आलोचक के तौर पर कमला प्रसाद जिन बातों को रचते थे, उसे जमीन पर उतारने के लिए संगठन के कायरें में सक्रिय हुए थे। प्रगतिशील वसुधा का संपादन भी इसी श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। प्रगतिशील मूल्यों की रचनाओं को अपनी पत्रिका में प्रकाशित कर एक तरफ वे ऐसे रचनाकारों को सामने ला रहे थे तो दूसरी तरफ समाज में व्याप्त कमजोरियों और चुप्पी को दरकाने की कोशिश भी कर रहे थे
हाल ही में जब प्रो. कमला प्रसाद के साहित्यिक अवदान के लिए 'प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान रायपुर' द्वारा सर्वसम्मति से वरिष्ठ आलोचना सम्मान की घोषणा हुई और फेसबुक पर इस खबर को प्रस्तुत किया गया तो एक युवा रचनाकार ने टिप्पणी की कि 'कमला प्रसाद जी को संपादक के रूप में कोई सम्मान मिलना चाहिए। उनका आलोचना से अधिक संपादन-क्षेत्र में योगदान है।' इस टिप्पणी के बाद कुछ लोगों ने आलोचना के क्षेत्र में कमला जी के योगदान की याद दिलाई। इस पुरस्कार के लिए निर्णायक समिति ने अनुशंसा के तौर पर कहा कि डॉ. कमला प्रसाद आधुनिक हिन्दी की प्रगतिशील परंपरा के महत्वपूर्ण और सुप्रसिद्ध आलोचक हैं, जिनकी साहित्यिक उपस्थिति पूरे हिन्दी क्षेत्र में जानी-पहचानी जाती है। अप्रतिम मेधा के धनी ऐसे साहित्यकार का निधन हिंदी साहित्य-समाज के लिए अपूरणीय क्षति है। प्रो. कमला प्रसाद ने आलोचना के अलावा साहित्य के तीन प्रमुख क्षेत्रों- अकादमिक दक्षता, संपादन और संगठनात्मक कौशल में जिस तरह अपना योगदान दिया, वह विशेष रूप से उल्लेखनीय और उनके व्यक्तित्व का असाधरण पहलू है। साहित्यशास्त्र, छायावाद प्रकृति और प्रयोग, छायावादोत्तर काव्य की सामाजिक- सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, दरअसल साहित्य और विचारधारा, रचना और आलोचना की द्वंद्वात्मकता, आधुनिक हिन्दी कविता और आलोचना की द्वंद्वात्मकता, समकालीन हिन्दी निबंध, मध्ययुगीन रचना और मूल्य, कविता तीरे, आलोचक और आलोचना जैसी कृतियों से उनकी प्रतिबद्ध दृष्टि, मानवीय मूल्यों के प्रति निष्ठा, गहरी निर्णय क्षमता व व्यापकता प्रदर्शित होती है। प्रो. प्रसाद ने अवधेश प्रताप विश्वविद्यालय रीवा में पहले प्राध्यापक और तत्पश्चात अध्यक्ष के रूप में बहुमूल्य अकादमिक भूमिका का निर्वाह कर नई पीढ़ी का सशक्त मार्गदर्शन किया। उनके कुशल संयोजन एवं संपादन में निकलने वाली पत्रिका 'प्रगतिशील वसुधा' भारतीय मनीषा के लिए एक जरूरी पत्रिका सिद्ध हुई है। इन सारे और बहुकोणीय क्षेत्रों में सतत संलग्न रहने के अलावा रचनात्मक लेखन कायरे में भी वे निरंतर सक्रिय रहे। चयन समिति की इस अनुशंसा के बावजूद सोचने वाली बात यह है कि आखिरकार एक संजीदा युवा रचनाकार कमला जी के संपादक रूप को ही अधिक महत्वपूर्ण क्यों मानता है? क्या यह उस युवा रचनाकार के सीमित ज्ञान को को दर्शाता है या कुछ और भी है? पिछले दो दशकों से प्रो. कमला प्रसाद विभिन्न स्थलों पर प्रगतिशील लेखक संघ के संगठनों को बनाने, बढ़ाने और मजबूती प्रदान करने में सक्रिय थे। 