Sunday, January 9, 2011

शमशेर की याद में रंगीन कोमलता

आधुनिक और बीसवीं सदी की हिंदी कविता में शमशेर का स्थान अन्यतम है इससे किसी को इनकार नहीं हो सकता। इस समय उनकी जन्मशती चल रही है कम ही लोग जानते होंगे कि शमशेर कवि के अलावा पेंटर भी थे। हालांकि बतौर पेंटर या कलाकार शमशेर की शोहरत ज्यादा नहीं रही लेकिन उनकी कविता में रंगों की एक खास उपस्थिति है जिसे समझने के लिए कला या पेंटिंग की संवेदना भी चाहिए। मिसाल के लिए शमशेर बहादुर सिंह ने अपनी कविता में प्रात:काल के नभ यानी आकाश के रंग को जिस तरह पकड़ा था, उसके लिए दो चीजें सामने आती हैं। एक तो यह कि उनमें किस तरह भाषा के प्रति कोमल सजगता थी और दूसरे उनमें रंगों के प्रति कैसा मसृण आकषर्ण था। शमशेर अपनी कविता में भाषा को कूची की तरह भी इस्तेमाल करते थे और एक दृश्यात्मक बिंब रच देते थे। यह किसी कवि की बिबंधर्मिंता भर नहीं थी बल्कि दृश्य के प्रति एक कलाकार की दृष्टि भी थी। आशा की जानी चाहिए कि शमशेर के जन्मशती वर्ष में उनकी कविता, उनके भीतर निहित चित्रात्मकता और उनके कलाकार व्यक्तित्व के अंत:र्सबंध पर अंतर्दृष्टि संपन्न अध्ययन होगा। ऐसे समय में जब कई संस्थाएं और लोग शमेशर की याद में कई तरह के आयोजन में जुटे हैं, हिंदी की कवयित्री तेजी ग्रोवर ने शमशेर-स्मृति में अपनी कलाकृतियों की एक प्रदशर्नी की। दिल्ली के अकादेमी ऑफ फाइन आर्ट्स में प्रदर्शित इस प्रदशर्नी में अन्य लोगों के अलावा वरिष्ठ भारतीय कलाकार रजा भी मौजूद थे। रजा लंबे समय तक पेरिस में रहने के बाद अब भारत लौट आए हैं और कहा जा रहा है कि बाकी जिंदगी यहीं गुजारेंगे।
तेजी ग्रोवर अपने में कई तरह की सर्जनात्मक प्रतिभाएं समेटे हैं। वह हिंदी की चर्चित कवयित्री हैं, बहुत अच्छी अनुवादक हैं और साथ ही कलाकार भी। शिक्षा और पर्यावरण के मुद्दों पर वह लंबे अरसे से सक्रिय रही हैं। तेजी मध्यप्रदेश के गावों में घूम-घूम कर पेंटिंग की कार्यशालाएं आयोजित करती हैं और बच्चों को सिर्फ पेंटिंग करना ही नहीं बल्कि रंग बनाना भी सिखाती हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है और विस्थापन के प्रश्न को भी वह शिद्दत से उठाती रही हैं। तेजी ने कला और पर्यावरण के मुद्दे को भी अपनी रचनात्मकता से जोड़ा है। वे अपनी पेंटिग्स में प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करती हैं। प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल के पीछे तेजी की पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता जाहिर होती है। नर्मदा के तीर रहनेवाली तेजी का यह भी मानना है कि रासायनिक रंगों का इस्तेमाल पर्यावरण और प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता का परिचायक है। प्रकृति हमें अपने तरीके से रचनात्मक होना सिखाती है। वह हमें सिर्फ देखने या पेंटिंग करने के लिए लैंडस्केप नहीं देती बल्कि उसके चितण्रके लिए रंग भी देती है, बशर्ते आप उसके लिए तैयारी करें। जामुन की छाल से भी रंग बन सकता है और पलाश के फूलों से भी। जो पलाश आपको इतने सुंदर फूल देता है वही रंग भी देता है। यह जरूरी नहीं कि आप रंग खरीदने बाजार ही जाएं। आप अपनी रसोई में भी रंग तैयार कर सकते हैं। उनकी मौजूदा प्रदशर्नी में भी अनार के छिलके और लोहे की जंग से बने रंगों और पिगमेंट से बनी कलाकृतियां प्रदर्शित हैं। इन कलाकृतियों में किसी तरह की आकृतिमूलता या अमूर्तता नहीं है। तेजी प्राकृतिक रंगों के अक्सों और आशयों को दिखाती हैं। उनकी कलाकृतियां बिबों और रंगों का संयोजन हैं। इनके रंग चटख या शोख नहीं हैं। शमशेर बहादुर सिंह की भाषा का प्रयोग करते हुए कहें तो इन कलाकृतियों में एक रंगीन कोमलताहै। जाहिर है, ऐसी प्रदशर्नी की सार्थकता शमशेर बहादुर सिंह की याद में ही हो सकती है।

