Sunday, May 15, 2011

रचनात्मकता का आलोक पुंज


हिंदी में ग्रंथावली, रचनावली, संचयिता और संचयन की परम्परा बहुत पुरानी नहीं है, अलबत्ता अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं में खासकर बांग्ला में कलैक्टेड वर्क्‍स, सिलेक्टेड वर्क्‍स और कम्पलीट वर्क्‍स की पुरानी परम्परा रही है। बांग्ला में संचयिता की भी। हिंदी में पहली ग्रंथावली भारतेन्दु ग्रंथावली थी, जिसका प्रकाशन सन 1912 में पटना के खड्ग विलास प्रेस, बांकीपुर से हुआ था। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हिंदी के जीवित और दिवंगत लेखकों की ग्रंथावलियां और संचयिता के प्रकाशन शुरू हुए। ग्रंथावली या रचनावली का महत्व शोध की दृष्टि से है जबकि संचयिता और संचयन किसी लेखक के बेस्ट लेखन को पाठकों को कम समय में जानने का अवसर प्रदान करता है। अोय हमारे समय के कृती-व्यक्तित्व थे। स्वतंत्रता पूर्व और पश्चात का हिंदी साहित्य उनकी रचनात्मक प्रतिभा से आलोकित है। कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, यात्रा वृत्तांत, पत्रकारिता जैसी विधाओं में अोय ने शीर्ष लेखन ही नहीं किया बल्कि हर जगह नया मानदंड भी स्थापित किया। लंबे अरसे तक उन्होंने हिंदी कविता की अगुआई की। 1943 में प्रकाशित तार सप्तक’, 1952 में दूसरा सप्तकऔर 1959 में तीसरा सप्तकने आधुनिक हिंदी कविता को नई दिशा दी। निराला को छोड़कर आधुनिक हिंदी कविता का कोई भी ऐसा महत्त्वपूर्ण कवि नहीं है जो अोय के दृष्टिपथ से छूट गया हो। मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, रघुवीर सहाय, भवानी प्रसाद मिश्र, साही, कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, सव्रेश्वर दयाल सप्तक के माध्यम से ही हिंदी कविता के परिदृश्य पर उभरे। आजादी के ठीक पूर्व अोय के संपादन में इलाहाबाद से प्रतीकनिकला जो लंबे अंतराल बाद नया प्रतीकनाम से पुन: प्रकाशित हुआ। जहां तक उपन्यास का सवाल है तो मुंशी प्रेमचंद के गोदानके बाद अोय रचित शेखर एक जीवनीदो खंड, (1940- 44) भाषा के स्तर पर ही नहीं, भाव बोध के स्तर पर भी एक नया प्रस्थान बिन्दु है। इस उपन्यास का विद्रोही नायक शेखर स्वयं अोय ही हैं। उनके दूसरे उपन्यास नदी के द्वीप’ (1951) के पीछे तो उस समय की साहित्य प्रेमी युवा पीढ़ी पागल सी हो गई थी क्योंकि इस उपन्यास में प्रेम का अद्भुत त्रिकोणात्मक आयाम है। एक तरफ भुवन, रेखा तथा गौरा और दूसरी तरफ चन्द्रमाधव। उपन्यास में भावना की गरमाहट तो है ही, प्रेम की ऐन्द्रिकता भी कम नहीं। अोय इस अर्थ में भी युग प्रवर्तक थे कि हरी घास पर क्षण भर’ (1949) से नई कविता की शुरुआत मानी जाती है। नंद किशोर आचार्य के संपादन में अोय संचयिता का प्रकाशन 2001 में हुआ और अोय के जन्म शताब्दी के निमित्त ोय रचना संचयन’ (मैं वह धनु हूं) डॉ कन्हैयालाल नंदन (अब स्वर्गीय) के संपादन में प्रकाशित हुआ है। पुस्तक की प्रस्तावना में कन्हैयालाल नंदन लिखते हैं, ‘यह संचयन न तो ोयजी की रचनाशीलता का क्रम निर्धारण करने के लिए है और न इस दृष्टि से इसे देखा जाना चाहिए। सिर्फ अोय अपने रचना-वैविध्य के साथ उपस्थित हैं। यही इसका लक्ष्य है।