'पहल' के संपादन से अलग होने के बाद उन्होंने हरिशंकर परसाई द्वारा शुरू की गई पत्रिका वसुधा को निकालना शुरू किया। यही पत्रिका बाद के दिनों में प्रगतिशील वसुधा के तौर पर छपने लगी। यह प्रगतिशील लेखक संघ से ही प्रकाशित होती है। पर्लेस की गतिविधियों में अत्यधिक सक्रियता के कारण कमला प्रसाद को लोगों ने कमांडर साब कहना शुरू कर दिया था। उनकी यह सक्रियता निश्चित ही उनके लेखन का विस्तार और विकास था। आलोचक के तौर पर कमला प्रसाद जिन बातों को रचते थे, उसे जमीन पर उतारने के लिए संगठन के कायरें में सक्रिय हुए थे। प्रगतिशील वसुधा का संपादन भी इसी श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। प्रगतिशील मूल्यों की रचनाओं को अपनी पत्रिका में प्रकाशित कर एक तरफ वे ऐसे रचनाकारों को सामने ला रहे थे तो दूसरी तरफ समाज में व्याप्त कमजोरियों और चुप्पी को दरकाने की कोशिश भी कर रहे थे। अचरज की बात नहीं कि इस दौरान वे अपने संपादकीय और भाषणों के जरिए व्यापक समुदाय से संवाद स्थापित कर रहे थे और अपना पक्ष सामने रख रहे थे। इसमें उनकी आलोचना प्रतिभा का पता चलता था। 14 फरवरी, 1938 को मध्य प्रदेश के सतना में जन्में कमला प्रसाद ने एमए, पीएचडी करने के बाद सागर विश्वविद्यालय से डी लिट् की उपाधि प्राप्त की। वार्तालाप नाम से उनके द्वारा लिए गए साक्षात्कार की किताब, यशपाल और अवधेश प्रताप सिंह पर विनिबंध प्रकाशित है। उन्होंने जंगल बाबा नाम से बच्चों के लिए भी एक किताब लिखी थी। इसके जरिए उनके सरोकार को समझा जा सकता है। कमला प्रसाद भारतीय समाज में मौजूद कट्टरता, अंधविश्वास और शोषणमूलक संरचना के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे। वह तरक्की पसंद और खूबसूरत समाज के निर्माण में सक्रिय लोगों के साझीदार थे। धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत के विरोध में जाने वाली ताकतों की वह खुली मुखालफत करते थे। भारतीय राष्ट्र-राज्य के लिए चुनौती बनी नक्सल समस्या पर लिखे गये एक संपादकीय के जरिए उनकी चिंताओं को जाना-समझा जा सकता है। उन्होंने लिखा- 'नक्सलबाड़ी से शुरू हुई नक्सलपंथियों की क्रांतिधर्मिता आज अपने उद्देश्यों से भटक गयी है। कितने तो टुकड़े हो गए हैं। एक टुकड़ा माओवादी कहलाता है। माओवादी-नक्सलवादी दो अलग- अलग पद हैं। आए दिन इन समूहों के नाम से ऐसी घटनाएं जुड़ रही हैं जो दिल दहला देती हैं। दंतेवाड़ा में 72 सुरक्षाकर्मियों की हत्या और ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को पलट देने से हुई सैकड़ों निदरेषों की हत्या को कौन जायज ठहराएगा। मनुष्य की हत्याओं को कोई जनोन्मुख सिद्धांत अंगीकार नहीं कर सकता। जब यह आंदोलन शुरू हुआ था, तब धारणा थी कि नक्सल क्रांतिकारी मूलत: आदिवासियों के साथ होते शोषण और अन्याय के विरोध में उनके अधिकारों के रक्षक हैं। उनकी अस्मिता के हिमायती हैं। इसी अभिप्राय से वे आदिवासियों के शोषकों को सबक सिखाते हैं। बड़े-बड़े अधिकारियों, मंत्रियों और अमीरों पर निशाना साधते हैं। उनका संघर्ष वर्गयुद्ध है। वे सशस्त्र क्रांति लाना चाहते हैं। इतने वर्षों में उनके कृत्य उस तरह नहीं रहे। वे अपने ही वर्ग के हत्यारे बन गए हैं। आदिवासी समूहों में भी उनकी गतिविधि के प्रति पहले जैसा सद्भाव नहीं बचा। उनके साथ अभी तक जो सहानुभूति रखते थे, वे भी असहज महसूस करते हैं। साथ खड़े होने का नैतिक आधार खोते जा रहे हैं, राज्य सरकारें भी नक्सलपंथियों के बहाने चाहे जिन निरपराधियों को सजा देती है। राजकीय हिंसा को जायज ठहराने वाले लोगों को बढ़ावा मिला है। नक्सल पंथी आंदोलन के औचित्य-अनौचित्य पर लंबी बहस से अब ज्यादा उचित यह लगता है कि आदिवासी समाज के अगल-बगल झांक कर देखें। ..अत: आज जरूरत है कि आदिवासी समाज की बुनियाद को समझा जाए और उसी में से नक्सलपंथियों को निष्प्रभावी बनाने के रास्ते खोजे जाएं। इसे बहुत दूर तक केवल कानून की समस्या न जाना जाए।'