आधुनिक और बीसवीं सदी की हिंदी कविता में शमशेर का स्थान अन्यतम है इससे किसी को इनकार नहीं हो सकता। इस समय उनकी जन्मशती चल रही है कम ही लोग जानते होंगे कि शमशेर कवि के अलावा पेंटर भी थे। हालांकि बतौर पेंटर या कलाकार शमशेर की शोहरत ज्यादा नहीं रही लेकिन उनकी कविता में रंगों की एक खास उपस्थिति है जिसे समझने के लिए कला या पेंटिंग की संवेदना भी चाहिए। मिसाल के लिए शमशेर बहादुर सिंह ने अपनी कविता में प्रात:काल के नभ यानी आकाश के रंग को जिस तरह पकड़ा था, उसके लिए दो चीजें सामने आती हैं। एक तो यह कि उनमें किस तरह भाषा के प्रति कोमल सजगता थी और दूसरे उनमें रंगों के प्रति कैसा मसृण आकषर्ण था। शमशेर अपनी कविता में भाषा को कूची की तरह भी इस्तेमाल करते थे और एक दृश्यात्मक बिंब रच देते थे। यह किसी कवि की बिबंधर्मिंता भर नहीं थी बल्कि दृश्य के प्रति एक कलाकार की दृष्टि भी थी। आशा की जानी चाहिए कि शमशेर के जन्मशती वर्ष में उनकी कविता, उनके भीतर निहित चित्रात्मकता और उनके कलाकार व्यक्तित्व के अंत:र्सबंध पर अंतर्दृष्टि संपन्न अध्ययन होगा। ऐसे समय में जब कई संस्थाएं और लोग शमेशर की याद में कई तरह के आयोजन में जुटे हैं, हिंदी की कवयित्री तेजी ग्रोवर ने शमशेर-स्मृति में अपनी कलाकृतियों की एक प्रदशर्नी की। दिल्ली के अकादेमी ऑफ फाइन आर्ट्स में प्रदर्शित इस प्रदशर्नी में अन्य लोगों के अलावा वरिष्ठ भारतीय कलाकार रजा भी मौजूद थे। रजा लंबे समय तक पेरिस में रहने के बाद अब भारत लौट आए हैं और कहा जा रहा है कि बाकी जिंदगी यहीं गुजारेंगे।
तेजी ग्रोवर अपने में कई तरह की सर्जनात्मक प्रतिभाएं समेटे हैं। वह हिंदी की चर्चित कवयित्री हैं, बहुत अच्छी अनुवादक हैं और साथ ही कलाकार भी। शिक्षा और पर्यावरण के मुद्दों पर वह लंबे अरसे से सक्रिय रही हैं। तेजी मध्यप्रदेश के गावों में घूम-घूम कर पेंटिंग की कार्यशालाएं आयोजित करती हैं और बच्चों को सिर्फ पेंटिंग करना ही नहीं बल्कि रंग बनाना भी सिखाती हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है और विस्थापन के प्रश्न को भी वह शिद्दत से उठाती रही हैं। तेजी ने कला और पर्यावरण के मुद्दे को भी अपनी रचनात्मकता से जोड़ा है। वे अपनी पेंटिग्स में प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करती हैं। प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल के पीछे तेजी की पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता जाहिर होती है। नर्मदा के तीर रहनेवाली तेजी का यह भी मानना है कि रासायनिक रंगों का इस्तेमाल पर्यावरण और प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता का परिचायक है। प्रकृति हमें अपने तरीके से रचनात्मक होना सिखाती है। वह हमें सिर्फ देखने या पेंटिंग करने के लिए लैंडस्केप नहीं देती बल्कि उसके चितण्रके लिए रंग भी देती है, बशर्ते आप उसके लिए तैयारी करें। जामुन की छाल से भी रंग बन सकता है और पलाश के फूलों से भी। जो पलाश आपको इतने सुंदर फूल देता है वही रंग भी देता है। यह जरूरी नहीं कि आप रंग खरीदने बाजार ही जाएं। आप अपनी रसोई में भी रंग तैयार कर सकते हैं। उनकी मौजूदा प्रदशर्नी में भी अनार के छिलके और लोहे की जंग से बने रंगों और पिगमेंट से बनी कलाकृतियां प्रदर्शित हैं। इन कलाकृतियों में किसी तरह की आकृतिमूलता या अमूर्तता नहीं है। तेजी प्राकृतिक रंगों के अक्सों और आशयों को दिखाती हैं। उनकी कलाकृतियां बिबों और रंगों का संयोजन हैं। इनके रंग चटख या शोख नहीं हैं। शमशेर बहादुर सिंह की भाषा का प्रयोग करते हुए कहें तो इन कलाकृतियों में एक ‘रंगीन कोमलता’ है। जाहिर है, ऐसी प्रदशर्नी की सार्थकता शमशेर बहादुर सिंह की याद में ही हो सकती है।
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