Sunday, February 20, 2011

प्रवासी हिन्दी कलम की पीड़ा


इस सच्चाई से किसी को आपत्ति नहीं होगी कि प्रवासी हिन्दी लेखक अपने साथ भिन्न-भिन्न अनुभव, आयाम, आस्वाद और मिजाज लेकर हिन्दी साहित्य की सेवा कर रहे हैं और उन्होंने भारत की भौगोलिक सीमाओं के बाहर इसके प्रचार, प्रसार को विस्तारित किया है। प्रवासी लेखकों ने इसे सही अर्थों में अन्तरराष्ट्रीय बनाया है
कवि श्रीकांत वर्मा ने लिखा था, ‘मैं समूचा विश्व होना चाहता हूं।कवि की इस पंक्ति से कविता का जो घर बनता है, वह न केवल बहुत बड़ा है बल्कि उसकी संवेदना के केन्द्र में पूरी दुनिया समा जाती है, उसी तरह जिस तरह त्रिलोचन की कविता मेरा घरमें। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत डॉ लक्ष्मीमल सिंघवी ने अपने देश के प्रवासियों को भारतवंशीनाम दिया और इंग्लैंड में उच्चायुक्त रहते हुए हिन्दी के प्रवासी साहित्य को एक आंदोलन के रूप में बदलकर उसके विकास के अनेक द्वार खोले। उनकी अध्यक्षता में ही डायस्पोरा रिपोर्ट तैयार हुई और दिल्ली में 9 से 11 जनवरी, 2003 को पहला प्रवासी भारतीय दिवसआयोजित हुआ। इस पहल से स्वतंत्रता के 55 वर्षो बाद भारतीय प्रवासियों के साथ प्रवासी साहित्य एवं संस्कृति के प्रति देश में नई संवेदना एवं चेतना का उदय हुआ। भारत सरकार तथा राज्य सरकारें डायस्पोरा का उपयोग प्रवासी भारतीयों को देश के उद्योग एवं तकनीकी विकास के साथ जोड़ने के रूप में करने पर बल दे रही हैं, किन्तु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इन आर्थिक उपादानों और तकनीकी विकास में कहीं भाषा, साहित्य और संस्कृति के सरोकार ही ओझल न हो जाएं तथा अमेरिका-इंग्लैंड आदि देशों के धनी प्रवासी इतने प्रभुत्ववान न हो जाएं कि विदेशों में रह रहे लेखकों का भारतवंशी समाज तथा उनका साहित्य उपेक्षणीय बन जाए। डॉ. कमल किशोर गोयनका के अनुसार हिन्दी के प्रवासी साहित्य की पृष्ठभूमि आज के भूमंडलीकरण से लगभग सौ वर्ष पुरानी है जब व्यापार और बाजारवाद नहीं बल्कि जीवन की भयानक यातनाओं और त्रासदियों के बीच मरते-मरते जीना था। तब अपने हिन्दू धर्म, संस्कृति और भोजपुरी हिन्दी भाषा के साथ अपनी भारतीयता और भारतीय अस्मिता को बचाकर रखना था। हिन्दी के प्रवासी साहित्य का कई दृष्टियों से महत्व है। उसे अब हाशिए पर रखना साहित्यिक अपराध होगा क्योंकि इस साहित्य ने हिन्दी को एक नया भावबोध, एक नयी संवेदना, नयी चेतना तथा नया रचना संसार दिया है। डॉ. सुषम बेदी ने लिखा है कि प्रवासी साहित्य की यात्रा बहुत लंबी है और पड़ाव दूर है, परन्तु इतना सच है कि प्रवासी साहित्य अपनी पहचान यात्रा पर चल चुका है और पड़ाव भी कुछ दिखायी दे रहा है। डॉ. बेदी चाहती हैं कि प्रवासी लेखक गवरेक्तियों से बचें और आत्मान्वेषण करें, लेकिन भारत के हिन्दी समाज को भी प्रवासी साहित्य के प्रति अपने उपेक्षा भाव को समाप्त करके उसकी आंतरिक शक्ति का अन्वेषण करना होगा, तभी प्रवासी हिन्दी साहित्य की यात्रा अपने लक्ष्य तक पहुंच सकेगी। कमोबेश ऐसा ही मानना है कहानीकार और कथा यूके के महासचिव तेजेंद्र शर्मा