भाई लोगो, आपने इस तरह के जुमले तो सुने ही होंगे कि इतिहास माफ नहीं करेगा या इतिहास जवाब मांग रहा है। इस तरह के जुमले तो आपको अजीब नहीं लगते। फिर ठिठुरता इतिहास क्यों अजब लग रहा है? अब आप ही बताइए, जब इतिहास माफ नहीं करता या जवाब मांगता है तो फिर ठिठुर क्यों नहीं सकता! मान लें कि इतिहास भी संवेदनशील होता है इसलिए वो भी कापंता है, ठिठुरता है, सोचता है और नाराज वगैरह होता रहता है। तो अब आपके सामने पेश है ठिठुरते इतिहास का किस्सा।
दरअसल वो मुझे एक दिन साहित्य अकादेमी के पुस्तकालय में मिल गया। मैंने देखा कि किताबों की उन आलमारियों के साथ खड़ा कोई ठिठुर रहा था। ये भी गौर किया उस हालत में भी उसके मुंह से कभी सूरदास का ये पद निकल रहा था-ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं; तो कभी निराला का गीत ‘मैं अकेला...आ रही मेरे दिवस की सांध्य बेला...’ फिर उसकी कंपकपी बढ़ जाती और वो अचानक चुप हो जाता। मैंने महसूस किया कि इसकी कद काठी कुछ कुछ आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा तैयार हिंदी साहित्य का इतिहास से मिल जुल रही थी। चेहरे पर गांभीर्य पर साथ-साथ चिंता और थकान भी। फिर खट से लगा कि अरे, ये तो साक्षात वही है। हिंदी साहित्य का इतिहास।
मैंने पूछा, ‘भाई तुम यहां कैसे और इस तरह ठिठुर क्यों रहे हो? आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने तुम्हारी अच्छी कद-काठी तैयार की और तुम्हे हिंदी में मुकम्मल व्यक्तित्व दिया। इसलिए तुमको तो जोर से अपना शौर्य प्रदर्शित करना चाहिए। आखिर तुम हिंदी साहित्य और उसकी विरासत की पहचान हो।
वो बोला, ‘क्यों आप मेरी फजीहत कर रहे हैं! कैसी विरासत, कैसी पहचान? बेशक मैं रामचंद्र शुक्ल का शुक्रगुजार हूं। उसके बाद हजारी प्रसाद द्विवेदी का भी, लेकिन उन दोनों के बाद तो सिर्फ करुण रस होकर रह गया हूं। किसको परवाह है मेरी? अगर परवाह होती तो आज मेरे बारे में लिखा नहीं जाता। मेरे ऊपर सेमिनार या गोष्ठियां नहीं होती। मेरे ऊपर शोध नहीं किया जाता। मेरे बारे में किताबें नहीं लिखी जातीं। देखिए इन आलमारियों को। कोई नई किताब दिख रही है आपको मेरे बारे में!’
अचानक लगा कि मुझे जोर का झटका लगा है। सचमुच वहां पर जो किताबें थीं उसमें हिंदी साहित्य के इतिहास पर कोई नई किताब नहीं थी। फिर ध्यान आया कि सचमुच पिछले तीस-चालीस साल में हिंदी साहित्य के इतिहास पर किताबें नहीं के बराबर लिखी जाती हैं। एक जमाना था जब हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास या हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास जैसी किताबें भी लिखी जाती थीं, जो पहले दर्जे की भले न हों पर दोयम दर्जे की तो थीं। आजकल तो वैसी किताबें भी नहीं आतीं। क्या हिंदी भाषी समाज में अपने साहित्य को लेकर दिलचस्पी खत्म हो चुकी है, लग तो यही रहा था। इतिहास ठिठुर रहा था और मैं स्तब्ध था।
मुझे सोचते देख कर ठिठुरता और कांपता हुआ इतिहास तैश में आ गया और बोलने लगा, ‘पूरी दुनिया में इतिहास के बारे में पढ़ा और लिखा जा रहा है। लेकिन हिंदी में तो इतिहास का अंत हो गया है। कहने को तो हिंदी में अमेरिका के खिलाफ काफी कुछ लिखा जाता है। लेकिन हिंदी के विद्वानों ने तो अमेरिकी प्रोफेसर फ्रांसिस फुकुयामा की स्थापना इतिहास का अंत को गांठ बांधकर अपना लिया है। हालांकि फुकुयामा का सिद्धांत अमेरिका में ही पिट गया। लेकिन हिंदी के आचार्य और विद्वान तो अपने समय से कम से कम तीस साल पीछे रहते हैं। इसलिए उनको आज दुनिया में क्या हो रहा है इसकी ही खबर नहीं है। अगर ऐसा नहीं होता को कम से कम इक्सीसवीं सदी के दस साल बीत जाने के बाद भी बीसवीं सदी के हिंदी साहित्य के इतिहास पर कोई तो किताब आती। दुनिया भर में इतिहास पर तरह-तरह के शोध हो रहे हैं पर मेरे बारे में क्या रहा है?’ मैंने देखा कि इतना बोलने के बाद क्लांत इतिहास चुप हो गया। उसके बाद वो एक वाक्य बोला, ‘क्या कोई दूसरा रामचंद्र शुक्ल हिंदी में पैदा होगा?’ वो फिर से ठिठुरने लगा। अब उसकी ठिठुरन ज्यादा बढ़ गई थी।
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