बांग्लादेश इस वर्ष अपने मुक्ति संघर्ष और स्थापना की 40वीं वर्षगांठ मना रहा है। ऐसे समय में तसलीमा नसरीन के बाद हिंदी के पाठकों से बांग्लादेश की एक और महत्वपूर्ण युवा उपन्यासकार तहमीमा अनम रू-ब-रू हैं। उनका पहला उपन्यास अ गोल्डन एज (2007) हिंदी में वो दौर सुनहरा शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। इस उपन्यास के लिए अनम को 2008 का कॉमनवेल्थ राइटर्स अवार्ड मिला था, जो लेखक की प्रथम रचना पर दिया जाता है। यह उपन्यास पूर्वी पाकिस्तान के बांगलादेश बनने (1971) की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। यह उसकी आजादी की लड़ाई का तारीखी इतिहास तो नहीं है, लेकिन उसके तानेबाने से ही कथा को बुना गया है। मुख्य रूप से यह कहानी एक ऐसी स्त्री की है, जिसके अतीत की जड़ें तत्कालीन पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान, दोनों में गहरे उतरी हैं। जबकि उसका वर्तमान उसके जवान हो चुके दो बच्चे हैं, जो अपने बांग्लादेश के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कहा जाता है कि स्त्री का कोई देश नहीं होता। उपन्यास की नायिका रेहाना हक भी शुरुआत में इस उलझन में रहती है कि उसकी वास्तविक जमीन कौन सी है? अपने आसपास के माहौल से अनजान तमाम दूसरे लोगों की तरह उसे भी यह भान नहीं होता कि आने वाले दिनों में क्या होने वाला है? लेकिन मुक्ति संघर्ष में शामिल अपने बच्चों को देखते-समझते रेहाना पाती है कि वह उसी तरफ है, जिस तरफ उसके बच्चे-सुहैल और माया! रेहाना की कहानी शुरू होती है, अपने बच्चों पर अधिकार खोने से। वह पूर्वी पाकिस्तान के शहर ढाका में रही है और अपने शौहर इकबाल के इंतकाल के बाद ससुराल, पश्चिमी पाकिस्तान या मायके कोलकाता (भारत) नहीं लौटना चाहती। उसके पास आय का कोई जरिया नहीं है और इसी कमजोरी का फायदा उठाकर ससुराल पक्ष अदालत में मुकदमा जीत सुहैल और माया को अपने अधिकार में लेलेता है। उपन्यास की कहानी परतों में उघड़ती हुई लगातार अतीत और वर्तमान में सक्रिय रहती है। रेहाना अपने लिए आय का जरिया बनाने के बाद बच्चों को फिर हासिल करती है। वे अब बड़े हो चुके हैं। उससे आजाद हो चुके हैं। रेहाना गौर करती है कि बच्चे अब बच्चे नहीं रहना चाहते और वह भी सिर्फ मां की भूमिका नहीं निभाना चाहती। इसके बावजूद तीनों एक छत के नीचे हैं। लेखिका ने मां-बेटी और मां-बेटे के रिश्तों को कुशलता से बुना है। खास तौर पर मां और बेटी के संबंधों को, जो लगातार तनाव में रहते हैं। युवा होती बेटी को लेकर मां की चिंता और बेटी का विद्रोह। हालांकि वक्त के साथ दोनों के रिश्ते में संतुलन पैदा होता है। वे एक-दूसरे को मां-बेटी के बजाय स्त्री के रूप में समझती हैं। इस समझ का शिखर वहां नजर आता है, जब मां अपनी बेटी के सामने अपने जीवन का अंतरंग सत्य उजागर करती है और कोई हाय-तौबा नहीं मचती। कॉलेज में पढ़ने वाले, बांगलादेश की आजादी की जंग लड़ रहे सुहैल और माया की रेहाना, घर और ढाका से अलग दुनिया बन चुकी है। उपन्यास में इन भाई-बहन की कहानी बांग्लादेश की जंग-ए-आजादी के हालात बयान करती चलती है। इसी के बीच में सुहैल का किरदार एक पे्रमी युवक के रूप में भी उभरता है। वह उस युवती को हासिल करना चाहता है, जो उसके बचपन की दोस्त है, मगर उसका निकाह किसी और से हो चुका है! ..