का। उन्होंने डीएवी कालेज फॉर गर्ल्स, यमुनानगर (हरियाणा) और कथा यूके के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित तीन दिवसीय (10-12 फरवरी, 2011) अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में कहा कि विदेशों में आज जो साहित्य रचना हो रही है, उसे यहां का ही साहित्य माना जाना चाहिए। लेकिन उनके साहित्य को प्रवासी साहित्य का नाम दिया जा रहा है। मुख्यधारा के लेखकों में प्रवासी लेखकों का नाम नहीं लिया जाता। विदेश में लिखे गए साहित्य को प्रवासी साहित्य का नाम देकर एक पैरा में निपटा ही नहीं दिया जाता बल्कि उनके बारे में मिथक और भ्रम भी फैलाया जाता है। उनकी बात से असहमत होने की गुजांइश ही नहीं बचती है क्योंकि भूमंडलीकरण एक आसमान की तरह है। यह बाजार के लिए बहुत उपयोगी हो सकता है। हम एक-दूसरे के बारे में बहुत सी जानकारियां प्राप्त कर सकते हैं। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में लेखक की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं। दुनिया जितना सिकुड़ रही है, लेखक की जिम्मेदारी बढ़ रही है। आज वह अपने क्षेत्र तक ही सीमित नहीं बल्कि पूरी दुनिया के दुख-दर्द सामने लाना उसका कर्तव्य हो गया है। तमाम इमारतें मिट जाती हैं लेकिन बड़े रचनाकारों की लिखी रचनाएं कभी खत्म नहीं होती। सवाल यह उठता है कि क्या प्रवासी हिन्दी लेखन घिसा-पिटा है। उसमें नवीनता का उन्मेष नहीं है। क्या वह भारत में लिखे जा रहे हिन्दी साहित्य से इतना कमतर है कि उसकी र्चचा भी न हो ? क्या उसको भी स्त्री लेखन, दलित लेखन आदि की तरह दोयम श्रेणी में आरक्षित कर दिया जाना चाहिए ? मुझे लगता है कि देश या विदेश में रह रहे लेखकों ने प्रवास की पीड़ा को झेला है क्योंकि आज वह जहां रह रहा है अपने गांव, देहात, कस्बे से दूर नगर, महानगर या फिर विदेश में-अपने आर्थिक संरक्षण के लिए अपनी जड़ों से कटे रहने के लिए विवश है। इसलिए केवल विदेश में रहने वाले लेखकों को ही प्रवासी मानकर उपेक्षित नहीं किया जाना चाहिए बल्कि हर उस लेखक को प्रवासी समझा जाना चाहिए जो अपनी जड़ो से कट गया है। जब तक आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में प्रवासी भारतीय लेखन को शामिल नहीं किया जाएगा तब तक वह हमारी पीढ़ी की धरोहर नहीं बन सकता। दुखद सच्चाई यह भी है कि प्रवास में एक भारतीय रचनाकार दो संस्कृतियों की दो किस्म के मूल्यों की ऐसी सनसनाहट भरी सरहद पर खुद को पाता है जिसके एक तरफ के भूगोल पर विधि निषेध के दंड लिए अपने सामाजिक संस्कार, सगेपन को बहिष्कृत करने की धमकी भरी मुद्रा में डराने को खड़े होते हैं तो दूसरी तरफ अनजाना परिवेश आपको अपने परिचय का आमंतण्रदेने को हाजिर। इस सच्चाई से किसी को आपत्ति नहीं होगी कि प्रवासी हिन्दी लेखक अपने साथ भिन्न अनुभव, आयाम, आस्वाद और मिजाज लेकर हिन्दी साहित्य में आये हैं और इस तरह उन्होंने भारत की भौगोलिक सीमाओं के बाहर इसके प्रचार, प्रसार और अभिगम को विस्तारित किया है। हमारे प्रवासी लेखकों ने इसे सही अर्थों में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित