गत 16 फरवरी को विश्वनाथ त्रिपाठी का 80 वां जन्म दिवस था। विश्वनाथ त्रिपाठी यानी हिंदी के मूर्धन्य आलोचक और ‘बंतातलाई का गांव’ जैसी आत्मकथात्मक गद्य कृति के रचयिता। त्रिपाठी जी जन्म दिवस मनाने जैसी औपचारिकताओं से गरिष्ठ खाद्य की तरह परहेज करते हैं मगर उनका डीयर पार्क इस बार ठाने बैठा था। डीयर पार्क यानी दिल्ली की दिलशाद गार्डन कालोनी का वह पार्क जहां त्रिपाठी जी नियमत: घूमने जाते हैं और जिसके बारे में रमेश आजाद ने लिखा है- मैंने ऐसा किसी को नहीं देखा/ जो दिलशाद गार्डन में रहता हो/ और जिसने डीयर पार्क न देखा हो/ जिसने नहीं देखा डीयर पार्क/वह दिलशाद गार्डन में नहीं रहता/..यों तो कविताओं का/ कहानियों का सिरा/यहां तलाश जाता है/ आलोचना के बीज भी यहां/ अंकुरित होते हैं/ समीक्षाएं तो छिटपुट चायवाला/पान वाला भी करता है/ अखबारों के कुछ कॉलम यहां/ इन्हीं चक्करों के बीच रचे जाते हैं/ जिसने डीयर पार्क देखा है/ और दिलशाद गार्डन में रहता है/ वह जानता है इन्हें..। दिलशाद गार्डन और आसपास की कालोनियों में रहने वाले लेखक-पत्रकार-कवि-संपादक इस नाचीज सहित नियमित, अनियमित तौर पर डीयर पार्क अवश्य आते हैं-प्रात: भ्रमण के लिए अथवा इसके बहाने उस बतकही का आनंद लेने जिसके केंद्रीय सूत्रधार हमेशा त्रिपाठी जी होते हैं। उनकी मेधा, उनकी अदभुत स्मरण शक्ति और संस्मरणों का महासागर हम सबको चमत्कृत करता है। जब वह अपने इस महासागर से अंजुरी-अंजुरी संस्मरण जल छींटते हैं तो बाकी लोगों का काम आनंद से सुनने या बीच-बीच में ठेक भर देने का होता है। चाहे व्यक्ति का गोपन जीवन हो या उजागर साहित्यिक जीवन, ऐसा कोई कोना नहीं जिसका प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष अनुभव त्रिपाठी जी के पास न हो और ऐसा कोई नहीं जिसके समर्थन में किसी बड़े कवि-आलोचक-साहित्यकार-शायर का कोई संस्मरण या उद्धरण उनके पास न हो। फिर बतकही का वह अंदाज कि हास्य से श्रृंगार तक हर रस बरबस बरसता रहे। जब डीयर पार्क की गोष्ठियों की विषय वस्तु इधर से उधर ठुमकती है तो यह पल स्थानिक-पल वैश्विक होती रहती है। भारतेंदु मिश्र की पंक्तियां हैं-रविवासरीय बैठकी चलती है लंबी/ बतरस लूटते हैं सब अपने ढंग से/ झांकते हैं समस्याओं में अपनी तरंग से/ डूबकर नहाते हैं निंदा के लाल में/ सभी मगन रहते हैं लेकिन हर हाल में/ अक्सर प्रकट होते हैं/ टॉलस्टॉय-गालिब-निराला/कबीरतु लसी-शेक्सपियर/ जोश-शमशेर- नागाजरुन/ तो कभी उतर आते हैं कालिदास-वाणभट्ट/और शूद्रक, इस बतकही से बिखर जाती है पुनर्नवा घास/पुनर्नवा के साथ जी उठते हैं/ आचार्य प्रवर हजारी प्रसाद द्विवेदी/गुरुवर जो ठहरे बिसनाथ (विश्वनाथ त्रिपाठी) के/ रामविलास शर्मा-केदारनाथ अग्रवाल-त्रिलोचन/ सभी प्रकट होते हैं, प्रसंगवश लगता है पान खाये बैठे हैं/पास में नामवर/ और पाइप सुलगा रहे हैं/ काला चश्मा चढ़ाए राजेन्द्र यादव..। ‘कथादेश’ के संपादक हरिनारायण कहते हैं- यहां की साहित्यिक र्चचाएं बड़ी ही सार्थक और ज्ञानवर्धक होती हैं। त्रिपाठी जी अपने अनुभवों को खुले