलकों में कहा जाता है कि अब संस्मरण विधा को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। इसे खतरा किससे है? मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता। मैं तो कहूंगा कि संस्मरण विधा पहले से ज्यादा सशक्त होती जा रही है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मेरे लिखने के बाद लोगों ने इसे गंभीरता से लेना शुरू किया। आज स्थिति यह है कि हर पत्र-पत्रिका में संस्मरण को स्थान दिया जा रहा है। अब जब आपके उपन्यास पर फिल्म बन रही है तो क्या आगे फिल्मों के लिए लिखने का कोई इरादा है? देखिए, मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि काशी का अस्सी पर कोई फिल्म बनेगी। हालांकि इससे पहले तमाम साहित्यकारों की कृतियों पर फिल्में बन चुकी हैं। मैं मानता हूं कि घर-घर, गली-फुटपाथ, शहर-गांव तक अपनी रचना पहुंचाने के लिए फिल्म एक सशक्त माध्यम है। हम लेखकों के सामने सचेत पाठक होता है। पाठक यानी जो पढ़ना-लिखना जानता हो, लेकिन फिल्मकारों के लिए ऑडियन्स का विस्तृत दायरा होता है। ऐसे में प्राय: लेखक फिल्म के लिए लिखने का मोह संवरण नहीं कर पाते। लेकिन जहां तक मेरी बात है तो मैं यह मानकर नहीं लिखूंगा कि मेरे उपन्यास, मेरी कहानी पर फिल्म बने। और न ही मैं मुंबई में फिल्म की कहानी लिखने जाऊंगा। हां, अगर किसी फिल्मकार को मेरी कोई रचना पसंद आती है तो इस पर वह काम कर सकता है। इससे पहले 1975 में लिखे मेरे उपन्यास अपना मोर्चा पर नाटक का मंचन हुआ था। जिसका निर्देशन देवेंद्र राज अंकुर ने किया था और अभिनय किया था मनोज वाजपेयी ने। इसी तरह कवन ठगवा नगरिया लूटल हो का भी नाट्य मंचन हुआ था। ऐसी मेरी कई रचनाएं हैं, जो किसी न किसी रूप में दर्शकों के सामने आई। हाल के दिनों में कोई ऐसी किताब, जिसे पढ़कर लेखक की पीठ थपथपाने का मन हुआ हो? कुछ दिनों पहले ही मैंने ग्लोबल गांव के देवता पढ़ा। यह एक बेहतरीन उपन्यास है। इसके लेखक हैं रणेंद्र। वह रांची में रहते हैं। उन्होंने अपने इस उपन्यास में आदिवासियों-जनजातियों की पीड़ा का जीवंत चित्रण किया है। इसमें मानव समाज की उत्पत्ति से विकास क्रम में बेहतरी की अदम्य तलाश एवं निरंतर कठिन श्रम के जरिये विशिष्ट योगदान देने वाले समुदायों और खासकर जनजातियों को कालांतर में निरंतर हाशिये पर धकेल दिए जाने की ऐतिहासिक समझ भी मिलती है। अब आपकी आगे की योजनाएं क्या हैं? हाल ही में दो कहानियां पूरी की हैं। इसमें से एक तद्भव के अगले अंक में प्रकाशित हो रही है। जहां तक आगे की बात है तो मैं कहानी के प्लॉट के लिए तड़प रहा हूं। उम्मीद है जल्द ही कथा के सारे पुर्जे मिल जाएंगे। लोक कथाएं हमारी पूंजी हैं। सोच रहा हूं इस पर कुछ काम किया जाए। आज की तारीख में किसी युवा लेखक से उम्मीद? ऐसे कई लेखक हैं, जो लिखते हैं तो मानो अपनी आत्मा को निकालकर अपनी कलम की रोशनाई में घोल देते हैं। मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहूंगा, क्योंकि इससे उन लोगों को तकलीफ भी हो सकती है, जो मेरी कसौटी पर खरे नहीं उतरते हों। ऐसा पहले हो भी चुका है|