दर्जा दिलाया है। तीन दिवसीय इस संगोष्ठी में ब्रिटिश लेबर पार्टी की काउंसलर जकीया जुबैरी ने कहा कि प्रवासी साहित्यकारों को अगर दीवाना कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि वे दिनभर अंग्रेजी परिवेश और भाषा में काम करते हैं, इसके बावजूद हिन्दी में रचनाएं लिख रहे हैं। उन्होंने आम भारतीय पाठकों से अपील की कि उनके साहित्य को पाउंड में न तौलें। प्रवासी साहित्य की भी आलोचना होनी चाहिए ताकि उनका साहित्य और ज्यादा निखर कर सामने आ सके। कनाडा से आई स्नेह ठाकुर का कहना था कि हिन्दी के साथ कलम का ही नहीं अपितु दिल का भी रिश्ता है। हम जब भी कलम उठाते हैं, तो हिन्दी का ही साहित्य लिखते हैं। बावजूद इसके हमें प्रवासी कहकर पुकारा जा रहा है। हिन्दी के साथ हमारी संवेदनाएं जुड़ी हुई हैं। हिन्दी व हिंदुस्तान के लिए इतना करने के बावजूद भी हम प्रवासी ही हैं। अब तो प्रवासी सुनना बड़ा कटु लगता है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रतिष्ठित कथाकार एवं हंसके संपादक राजेन्द्र यादव ने एक तरह से प्रवासी साहित्य की परिभाषा ही तय कर दी। उन्होंने कहा कि प्रवास का दर्द झेलना आज के दौर में मनुष्य की नियति है। यह दर्द कोई विदेश में जाकर झेलता है तो बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिन्हें देश के अंदर ही यह पीड़ा झेलनी पड़ती है। इन अथोर्ं में प्रवासन सिर्फ विदेश में रह रहे लोगों का दर्द ही नहीं है। अंतत: इतना ही कहना है कि विदेश में भले ही हिन्दी प्रेमी इसके संरक्षण संवर्धन के लिए प्रयासरत दिखते हो लेकिन देश में हिन्दी की स्थिति बहुत संतोषजनक नजर नहीं आती। हाल में दिल्ली में आयोजित साहित्य अकादेमी वार्षिक पुरस्कार अर्पण समारोह में हिन्दी की स्थिति देखकर अफसोस ही किया जा सकता है। इसे क्या कहा जाए कि देश की राजधानी में आयोजित हिन्दी अकादेमी के समारोह में जहां अंग्रेजियत हावी दिखी वहीं दूसरी ओर ब्रिटेन जैसे देश में कथा यूके के मंच से आयोजित कार्यक्रम पूरी तरह हिन्दी में ही सम्पन्न करने का प्रयास किया जाता रहा है। हिंदी के भविष्य के संबंध में प्रवासी लेखकों की यह पीड़ा भी कम विचारणीय नहीं।


डीयर पार्क में विश्वनाथ त्रिपाठी और बालूशाही


गत 16 फरवरी को विश्वनाथ त्रिपाठी का 80 वां जन्म दिवस था। विश्वनाथ त्रिपाठी यानी हिंदी के मूर्धन्य आलोचक और बंतातलाई का गांवजैसी आत्मकथात्मक गद्य कृति के रचयिता। त्रिपाठी जी जन्म दिवस मनाने जैसी औपचारिकताओं से गरिष्ठ खाद्य की तरह परहेज करते हैं मगर उनका डीयर पार्क इस बार ठाने बैठा था। डीयर पार्क यानी दिल्ली की दिलशाद गार्डन कालोनी का वह पार्क जहां त्रिपाठी जी नियमत: घूमने जाते हैं और जिसके बारे में रमेश आजाद ने लिखा है- मैंने ऐसा किसी को नहीं देखा/ जो दिलशाद गार्डन में रहता हो/ और जिसने डीयर पार्क न देखा हो/ जिसने नहीं देखा डीयर पार्क/वह दिलशाद गार्डन में नहीं रहता/..