दिल से बांटते हैं। यह डीयर पार्क (आने वालों) की बड़ी उपलब्धि है कि हिंदी के प्रकाश स्तंभ विश्वनाथ त्रिपाठी यहां आते हैं। स्वयं त्रिपाठी जी कॉफी हाऊसों और चाय की दुकानों में साहित्यिक बैठकियों का स्मरण करते हुए वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करते हैं- ये इकानॉमिक रिफॉर्म इतना बड़ा शत्रु सांस्कृतिक गतिविधियों का बना है कि लोगों के पास आपस में मिलने का समय ही नहीं रह गया है। हर आदमी मोबाइल से बात कर रहा है, इंटरनेट से बात कर रहा है या टीवी देख रहा है। ये जो व्यक्तिवाद है इतना पृथकतावादी है कि सबको अलग-थलग कर देता है।..लेकिन डीयर पार्क का हमारा यह स्वैच्छिक मिलन चल रहा है..दस साल, पंद्रह साल, बीस साल हो गये अभी तक ये साहित्य मंडल डीयर पार्क का बना हुआ है। तो डीयर पार्क का यह साहित्य मंडल त्रिपाठी जी का जन्मदिन मनाने का मन बनाए हुए था। मनावन स्थल था स्वयं डीयर पार्क। त्रिपाठी जी को साग्रह और साधिकार मना लिया गया था कि वह समय से पहुंच जाएं। लेकिन सोलह फरवरी से ऐन दो दिन पहले से जो बारिश शुरू हुई वह उस दिन की सुबह तक चलती रही। मगर निर्धारित समय से पहले बारिश थम गयी, आसमान खुल गया और पार्क की हरीतिमा जैसे नहा धोकर उत्सव में हमारे साथ शामिल हो गयी। हरि नारायण, रामकुमार कृषक, बलराम अग्रवाल, भारतेंदु मिश्र, अशोक गुजराती, रमेश आजाद, रमेश प्रजापति, जय कृष्ण, काजल पांडे, कमलेश, अंगद तिवारी, जयशंकर शुक्ल आदि लोग समय पर उपस्थित थे। पार्क के कुछ अन्य नियमित सदस्य भी स्वेच्छा उत्सव के हिस्सा बन गये। कोई तामझाम नहीं, कोई औपचारिक आडंबर नहीं। त्रिपाठी जी आये तो सभी ने गेंदे के फूल की मालाएं जरूर उन्हें पहिना दीं। सभी का संक्षिप्त सा संस्मरणात्मक प्रशस्तिवाचन और फिर त्रिपाठी जी की बतकही। और समापन में शहादरे की बालूशाही और पार्क के कोने में चाय का ढाबा चलाने वाले लड़के की चाय। बस इतना-सा, मगर बेहद आत्मीयता भरा उत्सव। हां, इस अवसर पर पार्क मंडल के सदस्यों के संस्मरणात्मक आलेखों, साक्षात्कारों, कविताओं, कहानियों के भारतेंदु मिश्र द्वारा संपादित संकलन ‘बतकही’ का विमोचन भी त्रिपाठी जी ने किया। मेरे यहां दिये उद्धरण इसी संकलन से लिए गए हैं। इस संक्षिप्त उत्सव के दौरान अरुण प्रकाश बहुत याद आये जो कभी पार्क मंडल के प्रिय सदस्य हुआ करते थे मगर अब दिलशाद गार्डन में नहीं रहते। कथाकार विजय भी ऐसे ही कारण से नहीं आ सके। राजेन्द्र नागदेव भोपाल जा बसे हैं। कुछ अन्य साथियों की उपस्थिति भी संभव नहीं हो सकी। फिर भी रमेश प्रजापति के शब्दों में-तमाम विद्रूपताओं के बावजूद/ गनीमत है कि /सही सलामत घूम रही है धरती/ अपनी धुरी पर/ दिशाएं टिकी हैं अपनी जगह पर/ पेड़ गा रहे हैं हरियाली का गीत/ आदमी के स्वप्न में चहक रही हैं चिड़ियाएं/और अपनी सौम्यता के साथ/ गुनगुना रहा है अब भी। दिलशाद गार्डन का डीयर पार्क।..और हमारे मुंह में त्रिपाठी जी के जन्मदिवस की बालूशाही का स्वाद घुला हुआ था।
Sunday, February 20, 2011
डीयर पार्क में विश्वनाथ त्रिपाठी और बालूशाही