आगे उन्होंने संकेत दिया है कि डॉ कृष्णदत्त पालीवाल ने अपनी कृति ोय : कवि कर्म का संकटमें लिखा है-कैसा दुर्भाग्य है कि हिंदी आलोचना अोय को विदेश का नकलची ही सिद्ध करती रही। अथवा व्यक्ति स्वातंत्र्यवाद का समर्थक कहकर नीचट कलावादी सिद्ध करती रही। उन्हें परम्परा भारतीयता, भारतीय आधुनिकता, नवीन प्रयोगधर्मिता, शब्द का सच्चा पारखी, सम्पूर्ण अर्थ में सांस्कृतिक अस्मिता और जातीय स्मृति से जोड़कर समझने में असमर्थ रही है।ोय शब्द से परे जाकर घोषित करते हैं, ‘शब्द में मेरी समायी नहीं होगी, मैं सन्नाटे का छन्द हूं।
आलोच्य पुस्तक में अोय की लंबी कविता असाध्य वीणा’ 1961 में उनकी कविता पुस्तक आंगन के पार द्वारमें छपी थी। चूंकि यह उनकी पहली लंबी कविता थी, इसलिए उस समय भी इसने पाठकों और विद्वानों का ध्यान खींचा था लेकिन 1964 में मुक्तिबोध की मृत्यु के साथ उनके कविता संग्रह चांद का मुंह टेढ़ा हैमें उनकी लंबी कविता अंधेरे मेंसंगृहीत हुई तो उसकी इतनी व्यापक र्चचा हुई कि उसके शोर में असाध्य वीणाकी र्चचा बिल्कुल खो गई। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बाद के हिंदी आलोचकों ने असाध्य वीणाके महत्व को नहीं समझा। डॉ नामवर सिंह ठीक कहते हैं कि लंबी होते हुए भी असाध्य वीणा की मूल संवेदना वतरुलाकार है, इसलिए अंतत: यह एक प्रगीत है।’ ‘अंधेरे में की तरह इस कविता ने पूर्णता के साथ अपने लक्ष्य को प्राप्त किया है। स्वभावत: उसी की तरह यह भी हिंदी में एक श्रेष्ठ कविता की तरह मान्य हो रही है। अन्य महत्वपूर्ण कविताओं में कलगी बाजरे की’, ‘कांगडे की छोरियां’, ‘आज तुम शब्द न दो’, ‘यह द्वीप अकेला’, ‘आज थका हिय-हारिल मोरा’, ‘कतकी पूनो’, ‘सम्राज्ञी का नैवेद्य-दान’, ‘नंदा देवी’, ‘महावृक्ष के नीचे’, ‘नाचऔर मैं वह धनु हूंजैसी कविताएं संकलित हैं। पुस्तक में अोय की डायरी के साथ सप्तकों की भूमिका और पंत की षष्ठि पूर्ति पर प्रकाशित पुस्तक रूपांबराकी भूमिका भी संकलित है। अोय ने अपने समय की श्रेष्ठ पत्रिका कल्पनामें कुट्टिचातन
छद्म नाम से कुछ निबंध भी लिखे। उनके साथ कुछ अन्य निबंध भी आलोच्य पुस्तक में शामिल हैं। उपन्यासों में अपने-अपने अजनबी