यों तो कविताओं का/ कहानियों का सिरा/यहां तलाश जाता है/ आलोचना के बीज भी यहां/ अंकुरित होते हैं/ समीक्षाएं तो छिटपुट चायवाला/पान वाला भी करता है/ अखबारों के कुछ कॉलम यहां/ इन्हीं चक्करों के बीच रचे जाते हैं/ जिसने डीयर पार्क देखा है/ और दिलशाद गार्डन में रहता है/ वह जानता है इन्हें..। दिलशाद गार्डन और आसपास की कालोनियों में रहने वाले लेखक-पत्रकार-कवि-संपादक इस नाचीज सहित नियमित, अनियमित तौर पर डीयर पार्क अवश्य आते हैं-प्रात: भ्रमण के लिए अथवा इसके बहाने उस बतकही का आनंद लेने जिसके केंद्रीय सूत्रधार हमेशा त्रिपाठी जी होते हैं। उनकी मेधा, उनकी अदभुत स्मरण शक्ति और संस्मरणों का महासागर हम सबको चमत्कृत करता है। जब वह अपने इस महासागर से अंजुरी-अंजुरी संस्मरण जल छींटते हैं तो बाकी लोगों का काम आनंद से सुनने या बीच-बीच में ठेक भर देने का होता है। चाहे व्यक्ति का गोपन जीवन हो या उजागर साहित्यिक जीवन, ऐसा कोई कोना नहीं जिसका प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष अनुभव त्रिपाठी जी के पास न हो और ऐसा कोई नहीं जिसके समर्थन में किसी बड़े कवि-आलोचक-साहित्यकार-शायर का कोई संस्मरण या उद्धरण उनके पास न हो। फिर बतकही का वह अंदाज कि हास्य से श्रृंगार तक हर रस बरबस बरसता रहे। जब डीयर पार्क की गोष्ठियों की विषय वस्तु इधर से उधर ठुमकती है तो यह पल स्थानिक-पल वैश्विक होती रहती है। भारतेंदु मिश्र की पंक्तियां हैं-रविवासरीय बैठकी चलती है लंबी/ बतरस लूटते हैं सब अपने ढंग से/ झांकते हैं समस्याओं में अपनी तरंग से/ डूबकर नहाते हैं निंदा के लाल में/ सभी मगन रहते हैं लेकिन हर हाल में/ अक्सर प्रकट होते हैं/ टॉलस्टॉय-गालिब-निराला/कबीरतु लसी-शेक्सपियर/ जोश-शमशेर- नागाजरुन/ तो कभी उतर आते हैं कालिदास-वाणभट्ट/और शूद्रक, इस बतकही से बिखर जाती है पुनर्नवा घास/पुनर्नवा के साथ जी उठते हैं/ आचार्य प्रवर हजारी प्रसाद द्विवेदी/गुरुवर जो ठहरे बिसनाथ (विश्वनाथ त्रिपाठी) के/ रामविलास शर्मा-केदारनाथ अग्रवाल-त्रिलोचन/ सभी प्रकट होते हैं, प्रसंगवश लगता है पान खाये बैठे हैं/पास में नामवर/ और पाइप सुलगा रहे हैं/ काला चश्मा चढ़ाए राजेन्द्र यादव..। कथादेशके संपादक हरिनारायण कहते हैं- यहां की साहित्यिक र्चचाएं बड़ी ही सार्थक और ज्ञानवर्धक होती हैं। त्रिपाठी जी अपने अनुभवों को खुले दिल से बांटते हैं। यह डीयर पार्क (आने वालों) की बड़ी उपलब्धि है कि हिंदी के प्रकाश स्तंभ विश्वनाथ त्रिपाठी यहां आते हैं। स्वयं त्रिपाठी जी कॉफी हाऊसों और चाय की दुकानों में साहित्यिक बैठकियों का स्मरण करते हुए वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करते हैं- ये इकानॉमिक रिफॉर्म इतना बड़ा शत्रु सांस्कृतिक गतिविधियों का बना है कि लोगों के पास आपस में मिलने का समय ही नहीं रह गया है। हर आदमी मोबाइल से बात कर रहा है, इंटरनेट से बात कर रहा है या टीवी देख रहा है। ये जो व्यक्तिवाद है इतना पृथकतावादी है कि सबको अलग-थलग कर देता है।..लेकिन डीयर पार्क का हमारा यह स्वैच्छिक मिलन चल रहा है..