गत 16 फरवरी को विश्वनाथ त्रिपाठी का 80 वां जन्म दिवस था। विश्वनाथ त्रिपाठी यानी हिंदी के मूर्धन्य आलोचक और ‘बंतातलाई का गांव’ जैसी आत्मकथात्मक गद्य कृति के रचयिता। त्रिपाठी जी जन्म दिवस मनाने जैसी औपचारिकताओं से गरिष्ठ खाद्य की तरह परहेज करते हैं मगर उनका डीयर पार्क इस बार ठाने बैठा था। डीयर पार्क यानी दिल्ली की दिलशाद गार्डन कालोनी का वह पार्क जहां त्रिपाठी जी नियमत: घूमने जाते हैं और जिसके बारे में रमेश आजाद ने लिखा है- मैंने ऐसा किसी को नहीं देखा/ जो दिलशाद गार्डन में रहता हो/ और जिसने डीयर पार्क न देखा हो/ जिसने नहीं देखा डीयर पार्क/वह दिलशाद गार्डन में नहीं रहता/..यों तो कविताओं का/ कहानियों का सिरा/यहां तलाश जाता है/ आलोचना के बीज भी यहां/ अंकुरित होते हैं/ समीक्षाएं तो छिटपुट चायवाला/पान वाला भी करता है/ अखबारों के कुछ कॉलम यहां/ इन्हीं चक्करों के बीच रचे जाते हैं/ जिसने डीयर पार्क देखा है/ और दिलशाद गार्डन में रहता है/ वह जानता है इन्हें..। दिलशाद गार्डन और आसपास की कालोनियों में रहने वाले लेखक-पत्रकार-कवि-संपादक इस नाचीज सहित नियमित, अनियमित तौर पर डीयर पार्क अवश्य आते हैं-प्रात: भ्रमण के लिए अथवा इसके बहाने उस बतकही का आनंद लेने जिसके केंद्रीय सूत्रधार हमेशा त्रिपाठी जी होते हैं। उनकी मेधा, उनकी अदभुत स्मरण शक्ति और संस्मरणों का महासागर हम सबको चमत्कृत करता है। जब वह अपने इस महासागर से अंजुरी-अंजुरी संस्मरण जल छींटते हैं तो बाकी लोगों का काम आनंद से सुनने या बीच-बीच में ठेक भर देने का होता है। चाहे व्यक्ति का गोपन जीवन हो या उजागर साहित्यिक जीवन, ऐसा कोई कोना नहीं जिसका प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष अनुभव त्रिपाठी जी के पास न हो और ऐसा कोई नहीं जिसके समर्थन में किसी बड़े कवि-आलोचक-साहित्यकार-शायर का कोई संस्मरण या उद्धरण उनके पास न हो। फिर बतकही का वह अंदाज कि हास्य से श्रृंगार तक हर रस बरबस बरसता रहे। जब डीयर पार्क की गोष्ठियों की विषय वस्तु इधर से उधर ठुमकती है तो यह पल स्थानिक-पल वैश्विक होती रहती है। भारतेंदु मिश्र की पंक्तियां हैं-रविवासरीय बैठकी चलती है लंबी/ बतरस लूटते हैं सब अपने ढंग से/ झांकते हैं समस्याओं में अपनी तरंग से/ डूबकर नहाते हैं निंदा के लाल में/ सभी मगन रहते हैं लेकिन हर हाल में/ अक्सर प्रकट होते हैं/ टॉलस्टॉय-गालिब-निराला/कबीरतु लसी-शेक्सपियर/ जोश-शमशेर- नागाजरुन/ तो कभी उतर आते हैं कालिदास-वाणभट्ट/और शूद्रक, इस बतकही से बिखर जाती है पुनर्नवा घास/पुनर्नवा के साथ जी उठते हैं/ आचार्य प्रवर हजारी प्रसाद द्विवेदी/गुरुवर जो ठहरे बिसनाथ (विश्वनाथ त्रिपाठी) के/ रामविलास शर्मा-केदारनाथ अग्रवाल-त्रिलोचन/ सभी प्रकट होते हैं, प्रसंगवश लगता है पान खाये बैठे हैं/पास में नामवर/ और पाइप सुलगा रहे हैं/ काला चश्मा चढ़ाए राजेन्द्र यादव..। ‘कथादेश’ के संपादक हरिनारायण कहते हैं- यहां की साहित्यिक र्चचाएं बड़ी ही सार्थक और ज्ञानवर्धक होती हैं। त्रिपाठी जी अपने अनुभवों