Tuesday, January 4, 2011

कलात्मकता के बिना शिखर का स्पर्श नहीं

पिछले साल हिंदी के साहित्य जगत पर अनेक विवादों की छाया पड़ी, लेकिन सृजनात्मकता में वह पीछे नहीं रहा। कई उल्लेखनीय पुस्तकों ने कलात्मकता का शिखर छूकर साहित्य में अपनी पुख्ता मौजूदगी दर्ज कराई। पिछले वर्ष की कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों का लेखा-जोखा..
विचार और विचारधाराओं की भिन्नता के बावजूद साहित्यकारों को एक-दूसरे के साथ बैठना जरूर चाहिए। वैसे तो निजी वैमनस्य पालना ही नहीं चाहिए और यदि कभी कुछ हो भी जाए तो जितनी जल्दी संभव हो, मिल-बैठकर उससे मुक्त हो लेना चाहिए। साहित्य में तो हम इतनी ऊंची-ऊंची बातें करते हैं, लेकिन व्यावहारिक जीवन में बहुत निमA स्तरीय हो जाते हैं। बीते वर्ष हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष पद से अशोक चक्रधर, भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक पद से रवींद्र कालिया और अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति पद से विभूति नारायण राय को हटाकर उन पदों पर अन्य लोगों को बिठाने के लिए साहित्य संसार को ऐसे संघर्ष में झोंक दिया गया, जिसकी जरूरत बिलकुल नहीं थी और जिससे कुछ हुआ भी नहीं। अशोक चक्रधर, रवींद्र कालिया और विभूतिनारायण राय का नाम और काम तो जस का तस बना रहा। राय का एक शब्द जरूर आपत्तिजनक था, लेकिन वह किसी व्यक्ति पर नहीं, प्रवृत्ति विशेष पर चोट थी। साहित्य में जब हमने आंखें खोलीं तो स्त्री को मानसिक और बौद्धिक रूप से सशक्त होते देखा था, लेकिन भूमंडलीकरण और पूंजी के दबाव और प्रभाव में आज स्त्री अपनी देह को अधिक से अधिक दामों पर बेचने के लिए प्रवृत्त कर दी गई लगती है, लेकिन वैसी स्ति्रयों की संख्या पांच-दस प्रतिशत से ज्यादा नहीं है, देश की ज्यादातर स्ति्रयां पति के साथ जुटकर अपना घर-परिवार बसाने और बच्चों को पढ़ा-लिखाकर अपने घर को सशक्त बनाने में जुटी हुई हैं। उनका पति ही उनका सब कुछ होता है और पति के लिए पत्नी उसकी मालकिन। केदारनाथ अग्रवाल, रामविलास शर्मा, त्रिलोचन शास्त्री, नरेश मेहता तथा प्रभाकर श्रोत्रिय जैसों के दांपत्य उसी आम भारतीय पति-पत्नी के उदाहरण हैं, जहां द्वैत नहीं है। आम भारतीय किसान जीवन को देखिए, जहां आज भी होरी और धनिया सहज जीवन के लिए संघर्षरत हैं। वे आज भी एक-दूसरे के हीरो और हीरोइन हैं। शरीर की कुलबुलाहट पर किसी से भी सेक्स संबंध बना लेना प्रेम नहीं है। प्रेम में सहज रूप से सेक्स संबंध बनते हैं। पहले तो बेमेल विवाह होने ही क्यों चाहिए? हो भी जाएं, तो उनसे मुक्त क्यों नहीं हो लेना चाहिए? बीते साल विवाद के कारण स्त्री विमर्श की दुर्गति ही हुई, उससे वह अधोगति को भी प्राप्त हो गया। अब कोई भी भला आदमी स्त्री विमर्श करते हुए हिचकेगा। और दलित विमर्श! उसे तो अभी लंबा सफर तय करना है। वह तो अभी से अनावश्यक चर्चा-कुचर्चाओं के चंगुल में फंस गया है। अनेक दलित लेखक हैं, जो अपने दलित होने का ढिंढोरा पीटे बगैर रचनाओं में कलात्मक शिखरों का स्पर्श कर नोबेल पुरस्कार तक हासिल कर चुके हैं। आइए, बीते वर्ष में प्रकाशित हिंदी की महत्वपूर्ण कृतियों के बीच कुछ समय गुजारते हैं।