दस साल, पंद्रह साल, बीस साल हो गये अभी तक ये साहित्य मंडल डीयर पार्क का बना हुआ है। तो डीयर पार्क का यह साहित्य मंडल त्रिपाठी जी का जन्मदिन मनाने का मन बनाए हुए था। मनावन स्थल था स्वयं डीयर पार्क। त्रिपाठी जी को साग्रह और साधिकार मना लिया गया था कि वह समय से पहुंच जाएं। लेकिन सोलह फरवरी से ऐन दो दिन पहले से जो बारिश शुरू हुई वह उस दिन की सुबह तक चलती रही। मगर निर्धारित समय से पहले बारिश थम गयी, आसमान खुल गया और पार्क की हरीतिमा जैसे नहा धोकर उत्सव में हमारे साथ शामिल हो गयी। हरि नारायण, रामकुमार कृषक, बलराम अग्रवाल, भारतेंदु मिश्र, अशोक गुजराती, रमेश आजाद, रमेश प्रजापति, जय कृष्ण, काजल पांडे, कमलेश, अंगद तिवारी, जयशंकर शुक्ल आदि लोग समय पर उपस्थित थे। पार्क के कुछ अन्य नियमित सदस्य भी स्वेच्छा उत्सव के हिस्सा बन गये। कोई तामझाम नहीं, कोई औपचारिक आडंबर नहीं। त्रिपाठी जी आये तो सभी ने गेंदे के फूल की मालाएं जरूर उन्हें पहिना दीं। सभी का संक्षिप्त सा संस्मरणात्मक प्रशस्तिवाचन और फिर त्रिपाठी जी की बतकही। और समापन में शहादरे की बालूशाही और पार्क के कोने में चाय का ढाबा चलाने वाले लड़के की चाय। बस इतना-सा, मगर बेहद आत्मीयता भरा उत्सव। हां, इस अवसर पर पार्क मंडल के सदस्यों के संस्मरणात्मक आलेखों, साक्षात्कारों, कविताओं, कहानियों के भारतेंदु मिश्र द्वारा संपादित संकलन बतकहीका विमोचन भी त्रिपाठी जी ने किया। मेरे यहां दिये उद्धरण इसी संकलन से लिए गए हैं। इस संक्षिप्त उत्सव के दौरान अरुण प्रकाश बहुत याद आये जो कभी पार्क मंडल के प्रिय सदस्य हुआ करते थे मगर अब दिलशाद गार्डन में नहीं रहते। कथाकार विजय भी ऐसे ही कारण से नहीं आ सके। राजेन्द्र नागदेव भोपाल जा बसे हैं। कुछ अन्य साथियों की उपस्थिति भी संभव नहीं हो सकी। फिर भी रमेश प्रजापति के शब्दों में-तमाम विद्रूपताओं के बावजूद/ गनीमत है कि /सही सलामत घूम रही है धरती/ अपनी धुरी पर/ दिशाएं टिकी हैं अपनी जगह पर/ पेड़ गा रहे हैं हरियाली का गीत/ आदमी के स्वप्न में चहक रही हैं चिड़ियाएं/और अपनी सौम्यता के साथ/ गुनगुना रहा है अब भी। दिलशाद गार्डन का डीयर पार्क।..और हमारे मुंह में त्रिपाठी जी के जन्मदिवस की बालूशाही का स्वाद घुला हुआ था।


Monday, February 7, 2011

हिंदी का ठिठुरता इतिहास


भाई लोगो, आपने इस तरह के जुमले तो सुने ही होंगे कि इतिहास माफ नहीं करेगा या इतिहास जवाब मांग रहा है। इस तरह के जुमले तो आपको अजीब नहीं लगते। फिर ठिठुरता इतिहास क्यों अजब लग रहा है? अब आप ही बताइए, जब इतिहास माफ नहीं करता या जवाब मांगता है तो फिर ठिठुर क्यों नहीं सकता! मान लें कि इतिहास भी संवेदनशील होता है इसलिए वो भी कापंता है, ठिठुरता है, सोचता है और नाराज वगैरह होता रहता है। तो अब आपके सामने पेश है ठिठुरते इतिहास का किस्सा।
दरअसल वो मुझे एक दिन साहित्य अकादेमी के पुस्तकालय में मिल गया। मैंने देखा कि किताबों की उन आलमारियों के साथ खड़ा कोई ठिठुर रहा था। ये भी गौर किया उस हालत में भी उसके मुंह से कभी सूरदास का ये पद निकल रहा था-ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं; तो कभी निराला का गीत मैं अकेला...आ रही मेरे दिवस की सांध्य बेला...फिर उसकी कंपकपी बढ़ जाती और वो अचानक चुप हो जाता। मैंने महसूस किया कि इसकी कद काठी कुछ कुछ आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा तैयार हिंदी साहित्य का इतिहास से मिल जुल रही थी। चेहरे पर गांभीर्य पर साथ-साथ चिंता और थकान भी। फिर खट से लगा कि अरे, ये तो साक्षात वही है। हिंदी साहित्य का इतिहास।