(पूरा) बीनू भगत’ (अधूरा) और शेखर एक जीवनीके कुछ अंश संकलित हैं। अोय यायावर के रूप में भी प्रसिद्ध रहे हैं। उनका चर्चित यात्रा संग्रह का नाम ही है अरे यायावर रहेगा याद। उनकी दस कहानियां इस संचयन में हैं जिनमें गैंग्रीन’, हीली बोन की बत्तखें’, ‘कलाकार की मुक्ति’, ‘और मेजर चौधरी की वापसीवास्तव में उल्लेखनीय हैं। यदि उनकी दो और कहानियां शरणार्थीऔर पठार का धीरजभी शामिल कर ली जातीं तो पुस्तक का महत्व निश्चय ही और बढ़ जाता। पहली कहानी में जहां बंटवारे का दर्द है, वहीं दूसरी प्रेम की अद्भुत कहानी है। पुस्तक में अोय के नाटक उत्तर प्रियदर्शीऔर उनसे चार संवाद भी उल्लिखित हैं। इस पुस्तक की एक अन्य महत्वपूर्ण सामग्री है, ‘ोय अपनी निगाह में।उन पर केन्द्रित पुस्तक ोय अपने बारे मेंरघुवीर सहाय से रेडियो पर लंबे संवाद से ली गई है जिसमें अोय के जीवन, संघर्ष और परिवेश को समझने में मदद मिलेगी। पुस्तक के अंत में पहले परिशिष्ट में अोय द्वारा लिखे और उनके नाम लिखे कुछ पत्र हैं और दूसरे परिशिष्ट में कालक्रम से उनकी प्रकाशित पुस्तकों की सूची है। अंतिम परिशिष्ट में उनका जीवन वृत्त है। ोय जन्म शताब्दी के अवसर पर प्रकाशित इस संचयन का महत्व इस दृष्टि से है कि अोय जैसे महान साहित्यकार को नई पीढ़ी ठीक से समझ सके। यह अच्छी बात है कि हिंदी भाषी समाज ने अोय के बारे में अपने रूढ़ दृष्टिकोण को बदलने की कोशिश की है और उनके महत्व को ठीक से समझा है।


अंग्रेजपरस्त थे भारतेन्दु


हिंदू धर्म की तरह ही हिन्दी भाषा बिना देव पुरुषों के चल नहीं पाती। हिन्दी के सबसे बड़े देवपुरुष भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं। साहित्य में उनकी वही स्थिति है जो हिन्दू इतिहास में समझिए महाराणा प्रताप की है। दोनों जगह समान रूप से पूजनीय हैं, वामपंथी साहित्य के लिए भी और वामपंथ विरोधी साहित्य के लिए भी। लेकिन इससे भी ज्यादा दिलचस्प तथ्य यह है कि भारतेन्दु की महानता का बखान वामपंथी और वामपंथ विरोधी, दोनों ही समान उत्साह से करते हैं और कोई भी इस बात के लिए तैयार नहीं दिखता कि प्रशंसित लेखक पर थोड़ा तटस्थ, पूर्वाग्रहमुक्त, तार्किक नजरिए से भी विचार किया जाना चाहिए। डॉ राम विलास शर्मा जैसे वामपंथी आलोचक ने तो अत्यधिक उत्साह में आकर भारतेन्दु को साम्राज्यवाद विरोधी लेखक भी घोषित कर डाला था केवल एक पंक्ति के आधार पर-धन बिदेश चलि जात यही है ख्वारी। उन्होंने भारतेन्दु के उस विपुल लेखन की तरफ से पूरी तरह आंखें मूंद ली थीं, जिसमें भारतेन्दु ने अंग्रेज शासकों की न सिर्फ प्रशंसा की थी बल्कि उनके होने से देश का कल्याण होने की घोषणाएं की थीं। यहां हम इस बात की याद भी दिलाना चाहेंगे कि जिस समय भारतेन्दु भाषा और शिल्प के नजरिए को नितान्त स्तरहीन और लगभग बचकानी तुकबंदियां लिख रहे थे लगभग उसी कालखण्ड में उर्दू में बेहतरीन और विश्वस्तरीय कविता मीर, जौक और गालिब लिख रहे थे। भारतेन्दु के नाटक भी नाट्य रचना के इतिहास में कोई जगह नहीं बनाते अंधेर नगरी जैसे छोटे से प्रहसन के बावजूद। जिस वक्त वे रत्नावली, प्रेमयोगिनी, चन्द्रावली जैसे स्तरहीन नाटक लिख रहे थे, उस वक्त