कविता : बोधि प्रकाशन, जयपुर ने दस रुपये के अल्प मोली कविता संग्रह (विजेंद्र, चंद्रकांत देवताले, नंद चतुर्वेदी तथा हेमंत शेष) छापकर अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है। सामान्य प्रकाशक इन किताबों के दाम सौ रुपये से कम तो क्या ही रखते। हिंदी प्रचारक संस्थान, वाराणसी भी कुछ ऐसा ही काम कर रहा है। अयोध्या प्रसाद उपाध्याय हरिऔध की गं्रथावली सदानंद शाही ने दस खंडों में दी, तो तरुण कुमार की हरिऔध ग्रंथावली सिर्फ सात खंडों में समाहित है। कालिदास का ऋतु संहार (हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद सहित) श्याम विमल और सुनीता जैन ने प्रस्तुत किया है। कन्हैयालाल नंदन द्वारा संपादित अज्ञेय रचना संचयन छपा है, तो बगान की चुनी हुई कविताओं का संपादन बगान के साथ क्षण भर के नाम से अजित कुमार ने किया है। सुरेश सलिल ने त्रिलोचन की चुनी हुई कविताएं संपादित की हैं, तो चार खंडों में प्रदीप पंत ने वीरेंद्र मिश्र का गीत समग्र दिया है। कैलाश वाजपेयी का डूबा-सा अनडूबा तारा, चंद्रकांत देवताले का आकाश की जात बता भइया, विष्णु नागर का घर के बाहर घर, बशीर बद्र का मैं बशीर हूं, निदा फाजली का आदमी की तरफ, राजेंद्र नागदेव का पत्थर में बंद आदमी, राधेश्याम तिवारी का इतिहास में चिडि़या, सुरेश सेन निशांत का वे जो लकड़हारे नहीं हैं, अष्टभुजा शुक्ल का इसी हवा-पानी में अपनी भी दो-चार सांस हैं?, शंभू बादल का सपनों से बनते हैं सपने, नरेंद्र जैन का काला सफेद में प्रविष्ट होता है, लीलाधर मंडलोई का लिखे में दुख, सुनीता जैन का रसोई की खिड़की से, किरण अग्रवाल का रुकावट के लिए खेद है, वंदना देवेंद्र का आत्महत्या के पर्याय तथा पुष्पलता शर्मा का जंजीर की पायल बीते वर्ष आए उल्लेखनीय कविता संग्रह हैं।
कहानी : काके दी हट्टी (ममता कालिया), मुश्किल काम (असगर वजाहत), यहीं तक (राजी सेठ), कितने शीरीं तेरे लब कि (राजेंद्र राव), रफ्तार (महेश दर्पण), कुछ रंग बेनूर (सूर्यनाथ सिंह), मिट्टी के लोग (एसआर हरनोट), तिनकों का पुल (अशोक गुप्ता), सावंत आंटी की लड़कियां (गीत चतुर्वेदी), यूटोपिया (वंदना राग), राजपाठ तथा अन्य कहानियां (अर्चना वर्मा), बाणमूठ (मुरारी शर्मा), तुम्हें कुछ कहना है भतर्ृहरि (रंजना जायसवाल), होशियारी खटक रही है (सुभाषचंद्र कुशवाहा), भरोसे की बहन (श्योराज सिंह बेचैन), ऑन लाइन रोमांस (सुषमा मुनींद्र), शुभारंभ (ओमा शर्मा), कब्र का मुनाफा (तेजेंद्र शर्मा), आगदार तीली (निरंजन श्रोत्रिय), प्रेमचंद की रुह (रमेश दवे), कबूतरों से भी खतरा है (एन. उन्नी) तथा रात बाकी एवं अन्य कहानियां (रणेंद्र) आदि बीते वर्ष के महत्वपूर्ण कहानी संग्रह हैं। चार खंडों में प्रकाशित कमलेश्वर की शताब्दी की कालजयी कहानियां सन् 2010 का अपने तरह का सबसे महत्वपूर्ण संचयन है।