मैंने पूछा, ‘भाई तुम यहां कैसे और इस तरह ठिठुर क्यों रहे हो? आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने तुम्हारी अच्छी कद-काठी तैयार की और तुम्हे हिंदी में मुकम्मल व्यक्तित्व दिया। इसलिए तुमको तो जोर से अपना शौर्य प्रदर्शित करना चाहिए। आखिर तुम हिंदी साहित्य और उसकी विरासत की पहचान हो।
वो बोला, ‘क्यों आप मेरी फजीहत कर रहे हैं! कैसी विरासत, कैसी पहचान? बेशक मैं रामचंद्र शुक्ल का शुक्रगुजार हूं। उसके बाद हजारी प्रसाद द्विवेदी का भी, लेकिन उन दोनों के बाद तो सिर्फ करुण रस होकर रह गया हूं। किसको परवाह है मेरी? अगर परवाह होती तो आज मेरे बारे में लिखा नहीं जाता। मेरे ऊपर सेमिनार या गोष्ठियां नहीं होती। मेरे ऊपर शोध नहीं किया जाता। मेरे बारे में किताबें नहीं लिखी जातीं। देखिए इन आलमारियों को। कोई नई किताब दिख रही है आपको मेरे बारे में!
अचानक लगा कि मुझे जोर का झटका लगा है। सचमुच वहां पर जो किताबें थीं उसमें हिंदी साहित्य के इतिहास पर कोई नई किताब नहीं थी। फिर ध्यान आया कि सचमुच पिछले तीस-चालीस साल में हिंदी साहित्य के इतिहास पर किताबें नहीं के बराबर लिखी जाती हैं। एक जमाना था जब हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास या हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास जैसी किताबें भी लिखी जाती थीं, जो पहले दर्जे की भले न हों पर दोयम दर्जे की तो थीं। आजकल तो वैसी किताबें भी नहीं आतीं। क्या हिंदी भाषी समाज में अपने साहित्य को लेकर दिलचस्पी खत्म हो चुकी है, लग तो यही रहा था। इतिहास ठिठुर रहा था और मैं स्तब्ध था।
मुझे सोचते देख कर ठिठुरता और कांपता हुआ इतिहास तैश में आ गया और बोलने लगा, ‘पूरी दुनिया में इतिहास के बारे में पढ़ा और लिखा जा रहा है। लेकिन हिंदी में तो इतिहास का अंत हो गया है। कहने को तो हिंदी में अमेरिका के खिलाफ काफी कुछ लिखा जाता है। लेकिन हिंदी के विद्वानों ने तो अमेरिकी प्रोफेसर फ्रांसिस फुकुयामा की स्थापना इतिहास का अंत को गांठ बांधकर अपना लिया है। हालांकि फुकुयामा का सिद्धांत अमेरिका में ही पिट गया। लेकिन हिंदी के आचार्य और विद्वान तो अपने समय से कम से कम तीस साल पीछे रहते हैं। इसलिए उनको आज दुनिया में क्या हो रहा है इसकी ही खबर नहीं है। अगर ऐसा नहीं होता को कम से कम इक्सीसवीं सदी के दस साल बीत जाने के बाद भी बीसवीं सदी के हिंदी साहित्य के इतिहास पर कोई तो किताब आती। दुनिया भर में इतिहास पर तरह-तरह के शोध हो रहे हैं पर मेरे बारे में क्या रहा है?’ मैंने देखा कि इतना बोलने के बाद क्लांत इतिहास चुप हो गया। उसके बाद वो एक वाक्य बोला, ‘क्या कोई दूसरा रामचंद्र शुक्ल हिंदी में पैदा होगा?’ वो फिर से ठिठुरने लगा। अब उसकी ठिठुरन ज्यादा बढ़ गई थी।