दुनिया में इब्सन और चेखव अपनी कालजयी रचनाएं दे चुके थे। लेकिन सबसे ज्यादा हैरान करने करने वाला पक्ष था भारतेन्दु की अंग्रेज भक्ति का। यह पक्ष लगभग शर्मिदा करने वाला है और इसके बावजूद हिंदी जगत इसकी पूरी उपेक्षा करता है तो आखिर क्यों? इसका बहुत हल्का सा जिक्र मैं पहले कर चुका हूं। यहां थोड़े विस्तार से हम देखेंगे कि भारतेन्दु की अंग्रेज भक्ति की वास्तविकता क्या थी? धन बिदेश चलि जात की मामूली सी टिप्पणी करने वाले भारतेन्दु ‘भारत राज राजेश्वरी नंदन युवराज कुमार प्रिंस ऑफ वेल्स के चरणों में’ कविता संग्रह समर्पित करते हैं। यह शुभ काम वे करते हैं प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आने पर। ड्यूक ऑफ एडिनबरा के बनारस आने पर वे उन्हें फूल नहीं दे पाए इससे दुखी होते हैं। वे साम्राज्यवाद विरोधी कभी नहीं थे। एडिनबरा के भारत आगमन पर उनका उछाह अपरिमित हैं- हे हे लेखनी मानिनी बनना उचित नहीं क्योंकि इस भूमि के नायक ने चिर समय के पीछे अपने प्यारी की सुध ली है। वह इस देश को एडिनबरा की लगभग रखैल ही बना देते हैं। भारतेन्दु की यह पक्की धारणा थी कि अंग्रेज इस देश के स्वामी हैं और उन्हीं के कारण भारत का कल्याण होना है। भारत शिक्षा कविता में वे लिखते हैं- ब्रिटिश सुशासित भूमि में आनंद उमगे जात। ध्यान रहे भारतेन्दु यह उद्भावना उस समय प्रकट कर रहे थे, जब बंगाल की नटी विनोदिनी अंग्रेजों के भयानक अत्याचार पर अपना नाटक ‘नील दर्पण’ लेकर देश में घूम रही थी। उस वक्त भारतेन्दु को देश ब्रिटिश सुशासित लग रहा था। गवर्नर जनरल लार्ड मेयो की अण्डमान के दौरे के दौरान एक कैदी ने उनकी हत्या कर दी। भारत के स्वाभिमान के लिए यह एक सुखद घटना थी लेकिन भारतेन्दु इससे शोकाकुल हुए-हे भारतवर्ष की प्रजा, अपने परम प्रेमरूपी अश्रुजल से उपराज्य अधीश का दर्पण करो। वह चाहते थे कि सारा देश रोए पर यह नहीं हुआ। इसके लिए वे देश को कोसते हैं-लोगों में राजभक्ति नहीं है। मुसलमानों के अत्याचार से यह राजभक्ति हिंदुओं से निकल गई। हाय देश को कैसा दुख हुआ। शेर अली के लिए भारतेन्दु कहते हैं कि उसे सूअर की खाल में लपेट कर मारा जाए। मैं नहीं जानता अगर भगत सिंह उनके समय में हुए होते तो भारतेन्दु उनके लिए क्या सजा तजवीज करते क्योंकि भगत सिंह ने उनके प्रिय अंग्रेज को मार डाला था। हैरानी है, अंग्रेजपरस्त भारतेन्दु के इस पक्ष पर हिन्दी की दुनिया चुप लगा जाती है ।

पर्वतों में फैली भारतीय संस्कृति


हिमालय से लेकर सह्याद्रि तक और गिरनार से लेकर कामरूप-कामाख्या तक फैले पर्वत भारतीय धर्म, संस्कृति और परंपरा से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं। डॉ. हरिकृष्ण देवसरे ने अपने ग्रंथ पर्वत गाथा में भारत के पर्वत, पर्वतीय जीवन, वहां की सभ्यता-संस्कृति और विकास को समेटा है