और बेटे के स्नेह में गिरफ्तार रेहाना हक भी उसे अपनी पे्रमिका का प्यार दिलाने की खातिर जिंदगी में जोखिम उठाती जाती है। बांगलादेश के मुक्ति संघर्ष के समानांतार उपन्यास में रेहाना की कथा चलती है। रेहाना की जिंदगी से जुड़े नए-नए किरदार कहानी में आते हैं। मिस्टर और मिसेज सेनगुप्ता, मिसिज चौधुरी और उनकी बेटी सिल्वी, सिल्वी का फौजी अफसर मंगेतर/पति सबीर, रेहाना का देवर पाकिस्तानी फौजी फैज, उसकी पत्नी परवीन और मुक्ति संघर्ष में शामिल एक मेजर जो पहले पाकिस्तानी सेना में हुआ करता था। इन किरादरों में उत्साह है, जुनून है, उम्मीद है, विश्वास है, संघर्ष है, हताशा है, ईष्र्या है, डाह है, खोना और पाना है। उपन्यास में उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें अनम ने मुक्ति संघर्ष में तमाम लोगों की कुर्बानियों के बीच मुख्य किरदारों को कड़े संघर्ष के बीच जिंदा बचाए रखा। उन्हें मरने नहीं दिया। हाल में अनम का दूसरा अंग्रेजी उपन्यास आया है द गुड मुस्लिम नाम से। यह अ गोल्डन एज उपन्यास की दूसरी कड़ी है। बांग्लादेश बनने के बाद माया और सुहैल की कहानी। तहमीमा अनम का इरादा अभी खत्म नहीं हुआ है और वह इसकी तीसरी कड़ी लिखने के लिए तैयार है। अपने इस नए क्रम में वह माया और सुहैल के बच्चों की बात कहेंगी। वो दौर सुनहरा में 36 वर्षीया तहमीमा अनम अतीत के एक ऐतिहासिक दौर को पाठकों के सामने उभारने में पूरी तरह कामयाब रही हैं। इसमें कॉलेज के छात्रों का संघर्ष है, रिफ्यूजियों की दीन-हीन दशा है, मुक्ति वाहिनी को मदद देने वाले अनाम हाथ हैं, पाकिस्तानी सेना के अत्याचार हैं.. और बीबीसी वर्ल्ड सर्विस का यह रेडियो संदेश भी कि अगर इंदिरा गांधी दखल दें, तो यह जंग यकीनन बांगलादेश के लोगों के हक में जीती जा सकेगी..। इन सबके बीच रेहाना की कहानी एक मां होने से इतर भी बढ़ती है और घर में शरण लिए घायल मेजर से उसे पे्रम हो जाता है। एक मोड़ पर दोनों की कहानी हिंदी की अमर कथा उसने कहा था (चंद्रधर शर्मा गुलेरी) की याद दिला देती है। शिवानी खरे ने अंगे्रेजी से इस उपन्यास का अनुवाद किया है-यह सहज है।
Wednesday, June 29, 2011
मुक्ति संघर्ष के दिनों की यादें
बांग्लादेश इस वर्ष अपने मुक्ति संघर्ष और स्थापना की 40वीं वर्षगांठ मना रहा है। ऐसे समय में तसलीमा नसरीन के बाद हिंदी के पाठकों से बांग्लादेश की एक और महत्वपूर्ण युवा उपन्यासकार तहमीमा अनम रू-ब-रू हैं। उनका पहला उपन्यास अ गोल्डन एज (2007) हिंदी में वो दौर सुनहरा शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। इस उपन्यास के लिए अनम को 2008 का कॉमनवेल्थ राइटर्स अवार्ड मिला था, जो लेखक की प्रथम रचना पर दिया जाता है। यह उपन्यास पूर्वी पाकिस्तान के बांगलादेश बनने (1971) की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। यह उसकी आजादी की लड़ाई का तारीखी इतिहास तो नहीं है, लेकिन उसके तानेबाने से ही कथा को बुना गया है। मुख्य रूप से यह कहानी एक ऐसी स्त्री की है, जिसके अतीत की जड़ें तत्कालीन पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान, दोनों