उपन्यास : काटना शमी का वृक्ष पद्मपंखुरी की धार से (सुरेंद्र वर्मा), 17 रानडे रोड (रवींद्र कालिया), सीढि़यों पर चीता (तेजिंदर), शिगाफ (मनीषा कुलश्रेष्ठ), पानी बीच मीन पियासी (मिथिलेश्वर), दासी की दास्तान (विजयदान देथा), रावी लिखता है (अब्दुल बिस्मिल्लाह), स्वर्ग दद्दा, पाणि पाणि (विद्यासागर नौटियाल), रेखाएं दुख की (विष्णुचंद्र शर्मा), पाथरटीला (रूपसिंह चंदेल), ईहामृग (नीरजा माधव) तथा ये वो सहर तो नहीं (पंकज सुबीर) आदि बीते वर्ष के महत्वपूर्ण उपन्यास हैं।

नाटक और व्यंग्य : संपूर्ण नाटक (भारतेंदु हरिश्चंद्र), धरती आबा (हृषीकेश सुलभ), ये धुआं कहां से उठता है और ढ्योढ़ीवालियां (परवेज अहमद), मंच अंधेरे में (नरेंद्र मोहन), यहीं कहीं बहुत दूर (मोहन महर्षि) तथा बिन पानी सब सून (श्रीभगवान सिंह) आदि नाटक बीते वर्ष छपे तथा भारत एक बाजार है (विष्णु नागर), खेद नहीं है (मृदुला गर्ग) तथा अलग (ज्ञान चतुर्वेदी) आदि बीते वर्ष के चर्चित व्यंग्य संग्रह रहे।

आत्मपरक सृजन : कितने शहरों में कितनी बार (ममता कालिया), इस खिड़की से (रमेशचंद्र शाह), यादों के गलियारे (नासिरा शर्मा), लगता नहीं है दिल मेरा तथा और..और औरत (कृष्णा अग्निहोत्री), मुर्दहिया (तुलसीराम), दिल्ली शहर दर शहर (निर्मला जैन), पूश्किन के देश में (महेश दर्पण), गांधी मेरे भीतर (राजकिशोर), कुछ कर न चम्पू (अशोक चक्रधर), शब्द और सत्याग्रह (प्रेमपाल शर्मा) तथा समय संवाद (श्रीभगवान सिंह) आदि। स्त्री विमर्श : तहखानों में बंद अक्स (चित्रा मुद्गल), पत्तों में कैद औरतें (शरद सिंह), स्वीमिंग पूल पर टॉपलेस (राजकिशोर), पाकिस्तानी स्त्री : यातना और संघर्ष (जाहिदा हिना), मुझे जन्म दो मां (संतोष श्रीवास्तव), गुलाब बाई : नौटंकी की मलिका (प्रिया मेहरोत्रा) तथा औरत इतिहास रचा है तुमने (कुसुम त्रिपाठी) आदि कृतियों ने स्त्री विमर्श को गति प्रदान की है।

आलोचना : समकालीनता और साहित्य (राजेश जोशी), हिंदी का गद्यपर्व, प्रेमचंद और भारतीय समाज, कविता की जमीन और जमीन की कविता तथा जमाने से दो-दो हाथ (नामवर सिंह), कहानी : समकालीन चुनौतियां (शंभु गुप्त), अज्ञेय से साक्षात्कार, अज्ञेय: विचार का स्वराज (कृष्णदत्त पालीवाल), अज्ञेय और उनका कथा साहित्य (गोपाल राय), साहित्य की इतिहास दृष्टि (प्रभाकर श्रोत्रिय), रहबर और रहनुमा प्रेमचंद (नंदकिशोर नंदन), ठंडी धुली सुनहरी धूप (शमशेर पर विश्वरंजन की किताब), प्रतिबिंबन (रामशरण जोशी), समय के साथ (निशिकांत ठाकुर), प्रेमचंद की नीली आंखें (डॉ. धर्मवीर) तथा दलित वेदना और विद्रोह (शरण कुमार लिंबाले) आदि इस वर्ष की महत्वपूर्ण कृतियां मानी गई हैं। संगीत का इतिहास (रामविलास शर्मा), शरद की व्याप्ति (लीलाधर मंडलोई, मोहन गुप्त), कला विचार, कला परंपरा, कला पद्धति, आधुनिक भारतीय कला (ज्योतिष जोशी), अचंभे का रोना, मकबूल (अखिलेश) आदि कला विषयक किताबें बीते वर्ष छपी हैं।