को खुले दिल से बांटते हैं। यह डीयर पार्क (आने वालों) की बड़ी उपलब्धि है कि हिंदी के प्रकाश स्तंभ विश्वनाथ त्रिपाठी यहां आते हैं। स्वयं त्रिपाठी जी कॉफी हाऊसों और चाय की दुकानों में साहित्यिक बैठकियों का स्मरण करते हुए वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करते हैं- ये इकानॉमिक रिफॉर्म इतना बड़ा शत्रु सांस्कृतिक गतिविधियों का बना है कि लोगों के पास आपस में मिलने का समय ही नहीं रह गया है। हर आदमी मोबाइल से बात कर रहा है, इंटरनेट से बात कर रहा है या टीवी देख रहा है। ये जो व्यक्तिवाद है इतना पृथकतावादी है कि सबको अलग-थलग कर देता है।..लेकिन डीयर पार्क का हमारा यह स्वैच्छिक मिलन चल रहा है..दस साल, पंद्रह साल, बीस साल हो गये अभी तक ये साहित्य मंडल डीयर पार्क का बना हुआ है। तो डीयर पार्क का यह साहित्य मंडल त्रिपाठी जी का जन्मदिन मनाने का मन बनाए हुए था। मनावन स्थल था स्वयं डीयर पार्क। त्रिपाठी जी को साग्रह और साधिकार मना लिया गया था कि वह समय से पहुंच जाएं। लेकिन सोलह फरवरी से ऐन दो दिन पहले से जो बारिश शुरू हुई वह उस दिन की सुबह तक चलती रही। मगर निर्धारित समय से पहले बारिश थम गयी, आसमान खुल गया और पार्क की हरीतिमा जैसे नहा धोकर उत्सव में हमारे साथ शामिल हो गयी। हरि नारायण, रामकुमार कृषक, बलराम अग्रवाल, भारतेंदु मिश्र, अशोक गुजराती, रमेश आजाद, रमेश प्रजापति, जय कृष्ण, काजल पांडे, कमलेश, अंगद तिवारी, जयशंकर शुक्ल आदि लोग समय पर उपस्थित थे। पार्क के कुछ अन्य नियमित सदस्य भी स्वेच्छा उत्सव के हिस्सा बन गये। कोई तामझाम नहीं, कोई औपचारिक आडंबर नहीं। त्रिपाठी जी आये तो सभी ने गेंदे के फूल की मालाएं जरूर उन्हें पहिना दीं। सभी का संक्षिप्त सा संस्मरणात्मक प्रशस्तिवाचन और फिर त्रिपाठी जी की बतकही। और समापन में शहादरे की बालूशाही और पार्क के कोने में चाय का ढाबा चलाने वाले लड़के की चाय। बस इतना-सा, मगर बेहद आत्मीयता भरा उत्सव। हां, इस अवसर पर पार्क मंडल के सदस्यों के संस्मरणात्मक आलेखों, साक्षात्कारों, कविताओं, कहानियों के भारतेंदु मिश्र द्वारा संपादित संकलन ‘बतकही’ का विमोचन भी त्रिपाठी जी ने किया। मेरे यहां दिये उद्धरण इसी संकलन से लिए गए हैं। इस संक्षिप्त उत्सव के दौरान अरुण प्रकाश बहुत याद आये जो कभी पार्क मंडल के प्रिय सदस्य हुआ करते थे मगर अब दिलशाद गार्डन में नहीं रहते। कथाकार विजय भी ऐसे ही कारण से नहीं आ सके। राजेन्द्र नागदेव भोपाल जा बसे हैं। कुछ अन्य साथियों की उपस्थिति भी संभव नहीं हो सकी। फिर भी रमेश प्रजापति के शब्दों में-तमाम विद्रूपताओं के बावजूद/ गनीमत है कि /सही सलामत घूम रही है धरती/ अपनी धुरी पर/ दिशाएं टिकी हैं अपनी जगह पर/ पेड़ गा रहे हैं हरियाली का गीत/ आदमी के स्वप्न में चहक रही हैं चिड़ियाएं/और अपनी सौम्यता के साथ/ गुनगुना रहा है अब भी। दिलशाद गार्डन का डीयर पार्क।..और हमारे मुंह में त्रिपाठी जी के जन्मदिवस की बालूशाही का स्वाद घुला हुआ था।
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