में गहरे उतरी हैं। जबकि उसका वर्तमान उसके जवान हो चुके दो बच्चे हैं, जो अपने बांग्लादेश के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कहा जाता है कि स्त्री का कोई देश नहीं होता। उपन्यास की नायिका रेहाना हक भी शुरुआत में इस उलझन में रहती है कि उसकी वास्तविक जमीन कौन सी है? अपने आसपास के माहौल से अनजान तमाम दूसरे लोगों की तरह उसे भी यह भान नहीं होता कि आने वाले दिनों में क्या होने वाला है? लेकिन मुक्ति संघर्ष में शामिल अपने बच्चों को देखते-समझते रेहाना पाती है कि वह उसी तरफ है, जिस तरफ उसके बच्चे-सुहैल और माया! रेहाना की कहानी शुरू होती है, अपने बच्चों पर अधिकार खोने से। वह पूर्वी पाकिस्तान के शहर ढाका में रही है और अपने शौहर इकबाल के इंतकाल के बाद ससुराल, पश्चिमी पाकिस्तान या मायके कोलकाता (भारत) नहीं लौटना चाहती। उसके पास आय का कोई जरिया नहीं है और इसी कमजोरी का फायदा उठाकर ससुराल पक्ष अदालत में मुकदमा जीत सुहैल और माया को अपने अधिकार में लेलेता है। उपन्यास की कहानी परतों में उघड़ती हुई लगातार अतीत और वर्तमान में सक्रिय रहती है। रेहाना अपने लिए आय का जरिया बनाने के बाद बच्चों को फिर हासिल करती है। वे अब बड़े हो चुके हैं। उससे आजाद हो चुके हैं। रेहाना गौर करती है कि बच्चे अब बच्चे नहीं रहना चाहते और वह भी सिर्फ मां की भूमिका नहीं निभाना चाहती। इसके बावजूद तीनों एक छत के नीचे हैं। लेखिका ने मां-बेटी और मां-बेटे के रिश्तों को कुशलता से बुना है। खास तौर पर मां और बेटी के संबंधों को, जो लगातार तनाव में रहते हैं। युवा होती बेटी को लेकर मां की चिंता और बेटी का विद्रोह। हालांकि वक्त के साथ दोनों के रिश्ते में संतुलन पैदा होता है। वे एक-दूसरे को मां-बेटी के बजाय स्त्री के रूप में समझती हैं। इस समझ का शिखर वहां नजर आता है, जब मां अपनी बेटी के सामने अपने जीवन का अंतरंग सत्य उजागर करती है और कोई हाय-तौबा नहीं मचती। कॉलेज में पढ़ने वाले, बांगलादेश की आजादी की जंग लड़ रहे सुहैल और माया की रेहाना, घर और ढाका से अलग दुनिया बन चुकी है। उपन्यास में इन भाई-बहन की कहानी बांग्लादेश की जंग-ए-आजादी के हालात बयान करती चलती है। इसी के बीच में सुहैल का किरदार एक पे्रमी युवक के रूप में भी उभरता है। वह उस युवती को हासिल करना चाहता है, जो उसके बचपन की दोस्त है, मगर उसका निकाह किसी और से हो चुका है! ..और बेटे के स्नेह में गिरफ्तार रेहाना हक भी उसे अपनी पे्रमिका का प्यार दिलाने की खातिर जिंदगी में जोखिम उठाती जाती है। बांगलादेश के मुक्ति संघर्ष के समानांतार उपन्यास में रेहाना की कथा चलती है। रेहाना की जिंदगी से जुड़े नए-नए किरदार कहानी में आते हैं। मिस्टर और मिसेज सेनगुप्ता, मिसिज चौधुरी और उनकी बेटी सिल्वी, सिल्वी का फौजी अफसर मंगेतर/पति सबीर, रेहाना का देवर पाकिस्तानी फौजी फैज, उसकी पत्नी परवीन और मुक्ति संघर्ष में शामिल एक मेजर जो पहले पाकिस्तानी सेना में हुआ करता था। इन किरादरों में उत्साह है, जुनून है, उम्मीद है, विश्वास है, संघर्ष है, हताशा है, ईष्र्या है, डाह है, खोना और पाना है। उपन्यास में उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें अनम ने मुक्ति संघर्ष में तमाम लोगों की कुर्बानियों के बीच मुख्य किरदारों को कड़े संघर्ष के बीच जिंदा बचाए रखा। उन्हें मरने नहीं दिया। हाल में अनम का दूसरा अंग्रेजी उपन्यास आया है द गुड मुस्लिम नाम से। यह अ गोल्डन एज उपन्यास की दूसरी कड़ी है। बांग्लादेश बनने के बाद माया और सुहैल की कहानी। तहमीमा अनम का इरादा अभी खत्म नहीं हुआ है और वह इसकी तीसरी कड़ी लिखने के लिए तैयार है। अपने इस नए क्रम में वह माया और सुहैल के बच्चों की बात कहेंगी। वो दौर सुनहरा में 36 वर्षीया तहमीमा अनम अतीत के एक ऐतिहासिक दौर को पाठकों के सामने उभारने में पूरी तरह कामयाब रही हैं। इसमें कॉलेज के छात्रों का संघर्ष है, रिफ्यूजियों की दीन-हीन दशा है, मुक्ति वाहिनी को मदद देने वाले अनाम हाथ हैं, पाकिस्तानी सेना के अत्याचार हैं.. और बीबीसी वर्ल्ड सर्विस का यह रेडियो संदेश भी कि अगर इंदिरा गांधी दखल दें, तो यह जंग यकीनन बांगलादेश के लोगों के हक में जीती जा सकेगी..। इन सबके बीच रेहाना की कहानी एक मां होने से इतर भी बढ़ती है और घर में शरण लिए घायल मेजर से उसे पे्रम हो जाता है। एक मोड़ पर दोनों की कहानी हिंदी की अमर कथा उसने कहा था (चंद्रधर शर्मा गुलेरी) की याद दिला देती है। शिवानी खरे ने अंगे्रेजी से इस उपन्यास का अनुवाद किया है-यह सहज है।
Tuesday, June 14, 2011
भावी पीढ़ी की लोक दृष्टि
प्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक प्रो. चंद्रबली सिंह का 23 मई को निधन हो गया। अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक के रूप में बलवंत राजपूत कॉलेज, आगरा से अध्यापकीय जीवन की शुरुआत करने वाले चन्द्रबली जी वहां अंग्रेजी विभाग के विभागाध्यक्ष और हिंदी साहित्य के वरिष्ठ आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा के सहकर्मी थे। चूंकि डॉ. शर्मा प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े थे इसलिए चन्द्रबली सिंह पर न केवल उनकी विचारधारा का प्रभाव पड़ा बल्कि वे खुद पर्लेस और मार्क्सवादी विचारधारा से घनिष्ठता से जुड़ गये और जीवन के अंत तक मार्क्सवाद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता बनी रही। चंद्रबली सिंह का जन्म 20 अप्रैल 1924 को गाजीपुर जिले के रानीपुर गांव (ननिहाल) में हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक और 1944 में स्नातकोत्तर (अंग्रेजी साहित्य में) की उपाधि प्राप्त की। आगरा के कॉलेज से निकले तो वाराणसी के उदय प्रताप स्नातकोत्तर कॉलेज में 40 वर्षो तक अध्यापन के बाद वहीं से अवकाश ग्रहण किया। चंद्रबली जी अंग्रेजी के प्राध्यापक थे लेकिन अंग्रेजी में उन्होंने बहुत कम लिखा। बिल्कुल रामविलास जी की तरह। काशी नागरी प्रचारिणी सभा की पत्रिका ‘हिन्दी रिव्यू’ में ‘कंटेम्पररी हिंदी पोएट्री’