बलराम कहा जाता है कि दुनिया में अगर कहीं भी कुछ है तो वह महाभारत में है और जो महाभारत में नहीं है, वह कहीं नहीं है। इसी तरह हमारा भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां वह सब कुछ है जो दुनिया में कहीं भी पाया जाता है। गंगा, यमुना, नर्मदा और कावेरी जैसी नदियां और कहां हैं और कहां है हिंद महासागर की जलवायु? कहने का मतलब यह है कि जैव विविधता से लेकर प्रकृति तक भारत में सब कुछ दिव्य से दिव्यतम है। भारत का पर्वतराज हिमालय जैसा दुनिया में दूसरा पर्वत नहीं, जहां मानसरोवर जैसी दिव्य झील भी है। शायद इसीलिए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरिकृष्ण देवसरे ने पर्वत गाथा नाम से भारत के पर्वतों पर आधारित एक बड़ा ग्रंथ ही लिख डाला। डॉ. हरिकृष्ण देवसरे कहते हैं कि हिमालय से लेकर सह्याद्रि तक और गिरनार से लेकर कामरूप-कामाख्या तक फैले हमारे पर्वत भारतीय धर्म, संस्कृति और परंपरा से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं। हमारे ये पर्वत ऋषियों की तपोभूमि रहे हैं। इनमें देवताओं का निवास रहा है। प्राचीनकाल से ही पर्वत पूजनीय माने जाते हैं। समुद्र को भी केरल और कर्नाटक के लोग मां मानते हैं। हमारे पुराणों में पर्वतों का मानवीकरण तक कर दिया गया है। कहने का मतलब यह कि हमारे पुराण, इतिहास और साहित्य में पर्वतों का विस्तार से वर्णन हुआ है। हमारा अत्यंत निकटवर्ती संबंध रहा है पर्वतों से। पर्वत हैं तो हमारे देश को भरपूर वर्षा का पानी मिल रहा है, जिनसे हमारी नदियां सदानीरा बनी रहती हैं। वन हमें फल, फूल, जड़ी-बूटियां और लकड़ी ही नहीं देते, हमारे वन्य जीवन को शरण और संरक्षण भी देते हैं। खनिज संपदा भी हमें पर्वतों से प्राप्त होती है, जो हमारे लिए वरदान की तरह है। देश में जगह-जगह बिखरी पर्वत मालाओं की विस्तृत चर्चा के लिए ही शायद डॉ. हरिकृष्ण देवसरे ने पर्वत गाथा ग्रंथ लिखा है। भारत की चर्चा हो और हिमालय की चर्चा न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। हिमालय की चर्चा होगी तो भारत की पवित्र नदी गंगा की चर्चा भी जरूर होगी। इनकी चर्चा होगी तो केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की भी चर्चा होगी, जहां भारत की सभ्यता और संस्कृति फली-फूली। अमरनाथ की चर्चा के बिना भी भारत के पर्वतों की चर्चा अधूरी रह जाएगी। अरावली पर्वत श्रृंखलाएं अपने आगोश में हल्दी घाटी को छिपाए हुए हैं, तो कामदगिरि से चित्रकूट का आध्यात्मिक रिश्ता है। विंध्याचल पर्वत पर विंध्यवासिनी देवी विराजती हैं तो शेषाचल में तिरुपति मंदिर है। उधर, नीलाचल पर्वत की गोद में कामाख्या देवी विराजती हैं। अरुणाचल धुर पूरब में है तो गोव‌र्द्धन पर्वत से कृष्ण का गहरा लगाव रहा। कालिंजर, गिरनार, वराहगिर, सम्मेद शिखर, श्रवणवेल गोल, आबू पर्वत, अजंता-एलोरा की गुफाएं, राजगीर तथा पावागढ़ आदि हमारे देश के पर्वतों पर स्थित हैं और इनके बिना भारत के जीवन-जगत की कल्पना नहीं की जा सकती। इनके बिना भारत की सभ्यता-संस्कृति भी पनप नहीं सकती। माउंट एवरेस्ट नाम से लिखे गए अध्याय में डॉ. देवसरे बताते हैं कि अभी हम हिमालय की जिस सर्वोच्च चोटी को एवरेस्ट के रूप में जानते हैं, उसका जिक्र हमारे प्राचीन ग्रंथों में कहीं नहीं मिलता। गौरीशंकर और कंचनजंगा नाम मिलते हैं, मगर वहां एवरेस्ट कहीं नहीं है। नेपाल के लोग एवरेस्ट को सागरमाथा यानी विश्व जननी के नाम से पुकारते हैं तो भारत के लोग सरगमाथा यानी स्वर्ग का माथा कहने लगे हैं। तिब्बत के लोग एवरेस्ट को चोमूमूलुंगमा कहते हैं। वर्ष 1904 में कर्नल वेडन ने इसका तिब्बती नाम चोम कंकर लिखा तो 1907 में नत्था सिंह ने इसे छोलुंगबु लिखा। वर्ष 1909 में जनरल ब्रूस ने इसका तिब्बती नाम चोमो लुंगमो लिखा था तो 1921 में कर्नल हावर्ड बेरी ने एवरेस्ट का तिब्बती नाम चोमो उरी बताया था। वर्ष 1921 में हावर्ड ने ही एवरेस्ट का एक और नाम चोमो लुंगमा लिखा था। चोमो संस्कृत के गौरी का तिब्बती पर्याय है। कुल मिलाकर लगता यही है कि एवरेस्ट नाम विदेशियों का दिया हुआ है, जबकि इसका मूल नाम गौरी ही रहा होगा, गौरीशंकर भी। बर्फीली चोटियां कंचन की तरह चमक उठती हैं, जब सूर्य की किरणों से उनकी मुलाकात या फिर विदाई होती है। तब वह कंचनजंगा लगने लगती है। कुछ भी हो, अब उसे गौरीशंकर या कंचनजंगा की बजाय ज्यादातर लोग एवरेस्ट लगे हैं और नाम वही अच्छा लगने लगता है, जिसे दुनिया भर के लोग पुकारने लगते हैं। अग्नि पुराण में भारत के कुल सात पर्वत गिनाए गए हैं : महेंद्राचल, मलयगिरि, सह्याद्रि, शक्तिमान, हिमालय, विंध्याचल और परियात्र। मार्कडेय पुराण में भी सात ही पर्वत हैं। महेंद्र पर्वतमाला उड़ीसा में है। पश्चिमी घाटों का दक्षिणी हिस्सा मलयगिरि कहा जाता है। विंध्य पर्वतमाला खंभात की खाड़ी से पूर्व में राजमहल तक फैली है, जो देश को दो भागों में बांटती है। पहला भाग उत्तर भारत का गंगा का बेसिन है, तो दूसरा दकन का पठार कहलाता है। पश्चिम से पूर्व की ओर फैली यह पर्वतमाला मध्य भारत में काफी चौड़ी है। विंध्य पर्वत की श्रेणियां दक्षिण में नर्मदा घाटी के पास ढाई हजार फीट ऊंची दीवार की तरह और उत्तर की तरफ चौदह सौ फीट की ऊंचाई में खड़ी हैं। मुख्य शिखर लगभग दो हजार फीट ऊंचा है। यह ज्यादातर बलुआ पत्थरों का है, जिसमें कहीं-कहीं चूना पत्थर और शैल मिलते हैं। कुल मिलाकर, डॉ. हरिकृष्ण देवसरे अपनी कृति पर्वत गाथा से भारत के पर्वत ही नहीं, यहां का जीवन, यहां की सभ्यता-संस्कृति और विकास की धारा तक सभी आयामों से पाठक का परिचय करा देते हैं। किताब की भाषा पठनीय है जिसे पढ़ते हुए कथारस में डूबता हुआ पाठक पूरी किताब पढ़े बिना खुद को रोक नहीं सकता।