पर लिखा (1958-59)। अपने लंबे जीवनकाल में उन्होंने पढ़ा बहुत लेकिन लिखा कम और छपा तो और भी कम। उनकी पहली पुस्तक थी- ‘लोकदृष्टि और हिंदी साहित्य’, जिसका प्रकाशन छठे दशक के आरंभ में हुआ था। इसका पता हमें उनकी दूसरी पुस्तक ‘आलोचना का जनपक्ष’, जो वाणी प्रकाशन से 2003 में प्रकाशित हुई थी की भूमिका ‘जो मुझे कहना है’ से चलता है। वे लिखते हैं- ‘लोक दृष्टि और हिंदी साहित्य के बाद लगभग पांच दशकों के बाद यह पुस्तक मेरे लेखों का दूसरा संग्रह है। इसके अनेक लेख मेरे पास नहीं थे। उनमें से कुछ को डॉ. नामवर सिंह ने सहेज कर रखा था। कुछ डॉ. अजय तिवारी के पास थे। कुछ लेख डॉ. मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और रेखा अवस्थी ने श्रम करके एकत्र किए।’
इन दो पुस्तकों के आधार पर (अनुवाद छोड़कर) उनके जैसे शीर्ष आलोचक का मूल्यांकन थोड़ा मुश्किल है लेकिन इतना स्पष्ट है कि उनमें वैचारिक दृढ़ता थी। इसका बड़ा प्रमाण है ‘जनयुग’ में तीन किस्तों में प्रकाशित डॉ. रामविलास शर्मा पर उनका लेख। संभवत: वे हिंदी के एकमात्र ऐसे आलोचक रहे जिनकी पहली और दूसरी पुस्तक के प्रकाशन में लगभग पचास वर्ष का अंतराल है। चंद्रबली जी एक साथ आलोचक, अनुवादक और अच्छे संपादक थे। ‘लोक-दृष्टि और हिंदी साहित्य’ उनकी पहली आलोचना पुस्तक है, जो अब लगभग अप्राप्य है। इधर सूचना मिली है कि वाणी प्रकाशन से इसका पुनप्र्रकाशन हो रहा है। चंद्रबली जी की लोक-दृष्टि में संपूर्ण हिंदी साहित्य की व्यापक जातीय चेतना है जो तुलसी, कबीर, सूरदास से लेकर प्रेमचंद, निराला, आचार्य शुक्ल, नागाजरुन, शमशेर, केदार, अ™ोय और मुक्तिबोध तक फैली है। कहना न होगा कि उनके संपूर्ण लेखन के केन्द्र में लोक-दृष्टि है जो वस्तुत: मनुष्यता का पर्याय है। वे मार्क्सवादी थे लेकिन मनुष्यता के कट्टर पक्षधर। वैसे भी मार्क्सवाद का असली दर्शन शोषण से मानव मुक्ति है। उनकी दूसरी पुस्तक ‘आलोचना का जनपक्ष’ (2003) तीन खंडों में है। पहले खंड ‘मीमांसा’
में ‘साहित्य में यथार्थ : नई परिस्थितियों में नई व्याख्या शीर्षक लेख के अंत में वे लिखते हैं- ‘इस दृष्टि से देखा जाए तो वर्तमान काल में हिंदी के अनेक आधुनिकतावादी साहित्यिक आंदोलन जो यथार्थ के नाम पर व्यक्ति-विद्रोह, निराशा, मृत्यु, ऐंद्रिय बुभुक्षा, निर्वासन या अजनबीपन इत्यादि पर जोर दे रहे हैं वास्तव में यथार्थ विरोधी हैं।’ यह हिंदी साहित्य के छठे-सांतवें दशक का परिदृश्य था। इसी खंड में दो और महत्वपूर्ण लेख हैं- ‘जनता का साहित्य अजेय है’ और दूसरा ‘आलोचना: व्यापक परिप्रेक्ष्य और ईमानदारी का प्रश्न।’
पिछले दिनों साहित्य अकादेमी सभागार में चंद्रबली जी की श्रद्धांजलि सभा में हिंदी के प्रतिष्ठित समालोचक प्रो. नामवर सिंह ने एक उल्लेखनीय बात कही कि चंद्रबली जी ने हिंदी के तीन कवियों पर लिखा- मैथिलीशरण गुप्त, जिन्होंने खड़ी बोली को कविता में संभव बनाया, ‘निराला: विराट से लघु की ओर’ और त्रिलोचन के ‘गुलाब और बुलबुल’ पर। इस क्रम में नामवर जी यह बताना भूल गये कि चंद्रबली जी ने बिहार के अब लगभग विस्मृत ‘कवि राकेश’ पर भी लिखा था। इसी सभा में नामवर जी ने एक और महत्वपूर्ण बात कही कि आधुनिक हिंदी आलोचना में गठा हुआ गद्य रामचंद्र शुक्ल के बाद चंद्रबली सिंह ने ही लिखा। लेकिन दुख की बात यह है कि चंद्रबली जी के जीवित रहते हम उनके आलोचक का मूल्यांकन नहीं कर सके। भविष्य में कभी हम हिंदी आलोचना की परंपरा का मूल्यांकन करें तो चंद्रबली जी का उल्लेख अवश्य होगा। चंद्रबली जी के अंग्रेजी के प्राध्यापक होने का एक बड़ा लाभ हिंदी पाठकों को यह मिला कि उन्होंने विश्व के आधुनिक महान कवियों से परिचित करवाया। नाजिम हिकमत, पाब्लो नेरूदा, ब्रेख्त, मायकोवस्की, वाल्ट व्हिटमैन, एमिली डिकिंसन की कविताओं का हिंदी अनुवाद करके। प्रसंगवश, चंद्रबली जी को मैंने पहले उनके अनुवाद से जाना और बाद में दिल्ली और बनारस में हुई छिटपुट मुलाकातों से। 1959-60 में उन्होंने तुर्की के प्रसिद्ध कवि नाजिम हिकमत की लंबी कविता ‘हाथ’ का अनुवाद किया था, जो एक पुस्तिका रूप में छपा। इसे पढ़ने के बाद मैं ढूंढ़-ढूंढ़कर हिकमत की कविताएं पढ़ता रहा। उनके द्वारा किया गया पाब्लो नेरूदा की कविताओं का अनुवाद 2004 में साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा ‘पाब्लो नेरूदा: कविता संचयन’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। यह देखकर किसी को भी हैरानी होगा कि चंद्रबली जी ने विश्व के अनेक देशों और भाषाओं के कवियों का ही चुनाव क्यों किया। अपनी क्यूबा-यात्रा के दौरान ला-हवाना के छोर पर स्थित फिंका बिगिया में मैंने अन्रेस्ट हेमिंग्वे के व्यक्तिगत पुस्तकालय में एमिली डिकिंसन का कविता संग्रह देखा। नामवर जी ने ‘पाब्लो नेरूदा : कविता संचयन’ की भूमिका ‘पुरोवाक्’- पृथ्वी का कवि पाब्लो नेरूदा-में लिखा है- ‘नेरूदा मेरे भी प्रिय कवि हैं और उनकी कविताओं का हिंदी अनुवाद करने वाले डॉ. चंद्रबली सिंह तो मेरे आदरणीय अग्रज ही हैं, इसलिए यहां कुछ कहने की हिमाकत कर रहा हूं, वरना स्वयं अनुवादक की विस्तृत भूमिका के बाद कुछ भी कहना गैरजरूरी है। सबसे पहले तो यही कि इस पुस्तक के प्रकाशन पर व्यक्तिगत रूप से मुझे जो आत्मतोष हुआ वह स्वयं अपनी किसी पुस्तक के प्रकाशन के समय भी नहीं हुआ। कारण अनुवादक के उस कठिन जीवन-संघर्ष और आत्मसंघर्ष की गहरी पीड़ा को कुछ-कुछ निकट से देखने का मुझे अवसर मिला।’
चंद्रबली जी अच्छे संपादक भी थे। पहले उन्होंने ‘नयापथ’ का संपादन किया। बाद में कलकत्ता से प्रकाशित ‘कलम’ के संपादक रहे। ‘कलम’ में ‘जनवाद’ की परिभाषा को लेकर एक बड़ा विवाद उठा था जिसमें हिंदी के अनेक आलोचकों की हिस्सेदारी थी। अभी वाणी प्रकाशन से मगाअहि विवि के कुलपति विभूति नारायण राय के सौजन्य से उनके वाल्ट व्हिटमैन के कविता संग्रह घास की पत्तियां संचयन और इमिली डिकिंसन की कविताएं संयचन आये हैं। जीवन के उत्तरार्ध में वह बहुत सिमट गये थे लेकिन विचारधारा और प्रतिबद्धता के प्रति अंत तक उनमें दृढ़ विश्वास और आस्था थी। चंद्रबली जी चुपचाप चले गये। उन्हें लंबा जीवन मिला। जीवन के अंत में उन्हें सरकारी अनुकंपा और दया-दृष्टि की आवश्यकता नहीं हुई। एक स्वाभिमानी लेखक के रूप में अब वे भावी पीढ़ी के लिए लोक-दृष्टि छोड़ गये हैं। चंद्रबली जी जैसे नेक इंसान और कलम से निकलने वाले हर शब्द पर नजर सानी करने वाले अब कहां मिलेेंगे? अंत में, मीर और गा़लिब के शेर के रूप में उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि- अब तो जाते हैं बुतकदे से मीर/ फिर मिलेंगे गर खुदा लाया (मीर) तथा मेहरबां होके बुला लो मुझे चाहे जिस वक्त/मैं गया वक्त नहीं हूं कि फिर आ भी न सकूं (गालिब)।
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